यूपी का रण : सियासत के साथ ही जातिवाद पर भी नया संदेश देता है यह जनादेश
सियासी दलों को अब समझना होगा कि कानून-व्यवस्था, विरासत व विकास पर ही बनेगी बात।
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विस्तार
आजादी के बाद उत्तर प्रदेश में पहली बार योगी आदित्यनाथ के रूप में पांच साल की सरकार चलाने वाले किसी मुख्यमंत्री ने अपनी पार्टी की सत्ता में वापसी कराकर इतिहास रच दिया। कांग्रेस के बाद प्रदेश में भाजपा अब ऐसी पार्टी बन गई जो लगातार दूसरी बार सत्ता हासिल करने में सफल रही है। पर, 2022 के नतीजों के निहितार्थ सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं हैं। देश की राजनीति को दिशा देने और राजनीतिक दलों की दशा तय करने वाले उत्तर प्रदेश के मतदाताओं ने इन नतीजों के जरिये सियासी दलों को सीख, सबक और संदेश देने के साथ सियासत को लेकर उनके कई प्रश्नों का उत्तर देने का भी प्रयास किया है। साथ ही यह भी बताया है कि बंधी-बंधाई धारणाओं पर राजनीति नहीं हो सकती।
नतीजों ने यह भी समझाने का प्रयास किया है कि उत्तर प्रदेश के मतदाताओं की प्राथमिकता अब जाति नहीं, बल्कि विरासत, विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे रचनात्मक काम हैं। इसमें कानून-व्यवस्था पर कड़ाई भी शामिल है। प्रदेश का युवा मतदाता और महिलाएं नकारात्मक नहीं, बल्कि सकारात्मक मुद्दों पर वोट देना सीख गए हैं। कौन से काम नहीं हुए कि जगह कौन-कौन से काम हुए यह अब जनता के फैसलों की कसौटी हो गया है। लोगों की नजर में खेतों की सुरक्षा से ज्यादा अपनी और अपने घर की महिलाओं की सुरक्षा बड़ा मुद्दा है। राजनीतिक दलों को दलबदलुओं को गले लगाने के बजाय अपने कार्यकर्ताओं पर भरोसा करना होगा। उन्हें उत्तर प्रदेश में राजनीति करनी है, तो खुद को इसी के अनुरूप बदलना होगा। इन चीजों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में ही बतौर भाजपा के प्रधानमंत्री उम्मीदवार समझ लिया था। इन नतीजों के साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपनी नेतृत्व क्षमता भी साबित कर दी है। मोदी का ‘यूपी प्लस योगी, बहुत है उपयोगी’ नारे को लोगों ने समर्थन देकर यह बता दिया है कि भाजपा की वर्तमान केंद्र व प्रदेश सरकार ने राजनीति पर कम हो रहे विश्वास को न सिर्फ बहाल किया है, बल्कि बढ़ाया भी है।
इस तरह के आरोप-प्रत्यारोप नहीं चलेंगे
राजनीति में संकेतों का बहुत मतलब होता है। सियासत में गलती नहीं चूक होती है। इसलिए नतीजों पर बात करने से पहले यहां वर्ष 2014 में भाजपा के बतौर प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के भाषणों में बार-बार आए एक शब्द का उल्लेख जरूरी है। उन्होंने ‘हिंदुत्व’ को लेकर अपने ऊपर होने वाले हमलों के जवाब में कहा था कि हिंदुत्व का मतलब सांप्रदायिकता नहीं विकास है। जिसे मोदी ने पिछले वर्ष दिसंबर में वाराणसी में काशी-विश्वनाथ कॉरिडोर का लोकार्पण करते वक्त सनातन संस्कृति की विरासत सहेजने व संवारने के साथ विकास और गरीबों के कल्याण पर काम करते रहने के संकल्प के साथ विस्तार दिया। साथ ही संकेतों में यह भी समझाया कि यह सब तभी संभव हो पा रहा है, जब प्रदेश में भाजपा यानी डबल इंजन सरकार है। मोदी जिस दिन काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के प्रथम चरण का लोकार्पण कर रहे थे, उसी दिन अखिलेश यादव ने मोदी पर हमला बोलते हुए कह दिया, ‘मोदी वहीं रहें। आखिरी वक्त काशी में रहा जाता है।’ भाजपा ने इसे मुद्दा बना दिया। साथ ही अखिलेश यादव को ‘सनातन संस्कृति, विरासत और विकास’ के मुद्दे पर कठघरे में खड़ा कर दिया । मुख्य विपक्षी दल सपा जिसका सटीक जवाब नहीं दे पाई ।
