माता- पिता को अपनी गलती पर हुआ पछतावा, बोले ‘हमने जो भूल की, उसे आप कभी न करें’
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ये एक कोशिश है उस मासूम के एहसासों को शब्द देने की, जिसे दुनिया में लाकर माता-पिता ने अनाथ की तरह जीने को छोड़ दिया, लेकिन समय रहते रिश्तों को संवारने की कोशिश हुई। ....और एक बेटी मां-बाप के साये से दूर होने से बच गई।
मैं बोल नहीं सकती, क्योंकि अभी तो मैं इस दुनिया में आई हूं।...पर बोलना चाहती हूं, कहना चाहती हूं का शुक्रिया, जिन्होंने मुझे अनाथ होने से बचा लिया। वरना, मैं भी माता-पिता के होते हुए किसी अनाथालय में पल रही होती। मेरा नामकरण अभी नहीं हुआ, क्योंकि मुझे चंद ही रोज हुए हैं।
इस दुनिया में आए हुए। मेरा परिचय सिर्फ इतना है कि मैं एक बेटी हूं। मुझे जन्म देने के बाद मेरी मां अपनी किसी लाचारी में अस्पताल में छोड़कर चली गई। मेरे आने से पहले ही मेरे पिता ने मेरी मां से मुंह मोड़ लिया। मैं माता-पिता से दूर, भूख से तड़पती अस्पताल में बिलख रही थी।
डॉक्टर-नर्स सभी पशोपेश में थे, कि क्या करें? कहां छोड़ आएं मुझे। फिर किसी ने इसकी खबर 181 आशा ज्योति केंद्र को दी। केंद्र ने पहले तो मुझे अनाथालय में छोड़ने का मन बनाया, लेकिन अचानक से उनका इरादा बदला और शुरू हुई मेरे माता-पिता की तलाश।
दोनों मिल तो गए, लेकिन मुझे अपनाने की हिम्मत नहीं दिखा सके। बार-बार समझाने के बाद उन्होंने न जाने कहां से हिम्मत जुटाई और साथ रहने को, शादी करने को राजी हो गए। आर्यसमाज मंदिर में शुक्रवार को उन्होंने शादी कर ली और मुझे अपना लिया।
कोशिश रिश्तों को संवारने की होनी चाहिए
दोनों ही नासमझी कर गए थे। हमें लोकबंधु अस्पताल से सूचना मिली कि बच्ची को जन्म देकर युवती और उसके घरवाले उसे छोड़कर चले गए। हमारे पास भी उसे अनाथालय को सौंपना ही अंतिम विकल्प था। उससे पहले हम एक कोशिश करना चाहते थे कि शायद लड़का-लड़की को समझ आ जाए।
दोनों का पता ढूंढा, बुलवाया और कई चरणों में समझाया। काउंसलिंग का असर ये हुआ कि वे शादी के लिए राजी हो गए। फिर हमने शुक्रवार को लिखापढ़ी और लिखित आश्वासन के बाद उनकी शादी कराकर उन्हें बेटी को सौंप दिया। ऐसे मामलों में अस्पतालों की सतर्कता बहुत जरूरी है। यदि हमें सही समय पर सूचना मिल जाए तो हमारे लिए काम आसान हो जाता है। - अर्चना सिंह, प्रभारी, 181 आशा ज्योति केंद्र