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'पुलिस की पाठशाला' में बोले आयुष्मान खुराना, सभी नागरिक बराबर, नहीं होना चाहिए भेदभाव

Wed, 26 Jun 2019 08:21 PM IST
Amulya Rastogi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Published by: Amulya Rastogi Updated Wed, 26 Jun 2019 08:21 PM IST
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Ayushmann Khurrana in amar ujala's police ki paathshala program in lucknow
पुलिस की पाठशाला कार्यक्रम में आयुष्मान खुराना। - फोटो : amar ujala

सभी नागरिक बराबर हैं, ऐसा केवल संविधान ही नहीं कहता, बल्कि एक प्रगतिशील समाज की भी यही सोच होनी चाहिए। हिंदी सिनेमा के जाने-माने अभिनेता आयुष्मान खुराना ने सोमवार को लखनऊ के युवाओं और किशोरों के सामने इस बात को उदाहरणों के साथ रखा। मौका था, अमर उजाला की ओर से आयोजित कार्यक्रम 'पुलिस की पाठशाला' का। कार्यक्रम का आयोजन गोमतीनगर स्थित लखनऊ पब्लिक स्कूल एंड कॉलेज के सभागार में किया गया था। जिसमें शहरवासियों के साथ ही लखनऊ के कई स्कूलों व संस्थान के विद्यार्थी शामिल हुए।

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इस खास मौके पर पुलिस विभाग से एडीजी आदित्य मिश्रा भी शामिल हुए। इस दौरान उन्होंने लोगों को पुलिस विभाग के काम करने के तरीके, यूपी के सामाजिक ढांचे में जाति व धर्म आधारित भेदभावों और संविधान के अनुच्छेद 15 के विषय में बताया। दरअसल, आयुष्मान खुराना की फिल्म 'आर्टिकल 15' शुक्रवार को रिलीज हो रही है। जिस उन्होंने अपने फैंस से बात की और उनके सवालों के जवाब दिए। इस फिल्म में आयुष्मान खुराना एक आईपीएस अफसर की भूमिका निभा रहे हैं।

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कार्यक्रम में आयुष्मान खुराना को देखने और सुनने का चाव ऐसा था कि दोपहर दो बजे से ही युवा आयोजन स्थल पर जुटने लगे थे। इस दौरान कई अपने परिवारों के साथ पहुंचे। आयोजन शुरू होने तक करीब डेढ़ हजार लोगों से सभागार खचाखच भर चुका था और बड़ी संख्या में दर्शकों ने खड़े रहकर आयोजन का आनंद लिया।

लखनऊ के बारे में आयुष्मान खुराना ने कहा कि इस शहर से मुझे बहुत प्यार है। मैं अपनी हर दूसरी फिल्म यहीं शूट कर रहा हूं। उन्होंने कहा कि मेरी बीवी तो कहती है कि यहीं पर घर बसा लो।

जातिवादी समस्याओं को सुलझाने में पुलिस को आती है दिक्कत

कार्यक्रम में एडीजी, सीबीसीआईडी आदित्य मिश्रा ने कहा, पुलिस का संगठन उतनी तेजी से नहीं बदला है जितनी तेजी से बदलाव होना चाहिए था। बदलाव एकदम से नहीं होते। समय तो लगता ही है। आज भी कहीं न कहीं हम ब्रिटिश विरासत को लेकर चल रहे हैं। यह भी एक वजह है जो पुलिस की कार्यप्रणाली पूरी तरह से नहीं बदल पाई है।

हम लोग इससे उबर रहे हैं। लोगों का डर खत्म हो रहा है और वे पुलिस के पास आ रहे हैं। समय के साथ और बदलाव नजर आएगा। जातिवादी समस्याओं को सुलझाने में पुलिस को भी काफी दिक्कतें आती हैं। पुलिस भी ऐसी व्यवस्था में काम करती है जो समाज द्वारा बनाई गई है। वहीं राज्य की राजनीति भी कहीं न कहीं जातिवाद से प्रभावित रहती है। इसका असर भी बहुत पड़ता है।