भाजपा की पिच पर ही खेलता रहा विपक्ष
तात्पर्य यह है कि मोदी ने ‘विरासत पर विकास’ का एजेंडा सेट कर दिया। सपा सहित संपूर्ण विपक्ष का इसका सटीक जवाब नहीं तलाश पाया। वह जाति व धर्म में उलझा रहा। मुसलमान और यादव (एम-वाई) तथा अन्य पिछड़ी जातियों के गठजोड़ की गणित में उलझा रहा। जिस पर भाजपा का एम-वाई अर्थात मोदी और योगी का फैक्टर भारी पड़ा। वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र भट्ट कहते हैं, मुख्य विपक्षी दल, भाजपा की रणनीति समझने में असफल रहे और उसी की तैयार पिच पर उसकी दी गेंद और बैट से खेलते नजर आए। भाजपा ने अखिलेश के अंतिम समय काशी में ही रहने के मोदी पर दिए गए बयान के जरिये सपा मुखिया को सनातन संस्कृति यानी हिंदुत्व का विरोधी साबित करना शुरू कर दिया। भाजपा के लोग कहते रहे कि सपा आएगी तो राममंदिर का निर्माण रुक जाएगा। अखिलेश यादव ने इसकी सफाई दी। पूजा की बात की। अयोध्या भी गए। पर, फिर चूक हुई। हनुमान गढ़ी तो गए, लेकिन राम जन्मभूमि से दूरी बरती। शायद इसके पीछे मुस्लिम वोटों की नाराजगी ही बड़ी वजह रही। भाजपा ने इसे मुद्दा बना दिया। कांग्रेस की नेता प्रियंका गांधी ने भी कोशिश की कि हिंदुत्व मुद्दा न बनने पाए। लोग उन्हें भी हिंदू समझें। मंदिरों में पूजा की और श्लोक पढ़कर खुद के हिंदुत्व होने का सुबूत देने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने भी राम जन्मभूमि मंदिर से दूरी बनाकर भाजपा को हमला करने का मौका दिया। बकौल भट्ट प्रधानमंत्री मोदी और योगी हिंदुत्व की पिच पर अखिलेश व प्रियंका को खेलने को मजबूर भी करते रहे और उनके हिंदुत्व को कठघरे में खड़ा कर लोगों को यह संदेश भी देते रहे कि इनका हिंदुत्व सियासी है। सिर्फ वोट लेने के लिए है। विपक्ष अगर समझ रहा है कि चुनाव नतीजों के साथ हिंदुत्व का मुद्दा शांत हो जाएगा तो ऐसा नहीं होगा। विपक्ष को इस बारे में गंभीरता से सोचना होगा। साथ ही मुद्दों पर स्पष्टता लानी होगी।
विकास व काम से सत्ता विरोधी लहर पर लगाम
राजनीतिशास्त्रियों का कहना है, विकास, विरासत और कल्याणकारी योजनाओं के कारण प्रदेश में बने एक लाभार्थी मतदाता समूह की शक्ति की अनदेखी, विकास को मुद्दा नहीं मानने एवं कानून-व्यवस्था के मुद्दे को हल्के में लेना भी विपक्ष के लिए भारी पड़ा। विपक्षी दलों के नेता और रणनीतिकार शायद इस मिथक पर ज्यादा ही भरोसा करके बैठे थे कि पांच साल की सरकार के खिलाफ लोगों की नाराजगी उनकी कामयाबी का हथियार बन जाएगी। यह परंपरागत सोच ही उन पर भारी पड़ गई। प्रधानमंत्री मोदी ने यूपी प्लस योगी बहुत हैं उपयोगी नारे से डबल इंजन सरकार से होने वाले लाभ लोगों के दिमाग में बैठा दिए। उन्होंने गरीबों को मुफ्त राशन, घर, गैस, चिकित्सा आदि के जिक्र के साथ लोगों के दिमाग में यह बात ठीक से बैठा दी कि योगी से पहले सपा की सरकार ने ये लाभ गरीबों तक नहीं पहुंचने