राहुल की अमेठी में शाही मुकाबला, रानी-पटरानी सियासी मैदान में
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
एक तरफ रानी तो दूसरी तरफ पटरानी। अमेठी में इस बार विधानसभा चुनाव में रोचक मुकाबला देखने को मिलेगा। अमेठी राजघराने में मचा घमासान सियासी रंग ले चुका है।
यह पहला मौका है कि जब एक राजा की दो रानियां राजमहल और राजनीतिक विरासत के लिए चुनाव मैदान में उतरी हैं और एक-दूसरे को चुनौती दे रही हैं। रानी के साथ भाजपा खड़ी है तो पटरानी के साथ कांग्रेस।
दोनों रानियां कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य डॉ. संजय सिंह की हैं। पहली पत्नी गरिमा सिंह को भाजपा ने मैदान में उतारा है तो दूसरी पत्नी अमीता सिंह कांग्रेस के टिकट पर ताल ठोकने उतरी हैं।
गरिमा पहले ही पर्चा दाखिल कर चुकी हैं जबकि अमीता ने बृहस्पतिवार को नामांकन पत्र दाखिल किया। देखने वाली बात यह होगी कि रानी-पटरानी में कौन किस पर भारी पड़ता है।
वैसे तो अमेठी गांधी परिवार का परंपरागत सियासी गढ़ होने के नाते हमेशा चर्चा में रहता है और हर चुनाव में देश-दुनिया की निगाहें इस सीट पर लगी रहती है लेकिन इस बार राजघराने की दोनों रानियों के आमने-सामने होने से यह सीट और भी अहम हो गई है।
सियासी दावा बरकरार रखने के लिए मैदान में
गरिमा सिंह जहां अपना स्वाभिमान हासिल करने की मंशा से सियासी समर में आगे आई हैं वहीं अमीता सिंह संजय सिंह की सियासी विरासत पर अपना दावा बरकरार रखने के लिए मैदान में हैं।
सपा से गठबंधन के बाद टिकट न मिलने की आशंका को देखते हुए अमीता ने बतौर निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी थी। इसके बाद संजय सिंह ने कांग्रेस हाईकमान पर दबाव डालकर अमीता का टिकट फाइनल कराया। अमीता के मैदान में आ जाने से इस सीट पर भाजपा के साथ-साथ सपा और कांग्रेस के बीच दोस्ताना मुकाबला भी होने जा रहा है।
भाजपा का बड़ा दांव
कांग्रेस खासकर गांधी परिवार के सियासी गढ़ में सेंधमारी के लिए भाजपा ने अमेठी राजपरिवार को ही हथियार बनाया है। भाजपा ने संजय सिंह की पत्नी गरिमा सिंह को टिकट देकर बड़ा दांव चला तो कांग्रेस ने भाजपा के इस दांव को विफल करने के लिए अमीता को आगे कर दिया है।
2012 में सपा के गायत्री प्रसाद प्रजापति ने अमीता सिंह को हराकर इस सीट पर कब्जा किया था। इस बार गठबंधन में भी यह सीट सपा कोटे में गई है लेकिन अमीता की जिद केचलते कांग्रेस को उन्हें टिकट देना पड़ा। अत: गठबंधन के बावजूद इस सीट पर सपा और कांग्रेस के बीच दोस्ताना मुकाबले के आसार बन गए हैं।
गरिमा पहली बार लड़ेंगी चुनाव
गरिमा सिंह पहली बार लड़ रही हैं। उन्हें संजय सिंह ने 1995 में तलाक दे दिया। उसके बाद 19 साल तक उन्हें राजमहल में घुसने नहीं दिया गया। काफी जद्दोजहद के बाद गरिमा 2014 में अपने बेटे के साथ महल में आने में कामयाब हुईं। अब वह अपने स्वाभिमान के लिए चुनाव मैदान में उतरी हैं।