इस तरह की फिल्में समाज और संगठन को आइना दिखाती हैं। समाज में क्या हो रहा है यह देखने के बाद उस पर आप थोड़ा विचार करते हैं। आप उनमें सुधार लाने के लिए ध्यान भी देते हैं। इस तरह की फिल्में बनेंगी तो हमें भी इन समस्याओं को लेकर सुधार लाने में मौका मिलेगा।


माहिया न आया... सुनाकर कायम किया जादू
आयोजन के दौरान मेजबानों ने जब आयुष्मान को अपनी फिल्म का एक डायलॉग सुनाने के लिए कहा तो इस पर आयुष्मान ने माइक उठाया और दर्शकों से मुखातिब होकर पूछा ‘डॉयलॉग के बजाय गाना चलेगा?’, दर्शकों ने जोरदार हूटिंग से इसका समर्थन किया। इसके बाद ‘माहिया न आया...’ की डिमांड भी हो गई। इसे प्रस्तुत कर आयुष्मान ने सभी को मुग्ध कर दिया।

आयुष्मान ने खुद गाया राष्ट्रगान
पाठशाला के समापन से पहले हुए राष्ट्रगान में तारतम्यता बनाए रखने के लिए आयुष्मान ने खुद माइक पर इसे गाया और मौजूद दर्शकों ने उनका साथ दिया। कार्यक्रम खत्म होने पर युवाओं ने आयुष्मान के साथ सेल्फी ली। आयुष्मान भी पूरे मूड में थे। उन्होंने खुद कई युवाओं के फोन लेकर उनके साथ सेल्फी ली।


 

'आर्टिकल 15' पर बताई रोचक बातें

अभिनेता आयुष्मान खुराना के साथ उनकी आने वाली फिल्म ‘आर्टिकल 15’ को लेकर काफी रोचक बातें भी हुईं। उन्होंने अपने फिल्मी सफर और फिल्मों में जिस तरह के विषयों को चुनते हैं, उनको लेकर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि आज दर्शक फिल्म देखकर घर पर कुछ अलग लेकर जाना चाहते हैं। फिल्मों में सामाजिक सराकारों को कितना स्थान मिलना चाहिए इसे लेकर भी उन्होंने बेबाकी से बात रखी। पेश है अमर उजाला के कार्यक्रम में आयुष्मान खुराना से बातचीत के अंश।

सवाल- आपने इतनी फिल्में की हैं। सभी फिल्मों का विषय काफी अलग होता है। ‘आर्टिकल 15’ जैसी फिल्मों का चयन करते हुए क्या कभी डर नहीं लगता कि फिल्में ओपनिंग में कैसा परफॉर्म करेंगी?

जवाब-
नहीं, मैं फिल्मों का चयन करते वक्त यह सब नहीं सोचता। ‘आर्टिकल 15’ का चयन करते वक्त मैंने यह सोचा कि समाज की ऐसी कुरीतियों को बखूबी उठाया जाना चाहिए। मैं चाहता हूं कि जात-पात के नाम पर जो समाज में घटित हो रहा है, उसकी सच्चाई सभी के सामने लानी चाहिए। समाज में एकदम से बदलाव नहीं आएगा। इन मुद्दों पर बहस होनी चाहिए। तभी समाज में धीरे-धीरे बदलाव आएगा।

सवाल- पहली बार पुलिस से आपका कब वास्ता पड़ा?

जवाब-
पुलिस से वास्ता तो बचपन में हो ही गया था। घर का माहौल ही ऐसा था। जब मैं छोटा था करीब सात-आठ वर्ष का तभी से अपने घर में पुलिस के अधिकारियों को आते-जाते देख रहा हूं। तत्कालीन आईपीएस केपीएस गिल घर पर आते थे, जिन्होंने आतंकवाद को खत्म करने में बड़ी भूमिका निभाई। उनसे काफी प्रभावित हुआ। वहीं मेरी पत्नी के पिता आईजी पंजाब रह चुके हैं। और भी कई दोस्त हैं जो पुलिस में हैं। तो पुलिस के बीच उठना-बैठना बचपन से ही रहा है।

'अभी भी ग्रामीण क्षेत्रों में नाम के बाद आपकी जाति पूछी जाती है'

सवाल- फिल्म में आपका कैरेक्टर कहां फिट होता है। फिल्म में कैरेक्टर की एंट्री कहां होती है?

