उत्तर प्रदेश की राजनीति में अमर हो गए अटल के ये अहम फैसले
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‘हम पड़ाव को समझे मंजिल, लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल’ जैसी कविता के रचयिता अटल बिहारी वाजपेयी को आम तौर पर शांत, सरल, संवेदनशील और सरोकारी सियासी शख्स माना जाता रहा है।
पर, प्रदेश उनके तेवर वाली भूमिकाओं का भी नजदीकी गवाह बना। खास तौर से लखनऊ। आम तौर पर राष्ट्रीय राजनीति और संकीर्ण दलीय सीमाओं से परे जाकर फैसले करने वाले अटल प्रदेश से जुड़े कई महत्वपूर्ण मौकों पर राज्य स्तर के मुद्दों पर भी सक्रिय दिखे।
पार्टी के हित में अपनी आलोचना और मान-अपमान भूलकर भूमिका का निर्वाह किया लेकिन बात जब लोकतांत्रिक परंपराओं और संविधान की आ गई तो उन्होंने दल के दबाव को भी स्वीकार नहीं किया।
1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस
प्रदेश में कल्याण सिंह सरकार थी। संघ परिवार का एक वर्ग चाहता था कि मंदिर मुद्दे को कुछ दिन ठंडा रखा जाए। पर, एक वर्ग का तर्क था कि मंदिर मुद्दे पर आंदोलन की लहर से बने माहौल ने ही भाजपा को सत्ता सौंपी है, इसलिए मंदिर बनना चाहिए। कल्याण का तर्क था कि सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में अयोध्या के विवादित ढांचे की सुरक्षा का शपथपत्र दे रखा है।
विश्व हिंदू परिषद ने 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में कारसेवा की घोषणा कर दी। संघ के शीर्ष नेतृत्व को संभवत: इस घटनाक्रम के परिणामों का पूर्वाभास था। हमेशा की तरह फिर अटल बिहारी वाजपेयी को मामला संभालने की जिम्मेदारी सौंपी गई।
अटल ने एक दिन पहले 5 दिसंबर को लखनऊ की सभा में यह कहते हुए, ‘इस बार मेरी भी कारसेवा के लिए अयोध्या जाने की इच्छा थी। पर, शायद भगवान राम मुझे अभी इसका अवसर नहीं देना चाहते। नेतृत्व ने तय किया है कि मेरी आवश्यकता कल दिल्ली में है। इसलिए मैं दिल्ली जा रहा हूं। बाकी रामभक्त अयोध्या जाएंगे। वहां वे कीर्तन-भजन करेंगे। जाहिर है कि जब इतनी बड़ी संख्या में लोग वहां जाएंगे तो न्यायालय के निर्देशों की सीमा में झाड़-झंखाड़ हटाएंगे। जमीन को समतल करेंगे।’
उन चर्चाओं के निराधार होने का संदेश दिया जिनमें उन्हें अयोध्या आंदोलन पर संघ परिवार की नीति से असहमत बताया जाता था। अगले दिन ढांचा ढह गया। कल्याण सिंह सरकार बर्खास्त कर दी गई। राष्ट्रपति शासन लग गया। केंद्र सरकार ने संघ पर प्रतिबंध लगा दिया। अटल नेता प्रतिपक्ष थे और एक बार फिर आगे आए।
उन्होंने यह कहते हुए कि जिस तरीके से यह हुआ वह पसंद नहीं लेकिन किसी मुद्दे को लंबे समय तक दबाने और जनभावनाएं न समझने के कारण ही इस तरह की स्थितियां पैदा होती हैं, मामले को हल्का किया और संघ परिवार का हौसला लौटाया।
1995 में जब दिया बसपा को समर्थन
ढांचा ढहने के बाद हुए चुनाव में भाजपा को सीटें तो ज्यादा मिलीं लेकिन सपा और बसपा ने गठबंधन कर सरकार बना ली। मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बन गए। पर, कुछ मुद्दों पर सपा और बसपा के बीच अनबन के चलते 2 अक्तूबर 1995 को सपाइयों ने स्टेट गेस्ट हाउस के उस कमरे पर धावा बोल दिया जहां बसपा नेता कांशीराम और मायावती रुके थे।
सपा और बसपा में अलगाव हो गया। राष्ट्रपति शासन के आसार बन गए, लेकिन राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले अटलजी की दूरदृष्टि ने संभवत: भांप लिया कि यही मौका है जब भविष्य में इस तरह के प्रयोगों की संभावनाएं समाप्त की जा सकती हैं।
