यूपी चुनाव: ब्यूरोक्रेसी से सियासत तक के ब्राह्मणों को साधने की कोशिश में भाजपा, अभी और मिलेगी 'तवज्जो'
यूपी में जाति की सियासत बहुत गहरी है। इसे मौजूदा भाजपा सरकार में मुख्यमंत्री से लेकर मुख्य सचिव और अन्य अहम पदों पर ताजपोशी से समझा जा सकता है। भाजपा ब्राह्मण वोट बैंक को साधने के लिए कई और बड़े निर्णय ले सकती है।
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यूपी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर सत्ताधारी दल भाजपा ब्यूरोक्रेसी से सियासत तक ब्राह्मणों को साधने की कवायद में जुट गई है। पहले हटाए जाने की अटकलों के बीच पीएम मोदी द्वारा कोविड प्रबंधन के लिए मुख्य सचिव राजेंद्र कुमार तिवारी की तारीफ, फिर पूर्व मुख्य सचिव अनूप चंद्र पांडेय की चुनाव आयुक्त के पद पर ताजपोशी और इसके अगले ही दिन कांग्रेस के ब्राह्मण चेहरा जितिन प्रसाद को भाजपा में शामिल किया जाना इसका साफ संकेत है कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व यूपी में ब्राह्मणों की नाराजगी को लेकर चिंतित है।
यूपी में जाति की सियासत बहुत गहरी है। इसे मौजूदा सरकार में मुख्यमंत्री से लेकर मुख्य सचिव और अन्य अहम पदों पर ताजपोशी से समझा जा सकता है। भाजपा ने योगी आदित्यनाथ को यूपी का मुख्यमंत्री बनाया तो दिनेश शर्मा को उप मुख्यमंत्री को बनाकर ब्राह्मण-ठाकुर का संतुलन साधने की कोशिश की।
मामला इतने से बनता नजर नहीं आया तो 2019 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले अनूप चंद्र पांडेय के रूप में प्रदेश का मुख्य सचिव भी ब्राह्मण बना दिया गया। इसके बाद डीजीपी पद पर हितेश चंद्र अवस्थी व अपर मुख्य सचिव गृह के पद पर अवनीश अवस्थी को बैठाया गया। अनूप चंद्र पांडेय रिटायर हुए तो दूसरे ब्राह्मण आरके तिवारी को लाया गया। कुल मिलाकर यह संदेश देने की कोशिश होती रही कि ब्राह्मणों को पूरी तवज्जो दी जा रही है।
उत्पीड़न की धारणा को और गहरा बनाने का काम किया
इसके बावजूद बीते साढ़े चार वर्ष में प्रदेश में कई ऐसी घटनाएं हुईं, जिसे ब्राह्मण उत्पीड़न के रूप में पेश करने की कोशिश की गई। घटनाओं से निपटने के तौर-तरीके ने कई बार उत्पीड़न की धारणा को और गहरा बनाने का काम किया। नतीजा ये हुआ कि जगह-जगह नाराजगी खुलकर सामने आने लगी।
पंचायत चुनावों में भाजपा के तमाम ब्राह्मण चेहरों की हार ने इसे और भी हवा देने का काम किया। बताया जा रहा है कि विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा नेतृत्व ब्राह्मणों की नाराजगी को कम करने के लिए शासन व सरकार के ब्राह्मण चेहरों को साधने, अपने ब्राह्मण नेताओं को तवज्जो के साथ विपक्ष में रहकर ब्राह्मण समाज की आवाज बनने वाले चेहरों को जोड़ने की रणनीति पर चल पड़ा है। सरकार के स्तर से मनोनयन व नियुक्तियों में भी इन्हें तवज्जो दी जा सकती है।