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भाजपा: जहां से की थी शुरुआत वहीं पर खत्म
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
Updated Sun, 29 Dec 2013 03:16 PM IST
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मोदी की हवा में दिल्ली पर फतह का सपना देख रही भाजपा यूपी में पूरे साल जहां की तहां खड़ी दिखी।
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साल 2013 की शुरुआत रैली के साथ करने वाली भाजपा उसी स्थान पर खड़ी साल 2014 की अगवानी करती दिख रही है, जहां एक वर्ष पहले खड़ी दिख रही थी। मोदी की रैलियों व उनके आने से माहौल बना।
पार्टी का ग्राफ बढ़ाने को कई कार्यक्रमों का ऐलान हुआ। लोगों की समस्याओं से संगठन के लोगों को सीधा जोड़ने को भी कई कार्यक्रम बने। पर, बनने के बाद कहां गुम हो गए, पता नहीं चला।
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वर्ष 2012 के अंतिम महीने से लोकसभा चुनाव की तैयारियां करने और प्रत्याशियों की घोषणा करने के दावे 2013 समाप्त होने तक नहीं पूरे नहीं हो पाए हैं।
उम्मीदवारों की घोषणा तो दूर इनके चयन की प्रक्रिया भी ठीक से प्रारंभ नहीं हो सकी। और तो और संगठनात्मक ढांचा का काम भी पूरी तरह खड़ा नहीं हो पाया है।
मोदी के आने और नाम से माहौल तो बना कुल मिलाकर अगर मोदी के उत्तर प्रदेश आने और रैलियों के आयोजन को छोड़ दें तो भाजपा साल के अंतिम दिनों भी वहीं खड़ी दिखाई दी जहां जनवरी 2013 में खड़ी दिख रही थी। आसरा सिर्फ मोदी की हवा का है।
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पिछले साल विधानसभा चुनाव में सीटें और वोट प्रतिशत घटने के बाद भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठनात्मक ढांचे को चुस्त-दुरुस्त करके लोकसभा चुनाव के लिए कमर कसना था।
साथ ही जमीन पर पड़ी पार्टी को खड़ा करके जमीनी लोगों तक पहुंच व पकड़ बनाना था। भाजपा ने इस चुनौती से निपटने के लिए डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी को प्रदेश अध्यक्ष घोषित करके नए चेहरे के साथ मैदान में उतरने की तैयारी की।
पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने जल्दी घर वापसी का ऐलान कर भाजपा को और राहत दी। कार्यकर्ताओं को लगा कि भाजपा के दिन बहुरने वाले हैं।
डॉ. वाजपेयी ने अटल के नाम और काम के साथ 2014 के चुनावी अभियान का ऐलान किया। इसके लिए उन्होंने लखनऊ में 21 जनवरी को ‘अटल शंखनाद रैली’ की घोषणा की।
लंबे समय बाद भाजपा की सभा में इतनी भीड़ जुटी कि आम लोगों को नहीं, राजनीतिक पंडितों को भी यूपी में भाजपा की वापसी का भरोसा होने लगा।
कल्याण सिंह लंबे समय बाद भाजपा के मंच पर आए। उनके पुत्र राजवीर सिंह ने अपनी जनक्रांति पार्टी के भाजपा में विलय का ऐलान किया तो लोगों की पार्टी का ग्राफ बढ़ने की उम्मीदों को और बल मिल गया।
मंच पर मौजूद पार्टी के सभी प्रमुख नेताओं ने एक-दूसरे का हाथ पकड़कर पूरी एकजुटता से लोकसभा चुनाव में पार्टी की नैया पार लगाने का ऐलान किया।
लोगों को भरोसा होने लगा कि भाजपा के बुरे दिन बीत गए हैं, पर यह साल जैसे-जैसे आगे बढ़ा, लोगों की उम्मीदें टूटती दिखीं।
अब तक पूरा नहीं हो पाया संगठनात्मक ढांचा
दिसंबर 2012 में प्रदेश अध्यक्ष निर्वाचित होने के बावजूद डॉ. वाजपेयी तीन महीने तक प्रदेश की टीम ही नहीं बना पाए।
फरवरी के अंतिम सप्ताह में वे टीम को अंतिम रूप दे पाए, पर पार्टी की खींचतान हो या नेताओं का दबाव अथवा उनका राजनीतिक गणित, मुख्य कमेटी में ही दो उपाध्यक्ष के पद अब तक खाली हैं।
