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Lucknow News: चिंता और अवसाद से युवतियों में हो रही अपच की समस्या
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लखनऊ। युवतियां में चिंता और अवसाद के कारण अपच की समस्या बढ़ रही है। यह समस्या युवकों में भी है, लेकिन उनकी संख्या युवतियों के मुकाबले कम है। संजय गांधी पीजीआई के साझा अध्ययन में यह निष्कर्ष निकला है। 26 देशों के 54,127 व्यक्तियों पर हुए इस अध्ययन को अंतरराष्ट्रीय जर्नल- एलिमेंटरी फार्माकोलॉजी एंड थेराप्यूटिक्स में स्थान मिला है।
संजय गांधी पीजीआई से डाॅ. यूसी घोषाल इस अध्ययन में शामिल रहे। अध्ययन के दाैरान सभी को इंटरनेट के माध्यम से प्रश्नावली दी गई। एशिया के साथ ही यूरोप और अमेरिका में भी यह ऑनलाइन सर्वे किया गया। सर्वे में शामिल कुल व्यक्तियों में से 40 फीसदी 18 से 39 वर्ष, 40 फीसदी 40 से 64 वर्ष और 20 फीसदी 65 साल से ज्यादा उम्र वाले थे।
इसमें रोम-4 कार्यात्मक अपच के आधार पर स्थिति का आकलन किया गया। रोम-4 में कार्यात्मक अपच के लिए मापदंड दिए गए हैं। इसमें मुख्य रूप से चार लक्षण- भोजन के बाद पेट में भारीपन, थोड़ा खाते ही पेट भर जाना, पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द और पेट के ऊपरी हिस्से में जलन के लक्षण शामिल होते हैं। ये समस्याएं सामान्य गतिविधियों में बाधा डाल रही हों और पिछले तीन महीनों में प्रति सप्ताह कम से कम तीन दिन समस्या रही हो।
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रोम-4 के आधार पर 18 से 34 साल की उम्र की 10.8 फीसदी युवतियों में कार्यात्मक अपच की समस्या मिली, जबकि इसी उम्र के पुरुषों में यह समस्या आठ फीसदी ही थी। इसके बाद दोनों में ही उम्र बढ़ने के साथ अपच की समस्या कम होती गई।
सामान्य से तीन गुना ज्यादा चिंता और अवसाद
अध्ययन के दाैरान कार्यात्मक अपच का चिंता और अवसाद के साथ सीधा संबंध देखा गया। इसमें देखा गया कि कार्यात्मक अपच वाली 30.4 फीसदी आबादी में चिंता और 30.2 फीसदी में अवसाद की समस्या थी। वहीं, सामान्य आबादी में चिंता का प्रतिशत 10.2 फीसदी और अवसाद का 9.9 फीसदी ही था। इससे निष्कर्ष निकलता है कि अपच के पीछे चिंता और अवसाद बड़ी वजह है।
समझें क्या है कार्यात्मक अपच
कार्यात्मक अपच बिना किसी विशेष कारण पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द या जलन, भोजन के बाद पेट बहुत भरा हुआ और थोड़ा खाने पर ही भूख मिट जाने जैसी समस्याएं होती हैं। इसके साथ ही मतली, सूजन, डकार और उल्टी के लक्षण भी होते हैं। विशेषता यह होती है कि ये लक्षण शारीरिक समस्या से ज्यादा मानसिक रहते हैं।
लिंग और उम्र के हिसाब से कार्यात्मक अपच (प्रतिशत में)
लिंग- आयु वर्ग
18–34- 35–49 50–64
65+
कुल
महिला
10.8-
8.8
7.4
5.2
8.7
पुरुष
8.0-
6.2
4.5
2.9
5.7
कुल
9.5 -
7.5
5.9
3.9
7.2
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संजय गांधी पीजीआई से डाॅ. यूसी घोषाल इस अध्ययन में शामिल रहे। अध्ययन के दाैरान सभी को इंटरनेट के माध्यम से प्रश्नावली दी गई। एशिया के साथ ही यूरोप और अमेरिका में भी यह ऑनलाइन सर्वे किया गया। सर्वे में शामिल कुल व्यक्तियों में से 40 फीसदी 18 से 39 वर्ष, 40 फीसदी 40 से 64 वर्ष और 20 फीसदी 65 साल से ज्यादा उम्र वाले थे।
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इसमें रोम-4 कार्यात्मक अपच के आधार पर स्थिति का आकलन किया गया। रोम-4 में कार्यात्मक अपच के लिए मापदंड दिए गए हैं। इसमें मुख्य रूप से चार लक्षण- भोजन के बाद पेट में भारीपन, थोड़ा खाते ही पेट भर जाना, पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द और पेट के ऊपरी हिस्से में जलन के लक्षण शामिल होते हैं। ये समस्याएं सामान्य गतिविधियों में बाधा डाल रही हों और पिछले तीन महीनों में प्रति सप्ताह कम से कम तीन दिन समस्या रही हो।
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रोम-4 के आधार पर 18 से 34 साल की उम्र की 10.8 फीसदी युवतियों में कार्यात्मक अपच की समस्या मिली, जबकि इसी उम्र के पुरुषों में यह समस्या आठ फीसदी ही थी। इसके बाद दोनों में ही उम्र बढ़ने के साथ अपच की समस्या कम होती गई।
सामान्य से तीन गुना ज्यादा चिंता और अवसाद
अध्ययन के दाैरान कार्यात्मक अपच का चिंता और अवसाद के साथ सीधा संबंध देखा गया। इसमें देखा गया कि कार्यात्मक अपच वाली 30.4 फीसदी आबादी में चिंता और 30.2 फीसदी में अवसाद की समस्या थी। वहीं, सामान्य आबादी में चिंता का प्रतिशत 10.2 फीसदी और अवसाद का 9.9 फीसदी ही था। इससे निष्कर्ष निकलता है कि अपच के पीछे चिंता और अवसाद बड़ी वजह है।
समझें क्या है कार्यात्मक अपच
कार्यात्मक अपच बिना किसी विशेष कारण पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द या जलन, भोजन के बाद पेट बहुत भरा हुआ और थोड़ा खाने पर ही भूख मिट जाने जैसी समस्याएं होती हैं। इसके साथ ही मतली, सूजन, डकार और उल्टी के लक्षण भी होते हैं। विशेषता यह होती है कि ये लक्षण शारीरिक समस्या से ज्यादा मानसिक रहते हैं।
लिंग और उम्र के हिसाब से कार्यात्मक अपच (प्रतिशत में)
लिंग- आयु वर्ग
18–34- 35–49 50–64
65+
कुल
महिला
10.8-
8.8
7.4
5.2
8.7
पुरुष
8.0-
6.2
4.5
2.9
5.7
कुल
9.5 -
7.5
5.9
3.9
7.2