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UP: कागज के एक टुकड़े से टूटा था अटल का बलरामपुर से नाता, पर्ची में नाम निकला तो ग्वालियर से चुनाव लड़े वाजपेयी

Tue, 16 Apr 2024 11:24 AM IST
शाहरुख खान तेज प्रताप सिंह, अमर उजाला, गोंडा
तेज प्रताप सिंह, अमर उजाला, गोंडा Published by: शाहरुख खान Updated Tue, 16 Apr 2024 11:24 AM IST
सार

कागज के एक टुकड़े से अटल बिहारी वाजपेयी का बलरामपुर से नाता टूट गया था। पर्ची में नाम निकला तो अटल बिहारी ग्वालियर से चुनाव लड़े थे।

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Atal Bihari Vajpayee ties with Balrampur were broken with a piece of paper
Atal Bihari Vajpayee - फोटो : bjp.org

विस्तार

मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक कागज के टुकड़ों की अहम भूमिका होती है। इन्हीं कागज के टुकड़ों से रिश्ते जुड़ते हैं और कई बार टूट जाते हैं। राजनीति के क्षेत्र में भी कागज के टुकड़ों पर भविष्य तय होते हैं और इसी से कर्मस्थली से नाता टूट भी जाता हैं, लेकिन यह कम लोगों को पता होगा कि इसी कागज की पर्ची के खेल से अटल बिहारी वाजपेयी का बलरामपुर से नाता टूट गया था।
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साल 1957 में पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी अविभाजित गोंडा जिले के बलरामपुर संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़े। तब उनकी पार्टी अखिल भारतीय जनसंघ का चुनाव निशान दीपक था और पार्टी ने कागज पर फरमान जारी कर उन्हें सिंबल प्रदान किया था। 
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वह जब चुनाव जीते तो निर्वाचन आयोग की ओर से कागज पर ही जीत का प्रमाण पत्र दिया गया। इन्हीं कागजों से उनका बलरामपुर से रिश्ता जुड़ गया था। साल 1962 में हारने के बाद उन्होंने 1967 में जीत हासिल की तब भी कागज के पन्ने पर ही जीत का प्रमाण पत्र मिला था, लेकिन 1971 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और जनसंघ ने उन्हें ग्वालियर से चुनाव लड़ाने का फैसला किया।
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अटल बिहारी वाजपेयी को ग्वालियर से लड़ाने की बात बलरामपुर तक पहुंची तो आनन-फानन में कार्यकर्ताओं ने बैठक कर तय किया कि संघ के निर्णय का विरोध होगा और अटल जी को बलरामपुर से ही लड़ाया जाएगा। 
 

बलरामपुर के कार्यकर्ताओं में ग्वालियर से अटल के लड़ने को लेकर काफी नाराजगी थी। तय हुआ कि दिल्ली मे हाईकमान से मिलकर इसका इजहार कर निर्णय बदलवाया जाय। इसके लिए प्रताप नरायन तिवारी की कार से मदन मोहन शर्मा व नरेंद्र बहादुर पाठक लखनऊ जाकर जनसंघ के दिग्गज नेता सुंदर सिंह भंडारी से मिले और दूसरे प्रत्याशी के हार जाने का वास्ता देते हुए विरोध दर्ज कराया। भंडारी ने कहा कि एक सीट हारने से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला।

तीसरी पर्ची से टूट गया बलरामपुर से नाता
भंडारी के जवाब से क्षुब्ध बलरामपुर के जनसंघ नेताओं ने दिल्ली जाकर वाजपेयी से उनके बंगले पर मिले और बलरामपुर से ही चुनाव लड़ने की जिद करने लगे। शाम को पार्टी के मंत्री कृष्णलाल शर्मा भी आ गए तो मदन मोहन शर्मा ने फिर अपनी बात रखी। अटल बिहारी वाजपेयी पशोपेश में थे तभी कृष्णलाल शर्मा ने कहा कि पर्ची डाल ली जाय और जहां का नाम निकले अटल जी वहीं से चुनाव लड़ें।

कागज के एक टुकड़े पर बलरामपुर तो दूसरे पर ग्वालियर लिखकर उसे मोड़ कर रखा गया। रसोइया बहादुर को एक पर्ची उठाने के लिए कहा गया तो उसने पर्ची उठाई, जिसमें ग्वालियर लिखा था। बलरामपुर के लोगों के उदास चेहरे को देखते हुए कृष्णलाल शर्मा ने दूसरी पर्चियां बनाईं और मदन मोहन से उठवाया तो उसमें बलरामपुर निकला। लेकिन अटल बिहारी ने कहा कि यह खेल तो बराबर हो गया।

अब तीसरी बार जो नाम निकलेगा वह फाइनल होगा। इस बार पर्ची कृष्णलाल शर्मा ने खुद उठाई तो उसमें ग्वालियर ही लिखा था। कागज के इसी खेल से अटल बिहारी वाजपेयी का बलरामपुर से नाता टूट गया और पार्टी ने ग्वालियर से उनका टिकट फाइनल कर दिया। चुनाव हुए तो बलरामपुर से चुनाव लड़े जनसंघ के प्रत्याशी प्रताप नरायन तिवारी को हार का सामना करना पड़ा।
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