...11 साल बाद लखनऊ तो आए पर बोले नहीं अटल!
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कहकर गए थे कि मना लोगे तो आऊंगा। लखनऊ के लोगों ने प्रयास भी बहुत किया। पर, वह आए नहीं। शायद उन्हें मनाया नहीं जा सका। कोई 11 साल बाद उन्होंने अपने दूसरे घर लखनऊ का रुख किया। पर, काफी कुछ बदला हुआ था। अटल, भस्म और अस्थियों के रूप में आए। स्थूल के बजाय सूक्ष्म शरीर में।
हॉं। एक चीज नहीं बदली थी। अटल को लेकर लखनऊ वालों का प्यार और लोगों के दिलों का सम्मान। स्वागत भी उसी शान के साथ हुआ, लोग भी खूब जुटे, वह उस बेगम हजरतमहल पार्क के सामने से भी गुजरे जहां उनकी सभाएं मित्रों और विरोधियों, अपने और परायों, दल के लोगों और विरोधी दल के लोगों को जबरन खीच ले जाती थी।
पर, एक चीज बदली थी कि इस बार शायद पहली बार लखनऊ आकर भी वह नहीं बोले। विरोधी दल के लोग इस बार भी खूब जुटे जैसे पहले जुटते थे। वह लोग भी जुटे जो अटल की पार्टी की विचारधारा से सहमत नहीं थे।
पर, अबकी वे सभास्थल के बाहर खड़े होकर सुनने नहीं आए थे बल्कि अपने प्रिय नेता को श्रद्धांजलि देने के लिए आयोजित हो रही सभा में हिस्सा लेने आए थे। लखनऊ में संभवत: यह पहला मौका था जब एक पार्टी के नेता को श्रद्धांजलि देने आए दूसरे दलों के नेता भी यह कह रह थे कि वह सिर्फ एक दल के नेता नहीं थे। वे देश के नेता थे जिन्होंने दुनिया में नाम रोशन किया।
शायद यही वजह थी कि अटल को श्रद्धांजलि देने के लिए आयोजित सभा पर भाजपा की कोई छाप नहीं दिख रही थी। भाजपा के नेता थे। पर, इस पार्टी का झंडा नहीं था। आयोजकों को शायद मालूम था कि पंचतत्व में विलीन हो चुके अटल को अब दलीय सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता।
लखनऊ की सड़कों पर पूरी धूम के साथ झूमकर चलने वाले अटल का स्थूल शरीर जब अस्थि और भस्म के रूप में सिर्फ एक कलश में बंद होकर अपनी कर्मभूमि की धरती पर पहुंचा तो लगा कि कोई यह मानने को तैयार ही नहीं है कि उनके अटल अब इस दुनिया में नहीं हैं।
अपने अटल को गले लगाने और उन्हें देखने का जोश ठंडा नहीं दिखा। सुबह जो राजधानी उमस से परेशान थी। उसी शहर की सड़कों को इंद्रदेवता धुल चुके थे जैसे उन्हें भी यह फिक्र हो कि लखनऊ के सपूत का लंबे समय बाद अपने घर पहुंचने पर स्वागत में कोई कसर बाकी न रह जाए। शायद ख्याल यह भी कहीं न कहीं था कि अटल की अगवानी में उमड़े लोगों के पैर भी न जलने पाएं।
अटलमय हो गई राजधानी
चांदी के कलश में प्रतीकों के रूप में अटल को लेकर केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित पूरी सरकार जब उन्हें उस गोमा की गोद में हमेशा-हमेशा के लिए सौंपने चली जिसे जीवित रहते अटल अपनी मां कहते थे। लखनऊ की जीवनदायिनी बताते हुए उसकी सफाई की बात उठाया करते थे।
चेताते थे कि मां गोमती न रही तो हम भी नहीं रहेंगे तो राजधानी की सड़कें पूरी तरह अटल मय हो गई। जीवन भर लखनऊ पर फिदा रहे अटल पर आज लखनऊ फिदा हुआ दिख रहा था। ऐसा लगा कि स्थूल से सूक्ष्म स्वरूप धारण कर चुके अटल लोगों के दिल व दिमाग में अब स्थूल रूप से साकार हो उठे हों। सिर्फ उनके नहीं जिन्होंने अटल को देखा या सुना है बल्कि उन 17-18 साल के किशोरों के भी जो सिर्फ अटल के बारे में सुना ही है।
लगा बोलने ही वाले हैं अटल
अटल का कलश जब भाजपा मुख्यालय के सामने से गुजरा तो लगा कि बस अब यह आवाज गूंजने ही वाली है, ‘महराज! कैसा चल रहा है।’ बेगमहजरत महल पार्क के सामने यात्रा पहुंची तो लगा, ‘बस अब माइक पर अटल की यह आवाज गूंजने ही वाली है, ‘मेरे प्यारे लखनऊ के लोगों!’ पर, इस बार काफिला बेगम हजरतमहल पार्क पर नहीं रुका और न वह उस चौक की तरफ बढ़ा जहां अटल ने कई बार ठंडाई और लस्सी पी होगी।
यात्रा ने गोमती नदी पार किया तो अचानक आंखों में प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद निरालानगर में हुआ कार्यकर्ता सम्मेलन का नजारा घूम गया। जिसमें वह आए थे। जब कार्यकर्ताओं ने कहा था, ‘अटल जी! पार्टी में गणेश परिक्रमा को बढ़ावा देने वालों के कारण पार्टी हारी है। जो लोग मंच पर बैठे थे यही आपकी हार का कारण है।’ और इसी के बाद अटल रुके और बोले, ‘मैं रुक रहा हूं। कल सुबह एक-एक कार्यकर्ता से मिलूंगा। वह मिले भी और उसके बाद कई बदलाव भी हुए।’
लखनऊ में 2007 की सभा में जो उनकी अंतिम सभा साबित हुई अटल ने कहा था कि स्वस्थ हुआ तो गोमती की सफाई का काम पूरा करूंगा। पर, उनका यह सपना पूरा नहीं हो पाया। देखने वाली बात होगी जिस गोमती में अटल की अस्थियां व भस्म प्रवाहित की गई है, उसे पूरी तरह से निर्मल और अविरल बनाने का अटल का सपना कब पूरा होता है।