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नवाबों की बहुत खास रही हैं बावलियां

Thu, 22 Aug 2013 03:01 PM IST
लखनऊ/इंटरनेट डेस्क
लखनऊ/इंटरनेट डेस्क Updated Thu, 22 Aug 2013 03:01 PM IST
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baolies in lucknow

लखनऊ में जितने बाग, तालाब और बाड़े हैं उससे कम बावलियां भी नहीं हैं। कहते हैं वापी का संशोधित नाम ही बावली है। यहां सबसे पुरानी बावली ऐतिहासिक लक्ष्मण टीले के शेष तीर्थ के उस कुंड को माना जा सकता है जिस पर कभी देश के लोग जुटते थे।

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उनकी मान्यता थी कि इस वापी में चढ़ाया गया पत्र पुष्प नैवेद्य शेष भगवान को अर्पित-समर्पित होता है। कहते हैं कि शेष मूर्ति का काला फन यहां के भरों ने ले जाकर नगर के पश्चिम में एक स्थान पर जमीन में दबा दिया था जिसे कालीदह कहकर लोग पुकारते थे।
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यहीं आलमगीर के नाम से आलगनगर की स्थापना हुई। नवाबी में इसी स्थान पर बाद में नवाब का एक हाथी 'काला पहाड़' दफना दिया गया और तब से ही उस स्थान को काला पहाड़ कहा जाने लगा।
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काले खां की मजार के नाम से मशहूर इस स्थान पर लोग आज भी जुटते हैं और काले खां पीर पर यहां के लोगों की बड़ा श्रद्धा है।

शाही बावली

लखनऊ में नवाब आसफुद्दौला के इमामबाड़े के बायीं ओर बनी हुई इस बावली पर हिंदू भवन की पूरी छाप है। जानकार मानते हैं कि सन् 1784 के अकाल में अवध के चौथे नवाब आसफद्दौला ने मच्छी भवन के निकट ये शाही बावली बनवाई थी। वैसे कुछ लोगों का यह भी मानना है कि इस जगह पर बावली बहुत पहले से ही थी, नवाब ने इसका जीर्णोद्धार कराया और इमामबाड़े में शामिल करा लिया। बावली का प्रवेश द्वार ऊंचा और सादी मेहराब से बना हुआ है। अंदर पहुंचने पर सीढ़ी पानी में उतर जाती हैं। इनके अगल-बगल तीन मंजिली मेहराबों की कतारें हैं। एक बड़ी शाह-जहानी मेहराब में से पानी का प्रवाह आता हुआ मिलता है। अंदर चौड़े, गोल और गहरे कुएं पर आठ पहल में बहुखंडी गर्मियों का महल बना हुआ है। बावली महल में गर्मियों में लखनऊ आने वाले दरबारी अतिथि ठहराए जाते थे।

एक मजेदार किस्सा

इतिहासकार योगेश प्रवीण की किताब लखनऊनामा में इस बावली से जुड़ा एक मजेदार किस्सा मिलता है। वह लिखते हैं कि अवध के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह ने लखनऊ छोड़ते वक्त अपने खजाने की चाभी इसी बावली में डलवा दी थी क्योंकि ब्रिटिश सत्ता के बंदी होने के नाते वह खजाने को साथ नहीं ले जा सकते थे।

नकटी बावली

नवाब आसफुद्दौला के वक्त में ही लखनऊ मोहान मार्ग पर शाहदरा से आगे एक खूबसूरत बावली बनवाई गई जिसकी बनावट वास्तव में बड़ी प्रभावशाली है। इस छोटी बावली को सरोसा भरोसा गांवों के मालिक राजा कोइली मुहाल सिंह और भरत सिंह ने बनवाया था। मोहान रोड के बाईं तरफ बनी इस बावली में एक और गऊघाट बना हुआ है और ऊपर मेहराबदार राजपूती छतरी बनी हुई है और पीछे कुआं है। कुएं में तीन मंजिली मेहराबों का घेरा है। किसी जमाने में बादशाही फौजों का पहला पड़ाव शाहदरा में ही होता था तो सिपाहियों के पानी पीने का इंतजाम इसी बावली से होता था। हालांकि आज इस बावली की हालत बहुत खराब है और अपने विकृत रूप के कारण 'नकटी बावली' कही जाती है।

कश्मीरी मुहल्ले की बावली

इस मुहल्ले में कई पुरानी इमारतें होने के अलावा यहां की बावली भी प्रसिद्ध है। अवध के पांचवें बादशाह के वजीर रफीकुद्दौला की ड्योढ़ी के साथ वाली बावली के खंडहर अभी बाकी हैं। इन शाही इमारतों का बहुत कुछ हिस्सा शरगा पार्क में शामिल हो गया है और बावली को पूरा पाट दिया गया है। अल्मास लखौड़ियों से बनी हुई ये बावली अंगूरी बाग का नगीना थी। नवाब रफीकुद्दौला की अब्बास बाग वाली कर्बला, काकोरी रोड पर बनी हुई है और आज भी अपनी भित्ति चित्रकारी के लिए मशहूर है।

सुभद्रा की बावली

लखनऊ-वाराणसी मार्ग पर नगर से पांच मील दूर मवइया खजूरियान की बस्ती है। जिस तरह 'मऊ' बड़ी बस्तियों के नाम में जुड़ जाया करता था, छोटी बस्तियां 'मवइया' कहलाया करती थीं। कहा जाता है कि 'कल्ली पश्चिम' के अन्तर्गत आने वाले इस गांव को नवाबी जमाने में हैबल पासी ने बनवाया था। यहां बहुत से खजूर के पेड़ हैं इसलिए इसे खजूरियन भी कहते हैं। इसके पास में ही एक पुरानी बावली के खंडहर मिलते हैं। इसे महाराजा ससेंडी ने बनवाया था लेकिन इसका जीर्णोद्धार रानी सुभद्रा कुंवर ने करवाया।

चेतराम की बावली

ये कुंड राजा टिकैतराय के तालाब से कुछ ही दूरी पर है, जिसमें लखौड़ी ईंट की सीढ़ियां बनी हुईं हैं। इस बावली के किनारे दो शिवाले और एक हनुमान जी मंदिर है। माना जाता है कि नवाबी जमाने में चर्मकारों के एक पूर्व पुरुष चेतराम जी ने इसको बनवाया था। इसी बावली के निकट छविनाथ की चौकी है, जहां गुड़िया त्योहार के दूसरे रोज मेला लगता है।


बावली सआदतगंज
लखनऊ का सआदतगंज इलाके किसी समय भारत की प्रसिद्ध अनाज मंडियों में गिना जाता था। इसी मंडी के पास एक पुरानी बावली थी जिसके नाम से यह मुहल्ला बावली कहा जाता था। नवाब सआदत अली खा आठरहवीं सदी में जब लखनऊ आया करते थे तो बावली कोठी में रुका करते थे। हालांकि आज इस बावली का कोई नामो-निशां नहीं है।

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