सपा के लिए चेतावनी है बसपा से मुस्लिमों का जुड़ना, जानें कैसे
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चार मुस्लिम विधायकों को हाथी की सवारी कराके बसपा ने अपने समर्थकों को सियासी संदेश दे दिया है। दलित-मुसलमान गठजोड़ को परवान चढ़ाने की कोशिशों में जुटी मायावती को इससे कुछ लाभ हो सकता है।
कांग्रेस व सपा के बागी मुस्लिम विधायकों का बसपा में नया ठिकाना बनाना सपा के लिए चेतावनी है तो अमेठी जिले के मुस्लिम विधायक को रोक पाने में नाकामी कांग्रेस के लिए खतरे की घंटे की तरह है।
बसपा में बुधवार को जो चार मुस्लिम विधायक शामिल हुए हैं, उनमें तीन कांग्रेस और एक सपा का है। तीन विधायक पश्चिमी यूपी से हैं जबकि एक गांधी, नेहरू परिवार के परंपरागत गढ़ समझे जाने वाले अमेठी क्षेत्र की तिलोई सीट से है। ये विधायक विधान परिषद चुनाव में बसपा के पक्ष में क्रॉस वोटिंग कर चुके हैं।
बसपा में शामिल विधायकों में नवाब काजिम अली उर्फ नवेद मियां स्वार (रामपुर), दिलनवाज खां स्याना (बुलंदशहर) और नवाजिश आलम खां बुढ़ाना (मुजफ्फरनगर) से हैं। नवेद मियां और दिलनवाज कांग्रेस तथा नवाजिश सपा से विधायक चुने गए थे।
पश्चिम यूपी के विधायकों का बसपा में आना सपा को चुनौती
पश्चिमी यूपी के तीन मुस्लिम विधायकों का कांग्रेस व सपा छोड़कर बसपा में जाना सपा के लिए चेतावनी है। मुसलमानों को सपा का वोट बैंक माना जाता रहा है।
इन विधायकों के बसपा में जाने को राजनीतिक हल्कों में पश्चिमी यूपी में मुसलमानों के सियासी मिजाज के आईने के तौर पर देखा जा रहा है। उन्हें हाथी की सवारी साइकिल से बेहतर लग रही है।
तिलोई के विधायक डॉ. मुस्लिम का बसपा में जाना चौंकाने वाला ही नहीं कांग्रेस के लिए चिंता का सबब हो सकता है। गांधी परिवार के गढ़ में दो बार के विधायक को अपनी वापसी का भरोसा नहीं है।
यह बात कांग्रेस में पीके की रणनीति और राज बब्बर व शीला दीक्षित की ताजपोशी के बाद माहौल में बदलाव के दावे पर भी सवाल उठा रही है। यह इसलिए और महत्वपूर्ण हो जाता है कि बसपा में जाने वाले चार मुस्लिम विधायकों में तीन कांग्रेस के हैं।
बसपा से सध सकते हैं 2017 के समीकरण
मुस्लिम विधायकों को हाथी की सवारी से 2017 में फिर से विधानसभा में वापसी की उम्मीद है। दरअसल, पश्चिमी यूपी की अधिकतर सीटों पर दलित व मुस्लिम वोटों की तादाद ठीक-ठीक है।
दलित-मुस्लिम गठजोड़ कांग्रेस, सपा के बागी मुसलमान विधायकों के लिए राजनीतिक तौर पर सबसे मजबूत और मुफीद ठिकाना हो सकता है। नवेद मियां का रामपुर की राजनीति में आजम खां से 36 का आंकड़ा है। कांग्रेस में वह खुद को सुरक्षित नहीं पा रहे थे।
जाहिर है, ऐसे में उम्मीदों को बसपा ही परवान चढ़ा सकती है। यही स्थिति नवाजिश आलम की है। वह मुजफ्फरनगर के सर्वाधिक दंगा प्रभावित बुढ़ाना क्षेत्र से विधायक हैं। क्षेत्र में उनसे नाराजगी है।
माना जा रहा है कि बुढ़ाना के बजाय वह मीरापुर सीट पर दलित-मुस्लिम गठजोड़ के सहारे फिर से विधानसभा में एंट्री की उम्मीद लगाए हैं। दिलनवाज खां को लगता है कि अकेले कांग्रेस के दम पर वह चुनाव नहीं जीत पाएंगे। बसपा में जाकर उनकी जीत की राह आसान हो सकती है।
'2017 का माहौल बन रहा है पक्ष में'
चार मुस्लिम विधायकों को शामिल करके बसपा ने दलित और मुसलमानों में यह विश्वास जमाने की कोशिश की है कि 2017 के लिए उसके पक्ष में माहौल बन रहा है।
यूं भी बसपा इस समीकरण को लगातार पुख्ता करने में लगी है। पश्चिमी यूपी में बसपा प्रत्याशियों के चयन से भी इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
बसपा ने टिकट देने में मुसलमानों को खास तरजीह दी है। उनके पक्ष में दलितों को लामबंद करके बहुत सारी सीटों का समीकरण साधा जा सकता है।