बतौर नेता प्रतिपक्ष दबाव बनाया कि विकल्प पर गौर किए बिना राष्ट्रपति शासन लगाना ठीक नहीं है। साथ ही रणनीतिक फैसला लेते हुए प्रदेश में बसपा को भाजपा के समर्थन की घोषणा कर दी। प्रदेश में पहली बार मायावती मुख्यमंत्री बनीं। लखनऊ में पत्रकारों ने वाजपेयी से पूछा कि यह कौन-सा फॉर्मूला है। वे बोले, ‘कांटे को कांटे से निकालने वाला।’
1997 में जब जगदंबिका पाल बन गए मुख्यमंत्री
भाजपा और बसपा ने छह-छह महीने के मुख्यमंत्री के समझौते पर सरकार बनाई। मायावती पहले मुख्यमंत्री बनीं लेकिन छह महीने पूरे होने पर उन्होंने पद छोड़ने से मना कर दिया। कुछ दिन बाद ही मायावती अलग हो गईं। विधानसभा में शक्ति परीक्षण हुआ। सदन में विधायकों में मारपीट हो गई। कल्याण ने बहुमत तो हासिल कर लिया, लेकिन राज्यपाल रोमेश भंडारी ने सदन में हिंसा का हवाला देते हुए राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी। अटल फिर आगे आए।
उनके तर्कों का ही कमाल था कि तत्कालीन राष्ट्रपति के आर नारायणन ने राज्यपाल की सिफारिश स्वीकार नहीं की। भाजपा ने कुछ दलों से विधायकों का समर्थन हासिल कर सरकार बनाई लेकिन संकट टला नहीं। फरवरी 1998 में जगदंबिका पाल बागी हो गए। भंडारी ने पाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी। भाजपा नेता हक्का-बक्का। पाल मुख्यमंत्री कार्यालय में जाकर कुर्सी पर बैठ गए और हटने को तैयार नहीं थे। अटल लखनऊ आए और वीवीआईपी गेस्ट हाउस में धरने पर बैठ गए। वे विधायकों को लेकर दिल्ली भी गए। राष्ट्रपति भवन में विधायकों की परेड हुई। मामला सर्वोच्च न्यायालय तक गया। आखिरकार सभी जगह से राज्यपाल के फैसले को शून्य करार दिया गया। जगदंबिका पाल की जगह कल्याण सिंह ने कुर्सी संभाली।
कल्याण सिंह के आरोपों पर अटल की मुस्कान
जिन कल्याण सिंह के लिए अटल ने धरना दिया, वही कल्याण सिंह मुख्यमंत्री पद से हटे तो अटल पर ऐसे-ऐसे आरोप लगाए जो शायद विपक्ष का बड़े से बड़ा नेता भी न लगाता। पर, अटल से जब भी सवाल हुआ तो उन्होंने नजरअंदाज ही किया। बाद में कल्याण सिंह की इच्छा फिर भाजपा में लौटने की हुई तो अटल ही उनका सहारा बने। 24 दिसंबर को लालजी टंडन के माल एवेन्यू स्थित आवास पर अटल के जन्मदिन का कार्यक्रम था। कल्याण वहीं पर अटल को जन्मदिन की बधाई देने के बहाने पहुंच गए। उन्होंने अटल को लड्डू खिलाया। साथ ही पत्रकारों से कहा, ‘अटल पर एक अंगुली उठाई थी, आज पांचों अंगुली से लड्डू खिला रहा हूं।’ कुछ दिन बाद कल्याण भाजपा में आ गए। दूसरी बार भी कल्याण ने जब पार्टी छोड़ी तो भी उनकी वापसी अटलजी ने ही कराई। जब अटल से कल्याण को लेकर सवाल हुआ तो उन्होंने सिर्फ यही कहा, ‘कल्याण हमारे प्रिय मित्र हैं।’
नहीं बर्खास्त होने दी यूपी में सरकार
पार्टी के हित के लिए अपनी प्रतिष्ठा की परवाह न करने वाले अटल ने उस समय प्रधानमंत्री के नाते संविधान और लोकतांत्रिक परंपराओं को तवज्जो दी, जब तीसरी बार भाजपा और बसपा गठबंधन में अनबन हुई। 2002 में भाजपा के समर्थन से तीसरी बार मुख्यमंत्री बनीं मायावती ने सरकार बर्खास्त करने की सिफारिश की तो भाजपा ने समर्थन वापसी की घोषणा कर राज्यपाल से बर्खास्तगी की सिफारिश न मानने की अपील कर दी। उस समय भी भाजपा के लोग चाहते थे कि वे बसपा में सेंधमारी करके सरकार बना लें। पर, प्रधानमंत्री के रूप में अटल ने इसकी इजाजत नहीं दी। कहा जाता है कि प्रधानमंत्री के रुख को देखते हुए ही तत्कालीन राज्यपाल विष्णुकांत शास्त्री ने सपा के तत्कालीन अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव को सरकार बनाने को आमंत्रित किया।