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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   Battle of UP: Now the potato belt is in turmoil, farmers will take the test, 36 out of 59 seats in the third phase are affected by potato growing farmers

यूपी का रण : अब आलू बेल्ट में घमासान, किसान लेंगे इम्तिहान, तीसरे चरण की 59 सीटों में से 36 पर आलू उत्पादक किसानों का है प्रभाव

Wed, 16 Feb 2022 02:23 AM IST
पंकज श्रीवास्‍तव चंद्रभान यादव, अमर उजाला, लखनऊ
चंद्रभान यादव, अमर उजाला, लखनऊ Published by: पंकज श्रीवास्‍तव Updated Wed, 16 Feb 2022 02:23 AM IST
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सार
विधानसभा चुनाव में तीसरे चरण में शामिल 16 जिलों की 59 विधानसभा क्षेत्रों में 36 विधानसभा क्षेत्र आलू उत्पादक हैं। यादव, कुर्मी बहुलता वाले इन इलाकों में किसान आलू को खरा सोना मानते हैं। अगर आलू के उत्पादन क्षेत्रों के हिसाब से देखें तो देश का सबसे बड़ा आलू उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश है।
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Battle of UP: Now the potato belt is in turmoil, farmers will take the test, 36 out of 59 seats in the third phase are affected by potato growing farmers
आलू - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

आगरा एक्सप्रेसवे पर कन्नौज की सीमा शुरू होते ही खेतों में हर तरफ आलू की चमक दिखाई पड़ती है। कहीं खेतों में खोदाई चल रही है, तो कहीं आलू के ढेर लगे हैं। खेतों के बीच खड़े ट्रैक्टरों पर आलू की बोरियां लदने के बाद किसानों के चेहरे पर जल्द मेहनत की कीमत मिलने की आस दिखती है। मजदूरों के साथ आलू की खोदाई में लगे रामू कटियार कहते हैं, इस बार पैदावार तो ठीक है, बस अच्छे दाम का इंतजार है। 10 फरवरी को भाव 800 रुपये क्विंटल था, पर यह तय नहीं है कि आगे भी यही स्थिति रहेगी। न्यूनतम भाव तय हो जाए तो किसान इत्मीनान की सांस ले। वह सवाल करते हैं कि आखिर गन्ने की तरह आलू का भाव क्यों तय नहीं होता है? आलू का औद्योगिक विकास क्यों नहीं हो रहा है? हर दूसरे साल आलू फेंकने की नौबत क्यों आती है? इसे लेकर समूचे आलू बेल्ट के किसानों में सभी दलों के प्रति गुस्सा है।

कुछ ऐसा ही सवाल फर्रुखाबाद के बुढ़नामऊ के किसान रजत कटियार भी करते हैं। खेत में आलू की खोदाई में व्यस्त रजत कहते हैं कि हर चुनाव में चिप्स, अल्कोहल फैक्टरी और आलू पाउडर बनाने की बात उठती है। इस चुनाव में भी राजनीतिक दल इसके दावे करने लगे हैं। लेकिन यह दावा हकीकत में बदल पाएगा, इस पर संशय है। ऐसे में वोट उसे ही देंगे, जो आलू किसानों की बात करेगा। कमालगंज के इंद्रेश हों या कायमगंज के आकिब खां, सियासी दलों की आलू किसानों के प्रति उदासीनता से नाराज हैं। अलबत्ता घोषणा पत्र के सवाल पर वे कहते हैं कि कुछ ने ज्यादा तो कुछ ने कम, आलू से जुड़ी बातें रखी हैं। पर, ऐसी घोषणाएं तो हर चुनाव में होती हैं। वे धरातल पर उतरेंगी, इसमें संशय है।

फर्रुखाबाद से आगे बढ़ने पर कायमगंज से लेकर एटा तक और मैनपुरी से फिरोजाबाद तक खेतों में आलू के ढेर लगे हैं। सातनपुर आलू मंडी में पहुंचने वाले किसान सवाल उठाते हैं उनकी उपज की बिक्री को लेकर सरकार गंभीर क्यों नहीं होती है? आलू आधारित उद्योग नहीं लगने की वजह से उनके बच्चे उन्हें छोड़कर दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों में रहने के लिए विवश हैं। क्योंकि, आलू से मिलने वाले रुपये से सिर्फ पेट भरता है। जीवन स्तर नहीं सुधारा जा सकता है। बेटी की शादी हो या बेटे की कोचिंग की फीस, इसकी भरपाई आलू की उपज नहीं कर पाती है। 

एटा के प्रगतिशील किसान बृजेश यादव एवं संजय वर्मा कहते हैं, हमेशा की तरह चुनावी सीजन में चिप्स फैक्टरी, अल्कोहल फैक्टरी, प्रसंस्करण आदि की सबको याद आ रही है। फर्रुखाबाद के नवाबगंज में चिप्स फैक्टरी के लिए 2013 में और कन्नौज में वोदका फैक्टरी के लिए जमीन अधिगृहीत की गई, लेकिन नतीजा सिफर रहा। 