दूसरी तरफ अमीता सिंह सियासत का जाना-पहचाना चेहरा बन चुकी हैं। अमीता विधायक के साथ-साथ मंत्री भी रह चुकी हैं। राजपरिवार की विरासत को लेकर चल रहे आपसी संघर्ष में परिवार बंट चुका है। संजय सिंह अमीता के साथ मजबूती से खड़े हैं तो उनकी पहली पत्नी गरिमा सिंह के साथ उनका बेटा अनंत विक्रम सिंह है।
अपने गढ़ को सुरक्षित रखना चाहती है कांग्रेस
गरिमा सिंह राजपरिवार और राजमहल पर अपने हक की लड़ाई लड़ रहीं हैं। संजय सिंह की दूसरी शादी के बाद जनता की सहानुभूति उनके साथ है। यह आकलन करके ही भाजपा ने गरिमा पर दांव लगाया है। नतीजा चाहे जो हो लेकिन इतना तय है कि अमेठी में रानियों का मुकाबला बेहद रोचक होगा।
कांग्रेस जहां अपना गढ़ किसी भी हाल में सुरक्षित रखना चाहती है वहीं भाजपा सेंध लगाने में कोई कसर बाकी नहीं रखना चाहती। स्थानीय राजनीति पर बारीकी से नजर रखने वालों की मानें तो दोनों रानियों की लड़ाई से सपा की जीत का रास्ता निकल सकता है। कांग्रेस व सपा दोनों को उम्मीद है कि राजपरिवार के वोट बंटने से सीधा फायदा सपा को ही होगा।
राजनीतिक निष्ठाएं बदलता रहा है राजघराना
अमेठी राजघराना गाहे-बगाहे परिस्थितियों के अनुसार अपनी राजनीतिक निष्ठा बदलने में पीछे नहीं रहा। राजा रणंजय सिंह कांग्रेस छोड़ जनसंघ के निशान पर विधायक रह चुके हैं। तो राज्यसभा सदस्य डॉ. संजय सिंह भी राजनीतिक निष्ठाएं बदल चुके हैं।
संजय सिंह व अमीता भाजपा में भी रह चुके हैं। अब गरिमा और उनके पुत्र अनंत विक्रम भी उसी राह पर हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पहली बार यह राजघराना दो विपरीत राजनीतिक धाराओं में बंटा है।
पुरानी है रानियों की अदावत
अमेठी राजघराने की रानियों की अदावत काफी पुरानी है। यह अदावत राजमहल से निकलकर सड़कों तक पहुंच गई है। हालांकि गरिमा और अमीता दोनों राजमहल में एक ही छत के नीचे रहती हैं लेकिन अलग-अलग हिस्से में।
दोनों के बीच छत्तीस का आंकड़ा है और दोनों का कभी आमना-सामना भी नहीं होता। जानकारों का कहना है कि इस बार अमेठी का चुनाव इस लिहाज से भी बेहद अहम है कि वहां लोग यह साबित करेंगे कि किस रानी को असली मानते हैं और किसे नकली।
बच्चों के हाथ में प्रचार की कमान
गरिमा सिंह के चुनाव प्रचार का जिम्मा उनके बेटे अनंत विक्रम सिंह, पुत्रवधू शांभवी, बेटी महिमा व सैव्या सिंह संभाल रही हैं। महिमा सिंह अमेरिका में रहती हैं और अपनी मां के चुनाव प्रचार के लिए खास तौर पर अमेठी में डटी हुई हैं।
दूसरी तरफ, अमीता की बेटी आकांक्षा सिंह भी अपनी मां के साथ दिख रही हैं। चुनाव में एक ही राजघराने के बच्चों की अलग-अलग सक्रियता भी काफी दिलचस्प होगी।
दोनों कर रहीं दावा जनता उनके साथ
संजय सिंह की पहली पत्नी गरिमा का दावा है कि अमेठी की जनता उनके साथ है। जबकि अमीता का कहना है कि अमेठी मेरा परिवार और घर है और मैं इसे छोड़ नहीं सकती। उनका कहना है कि वह मतदाताओं के बीच लंबे समय से कड़ी मेहनत कर रही हैं। जनता का समर्थन उनके साथ है और वह जीतेंगी।