जवाब-
मेरा कैरेक्टर जो फिल्म में है वह अयान रंजन का है जो दिल्ली और यूके में पढ़ चुका है। तो फिल्म में एक शहरी भारतीय का गांव के प्रति नजरिया दिखाया गया है। वह बाहर से आता है उसकी पोस्टिंग गांव में होती है जहां जात-पात काफी हावी होता है। नाम पूछने के बाद आपकी जाति पूछी जाती है तब सोचते हैं कि बात करें कि नहीं। इस तरह का गांव देखकर वह चौंक जाता है। सोचता है कि 2019 में भी हिंदुस्तान में ऐसा हो रहा है। यह सब उसे आश्चर्यचकित करता है और वह इन सब चीजों को सुलझाने की कोशिश करता है। इसी बीच एक घटना होती है जिसे वह सुलझाने में लग जाता है।

सवाल- आप कहते हैं कि हर बड़े कलाकार को सामाजिक समस्याओं पर फिल्में करनी चाहिए। आपने ऐसी फिल्मों से भी शुरूआत की जिनके विषयों को लेकर घर में बात नहीं की जाती है। तो ऐसे कैरेक्टर को करते समय आपके जेहन में क्या चल रहा होता है, क्यों ये विषय को चुन रहा हूं?

जवाब-
मेरा कॅरिअर ग्राफ केवल रिस्की सब्जेक्ट का रहा है। यह मेरी यूएसपी है कि जिन लोगों को उन विषयों पर काम करने से डर लगता है। यह एक ऐसा युग है, जहां आप हर तरह की फिल्में कर सकते हैं और उस तरह की फिल्में कर सकते है जहां लोगों को ट्रेलर देखकर ही कुछ अलग लगे। हां, इसमें खतरा बहुत है लेकिन इस तरह की फिल्में काफी चल रही हैं। इसका क्रेडिट दर्शकों को जाता है जो कॉमर्शियल फिल्मों से कुछ अलग देखना चाहते हैं, उनको एक्साइटमेंट दिखता है। वे घर कुछ लेकर जाना चाहते हैं चाहे वो सामाजिक संदेश हो। चाहे ऐसा ही विषय क्यों न हो जिसको लेकर घर के ड्राइंग रूम में बात नहीं कर सकते। यहां तक कि हमारी जातिवाद पर भी किसी फिल्म में इतनी बेबाकी से बात नहीं की गई जो ‘आर्टिकल 15’ में दिखाई गई हो।


अनुभव सिन्हा पर कही ये बातें

सवाल- आपकी फिल्म के निर्देशक हैं अनुभव सिन्हा जो लगातार कॉमर्शियल फिल्में बनाते आए हैं। इससे पहले उन्होंने मुल्क का निर्देशन किया था। क्या आपने यह फिल्म मुल्क देखने से पहले साइन की थी या फिर देखने के बाद?

जवाब-
मैंने यह फिल्म मुल्क देखने के बाद साइन की थी। वो ऐसी फिल्म है जिसे देख-देखकर मैं काफी उत्सुक हुआ। इस फिल्म को देखकर उनके प्रति आदर और बढ़ गया। निर्देशक के तौर पर उन्होंने काफी कॉमर्शियल फिल्में की हैं। एक कलाकार की जर्नी होती है और उन्होंने मुल्क फिल्म से अपने आप के कलाकार की और खोज की। उनका अपना एक नजरिया है। वे समझते हैं देश की जटिलता को। सामाजिक और सांस्कृतिक तौर पर काफी जागरूक हैं। इस फिल्म को लेकर मैं शुरू से ही उत्सुक था।

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