मथुरा में आलू चिप्स उत्पादन इकाई की बात चली, लेकिन किसानों को कोई फायदा नहीं मिला। अलीगंज के विक्रम सिंह यादव कहते हैं, आलू में परता (मुनाफा) कम होता जा रहा है। इसलिए सड़क के किनारे की जमीनों पर दुकान बनवा दिए हैं। दो साल तक आलू की खेती में फायदा होता है। तीसरे साल अचानक मूल्य में गिरावट होती है और लागत भी नहीं निकल पाती है। करीब 10 साल से यही ट्रेंड चल रहा है।


इसलिए सियासत के केंद्र में आलू उत्पादक किसान
विधानसभा चुनाव में तीसरे चरण में शामिल 16 जिलों की 59 विधानसभा क्षेत्रों में 36 विधानसभा क्षेत्र आलू उत्पादक हैं। यादव, कुर्मी बहुलता वाले इन इलाकों में किसान आलू को खरा सोना मानते हैं। अगर आलू के उत्पादन क्षेत्रों के हिसाब से देखें तो देश का सबसे बड़ा आलू उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश है। यहां करीब 6.1 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में आलू बोया जाता है। प्रदेश में करीब 147.77 लाख मीट्रिक टन आलू का उत्पादन हुआ है। आगरा से शुरू होकर मथुरा, इटावा, फर्रुखाबाद से लेकर कानपुर देहात तक फैले आलू बेल्ट में देश में होने वाली कुल पैदावार का करीब 30 फीसदी हिस्सा पैदा होता है। डीजल की कीमतों में वृद्धि, डीएपी और यूरिया की कमी, तैयार आलू आढ़ती के सहारे होने का दर्द किसानों को बेचैन किए रहता है।

घोषणा पत्रों में आलू किसानों के लिए प्रमुख योजनाएं
भाजपा : मेगा फूड पार्क, एक जनपद एक उत्पाद, फूड प्रॉसेसिंग, किसानों को सिंचाई के लिए मुफ्त बिजली, स्टोरेज प्लांट आदि।
सपा : किसान आयोग का गठन, ग्रीन फील्ड परियोजनाओं के लिए लैंड बैंक की स्थापना, किसानों को सिंचाई के लिए मुफ्त बिजली, ब्याज मुक्त कर्ज, हर 10 किलोमीटर के दायरे में किसान बाजार नेटवर्क के तहत बाजार की स्थापना, सभी मंडलों में फूड प्रॉसेसिंग क्लस्टर। प्रदेश में पांच जगह फूड प्रॉसेसिंग क्लस्टर, कन्नौज में कंटेनर डिपो के साथ आलू निर्यात क्षेत्र की स्थापना।
कांग्रेस : कोल्ड स्टोरेज और खाद्य प्रसंस्करण को बढ़ावा, हर ब्लॉक में कोल्ड स्टोरेज की व्यवस्था।

आलू आधारित उद्योग लगें तो सबको मिले फायदा
फर्रुखाबाद आलू आढ़ती एसोसिएशन के अध्यक्ष रिंकू कटियार कहते हैं, यहां का आलू पश्चिम बंगाल, असम के साथ ही नोएडा भी जाता है। नोएडा में आलू पाउडर बनाने की कंपनी है। यदि यह सुविधा आलू बेल्ट में हो जाए, तो यहां के किसानों और आढ़तियों, दोनों को फायदा मिलेगा।

हर जिले में आलू की गुणवत्ता जांचने की हो व्यवस्था
इंडियन पोटैटो ग्रोवर एंड एक्सपोर्ट सोसायटी के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुधीर शुक्ला कहते हैं, हर जिले में गुणवत्ता जांचने की व्यवस्था हो जाए तो अन्य राज्यों में आलू भेजना आसान हो जाय। वर्ष 2012 में सपा सरकार बनने पर तत्कालीन सहकारिता मंत्री शिवपाल सिंह यादव ने पहल की थी। उन्होंने निर्यात को बढ़ावा देने के लिए मंडी परिषद केे किसानों को प्रशिक्षण दिलाया। बाद में पता चला कि निर्यात के लिए जरूरी रोगमुक्त प्रमाण पत्र दिए जाने की यहां व्यवस्था ही नहीं है। गन्ना परिषद की तरह आलू विकास परिषद, आलू आयोग का गठन हो, नए बीज के लिए अनुसंधान केंद्र बने और निर्यात की दृष्टिकोण से किसानों को आलू बीज उपलब्ध कराए जाएं। सरकार आलू की लागत का मूल्यांकन करे और खोदाई के वक्त बाजार भाव तय करे, तो किसानों का फायदा होने लगेगा।

 

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