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UP News : 20-20 साल से एक ही जिले में जमे हैं समाज कल्याण विभाग के बाबू, कई तो गंभीर भ्रष्टाचार में शामिल

Mon, 01 Aug 2022 10:00 PM IST
पंकज श्रीवास्‍तव अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ Published by: पंकज श्रीवास्‍तव Updated Mon, 01 Aug 2022 10:00 PM IST
सार

नियमानुसार, एक जिले में बाबू तीन साल और मंडल में सात साल तैनात रह सकता है। लखनऊ का समाज कल्याण विभाग पिछले दिनों पारिवारिक लाभ योजना में गड़बड़ियों के लिए काफी चर्चित रहा। इसमें गड़बड़ करने वाले दलालों की स्थानीय कर्मचारियों से मिलीभगत जगजाहिर है।

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Babu of Social Welfare Department has been stuck in a district for 20 years, laws fail in front of setting
सांकेतिक तस्वीर

विस्तार

समाज कल्याण विभाग के बाबुओं के आगे मानो सारे नियम-कायदे फेल हैं। वे 20-20 साल से एक ही जिले में जमे हैं। नीति के तहत उनका ट्रांसफर होता भी है तो उसी जिले में रुकने का कोई न कोई तरीका निकाल लेते हैं। प्रदेश के पूर्वी से लेकर पश्चिमी हिस्से तक यही हाल है। इसमें विभाग के ही कुछेक अधिकारियों की मिलीभगत किसी से छिपी नहीं है।

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ये सभी बाबू जिला समाज कल्याण कार्यालयों में तैनात हैं। नियमानुसार, एक जिले में बाबू तीन साल और मंडल में सात साल तैनात रह सकता है। लखनऊ का समाज कल्याण विभाग पिछले दिनों पारिवारिक लाभ योजना में गड़बड़ियों के लिए काफी चर्चित रहा। इसमें गड़बड़ करने वाले दलालों की स्थानीय कर्मचारियों से मिलीभगत जगजाहिर है। इसके बावजूद यहां एक बाबू 20 साल से अधिक समय से जमा हुआ है। एक अन्य बाबू को भी 10 साल से अधिक हो गए हैं। एक बाबू तो ट्रांसफर होने के बावजूद भी जिले में ही जमा हुआ है। इतना ही नहीं लंबे अरसे से एक ही योजना देख रहे बाबू का पिछले 15 वर्षों में दो-तीन बार तबादला हुआ, लेकिन हर बार वह अपना तबादला रुकवाने में सफल रहा।
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इसी तरह से बाराबंकी में तीन बाबुओं को 20 वर्ष से अधिक समय हो गया है। 10 साल से जमे एक अन्य बाबू का पिछले साल ट्रांसफर किया गया, पर अभी भी वह इसी जिले में है। अयोध्या में भी यही स्थिति है। गाजियाबाद और बहराइच में भी हाल खराब है। आगरा में तो बाबुओं को 8 साल से लेकर 20 साल तक का समय हो चुका है। खास बात यह है कि इस अवधि में ये बाबू एक ही योजना देख रहे हैं। जिले से बाहर भेजना तो दूर इनका पटल तक परिवर्तित नहीं किया गया है। नोएडा के छात्रवृत्ति घोटाले में जेल गए एक बाबू का तो  गजब का रौला है। जेल से जमानत पर बाहर आने के बाद उसका वाराणसी और फिर ललितपुर ट्रांसफर किया गया, पर उसने मेडिकल ग्राउंड पर वहां ज्वाइन ही नहीं किया। वर्तमान में वह गाजियाबाद में तैनात है। उसकी अब तक की नौकरी गाजियाबाद-नोएडा में ही रही है। अलीगढ़, हाथरस, अमरोहा, फिरोबाद, फतेहपुर, वाराणसी, प्रयागराज और इटावा में भी ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं।
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नियमों का हवाला दिया जाता है कि एक साल में अधिकतम 10 फीसदी बाबुओं को ही इधर से उधर किया जा सकता है। यहां सवाल यह है कि पिछले 20 साल के रोटेशन में भी कभी इन बाबुओं का नंबर क्यों नहीं आया। जरूरत तो पड़ताल किए जाने की है कि इन बाबुओं को किनका वरदहस्त प्राप्त है। इतना ही नहीं 10 फीसदी की सीमा पार होने पर विभागीय मंत्री की अनुमति से इन बाबुओं को हटाया जा सकता है लेकिन इसकी भी जरूरत नहीं समझी जाती। वर्तमान में यह हाल तब है, जब समाज कल्याण मंत्री असीम अरुण ने पूरी पारदर्शिता से काम करने के निर्देश अधिकारियों को दिए हैं।

क्यों नहीं हिलाए जाते ये बाबू
जिलों में समाज कल्याण अधिकारी कोई भी तैनात किया जाए, पर सारा कामकाज ये बाबू ही संभालते हैं। यह अच्छी तरह से जानते हैं कि कहां किस तरह से सेटिंग होनी है और किन लोगों को साधना है, जिससे शिकायतें ऊपर तक न जाएं। विभागीय सूत्रों का ही कहना है कि वर्षों से जमे इन बाबुओं की संपत्ति की जांच करा ली जाए, तो हकीकत सामने आने में देर नहीं लगेगी। वहीं, एक विभागीय अधिकारी ने नाम न छापने के आग्रह के साथ बताया कि अगर ये बाबू दूसरे जिले या मंडल में नियमानुसार स्थानांतरित होते रहें, तो भ्रष्टाचार में काफी कमी आ सकती है।


स्थानांतरण नीति के तहत अधिकतम 10 फीसदी बाबुओं का ही ट्रांसफर किया जा सकता है। इसलिए इस साल इस सीमा में आए 40 बाबुओं का ट्रांसफर कर पाए। अब बीच में ही नए सिरे से प्रस्ताव लाकर और सक्षम स्तर से अनुमति लेकर वर्षों से जमे बाबुओं को हटाया जाएगा। - राकेश कुमार, समाज कल्याण निदेशक

बाबुओं के वर्षों से एक ही जिले में जमे होने संबंधी तथ्यों की जांच कर कार्यवाही की जाएगी। - हिमांशु कमार, प्रमुख सचिव, समाज कल्याण

 

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