पार्टी से संबद्ध अन्य संगठनों के अध्यक्षों और पदाधिकारियों की घोषणा के लिए भी पार्टी में खींचतान मुखर हुई। प्रकोष्ठों के गठन में भी यही हाल दिखाई दिया।
हालत यह है कि संगठनात्मक ढांचा अभी तक पूरी तरह फिट नहीं हो पाया है। आम तौर पर किसी भी राजनीतिक संगठन का युवा विंग पार्टी की जान माना जाता है, पर भारतीय जनता युवा मोर्चा का संगठनात्मक ढांचा पूरी तरह खड़ा नहीं हो पाया है।
युवा मोर्चा के पदाधिकारियों की घोषणा अभी तक हो रही है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. वाजपेयी और अन्य नेताओं ने बूथ पर संगठनात्मक तंत्र खड़ा करने पर शोर तो बहुत मचाया।
इसके लिए अभियान भी चलाए गए, पर इसकी पोल भी इसी 21 दिसंबर को उस समय खुल गई जब प्रदेश प्रभारी अमित शाह ने बूथों का ठीक तरह से गठन न होने पर अपनी नाराजगी उजागर कर दी।
पार्टी संविधान का भी नहीं रहा ध्यान
भाजपा को पार्टी संविधान का भी ध्यान नहीं रहा। संगठन के संविधान के मुताबिक कामकाज की समीक्षा के लिए प्रत्येक तीन महीने पर प्रदेश कार्यसमिति की बैठक बुलाना अनिवार्य है, पर इस साल सिर्फ एक बैठक अप्रैल में चित्रकूट में हुई।
उसमें प्रमुख रूप से गन्ना किसानों के बकाया भुगतान को लेकर पूरे प्रदेश में प्रदर्शन और विधानभवन के घेराव का फैसला किया गया। गांव-गांव पैठ बनाने को कार्यक्रम तय हुए, पर ये फैसले सिर्फ कागजों में ही सिमट कर रह गए। कोई बड़ा आंदोलन पूरे साल नहीं दिखाई दिया।
पार्टी पदाधिकारी घोषित नहीं कर पाए संपत्ति
डॉ. वाजपेयी ने पार्टी की साफ-सुथरी छवि बनाए रखने का संकल्प जताते हुए ऐलान किया कि उनके पदाधिकारी अपनी-अपनी संपत्ति की घोषणा करेंगे।
इस ऐलान ने अखबारों में खूब सुर्खियां बटोरीं, लेकिन इस घोषणा पर अमल की लोगों को इंतजार ही है। यही नहीं, वाजपेयी के जनवरी में प्रत्याशियों के ऐलान पर भी पूरे साल काम आगे नहीं बढ़ा पाया।
जिताऊ और साफ-सुथरे प्रत्याशियों की तलाश पार्टी के चार-चार लोगों की टीम को प्रत्येक लोकसभा क्षेत्र में भेजने का ऐलान भी अमल में आने से पहले ही वापस हो गया।
नतीजतन प्रत्याशियों की घोषणा तो दूर, अभी तक इसकी प्रक्रिया भी शुरू नहीं हो पाई है। बूथ सम्मेलनों की हकीकत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि राजधानी में भी बूथ सम्मेलन की खबरें सिर्फ विधानसभा के पूर्वी क्षेत्र से ही आईं।
रैलियों का रहा जोर
हालांकि रैलियों और नेताओं के कार्यक्रमों के लिहाज से भाजपा खूब चर्चा में रही। लखनऊ में अटल शंखनाद रैली के बाद पश्चिम में लोकसभा की कैराना सीट में रैली हुई।
बरेली के देवचरा में वरुण गांधी की रैली हुई। मथुरा, सुल्तानपुर और लखीमपुर में वरुण गांधी और नितिन गडकरी की रैली हुई। इसके बाद मोदी की रैलियां शुरू हो गईं।
जुलाई के बाद पूरा संगठन सिर्फ रैलियों की तैयारी, उनमें भीड़ जुटाने को लेकर दौरों तक ही सीमित रहा। मोदी के करीबी अमित शाह जब प्रदेश के प्रभारी बनकर आए तो लोगों को लगा कि संगठन का ढर्रा बदलेगा।
शुरू में ऐसा दिखा भी, पर ज्यों-ज्यों समय बीता, त्यों-त्यों शाह का फोकस भी सिर्फ रैलियों पर ही केंद्रित हो गया। रैलियों को छोड़ दें तो भाजपा दिसंबर में भी वहीं खड़ी दिखाई दे रही है, जहां जनवरी में खड़ी थी।
मोदी के कारण बने माहौल से यूपी में भाजपा के अव्वल नंबर पर आने की राह में आज अगर सबसे बड़ी कोई बाधा है तो संगठनात्मक ढांचा की कमी। रैलियों को छोड़ दें तो भाजपा का 2013 का सफर जहां से शुरू हुआ था, साल के अंत में वहीं खड़ी दिखाई दे रही है।