दिए। गैर भाजपा सरकार बनेगी तो उनकी सुविधाएं रुक जाएंगी। दूसरी तरफ विपक्ष ने इस तथ्य पर ध्यान ही नहीं दिया कि मोदी ने डीबीटी और डिजिटल इंडिया के जरिये गरीबों को सीधे लाभ पहुंचाया है। साथ ही वह सीधे गरीबों से संवाद कर यह भी समझा रहे हैं कि उनके हक पर किस तरह पहले डाका डाला जाता था। जाहिर है कि विपक्ष को इसका खामियाजा भुगतना ही था। नतीजों ने विकास और काम से वोट न मिलने के मिथक को तोड़ दिया है। साथ ही यह संदेश दे दिया है कि ईमानदारी से काम किया जाए और लोगों की उनकी जरूरत की सहूलियत पहुंचाने में कामयाबी हासिल कर ली जाए। उन्हें बदलाव का भरोसा दिला दिया जाए तो विकास और कानून-व्यवस्था तथा कल्याणकारी कामों से सत्ताविरोधी लहर को रोका जा सकता है ।
मोदी के मैजिक और योगी के काम से बनी बात
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शाहजहांपुर में गंगा एक्सप्रेसवे का शिलान्यास करने के साथ जिस तरह विकास का एजेंडा सेट किया। तमाम कामों की याद दिलाई । पूर्वांचल की बदलती तस्वीर पर कई बार लोगों का ध्यान खींचा। मेरठ में सोतीगंज के गाड़ी चोर बाजार का जिक्र कर विपक्ष को घेरते हुए उन्होंने यूपी प्लस योगी बहुत हैं उपयोगी का नारा सेट किया। साथ ही गैर विपक्ष के कुछ नेताओं के अपराधियों से रिश्तों और योगी सरकार में उन पर बुलडोजर चलने का उल्लेख भी कर कानून-व्यवस्था को मुद्दों के केंद्र में लाया। दूसरी तरफ सपा ने जिस तरह टिकट बांटे और आपराधिक छवि के लोगों पर कार्रवाई को उत्पीड़न बताने की कोशिश की, उससे लोगों में शायद योगी सरकार की सख्त कानून-व्यवस्था पर भरोसा बढ़ता चल गया। भाजपा ने महिलाओं की सुरक्षा से इसे जोड़कर बड़ा मुद्दा बना दिया। प्रो. एपी तिवारी कहते है, कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर विपक्ष भाजपा के फंदे में फंस गया। जब सपा गठबंधन से मुख्तार अंसारी के लड़के को टिकट मिलेगा तो सवाल उठेगा ही। अखिलेश यादव ने बुलडोजर को लेकर जिस तरह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को घेरा उससे भी भाजपा, खासतौर से योगी आदित्यनाथ की क्षमता पर लोगों का भरोसा बढ़ गया। कानून-व्यवस्था व महिला सुरक्षा मुद्दा बन गया। मुख्तार अंसारी ने जब चुनाव न लड़ने का फैसला किया तो लोगों में यह संदेश और गाढ़ा हुआ कि ऐसा सरकार के डर से हो रहा है। विपक्ष छुट्टा जानवरों से खेतों की सुरक्षा को मुद्दा बनाकर भाजपा को घेरने की कोशिश करता रहा। भाजपा ने महिला तथा लोगों की सुरक्षा व सख्त कानून-व्यवस्था से खेतों की सुरक्षा के मुद्दे को मात दे दी। इसका प्रमाण नतीजों वाले दिन जीत के जश्न में बुलडोजर के साथ भाजपा नेताओं की तस्वीरें हैं ।
सियासत को बदलनी होगी चाल-ढाल
ऐसा नहीं है कि नतीजों में भाजपा के लिए सब अच्छा ही अच्छा है। विपक्ष के साथ भाजपा के लिए भी कुछ नसीहतें हैं। तमाम दावों और मोदी के लगातार प्रचार करने के बावजूद भाजपा की जीत का आंकड़ा दावे के मुताबिक 300 पार नहीं जा पाया है। यही नहीं, कई विधायकों की जीत बहुत कम अंतर से हुई है। सपा का आंकड़ा भले ही सरकार बनाने लायक नहीं हुआ, लेकिन काफी बढ़ा है, जो यह बताता है कि भले ही पूरी तरह न सही, लेकिन लोगों ने सपा को भाजपा के विकल्प के रूप में देखा है। नतीजों से निहितार्थ यह भी निकल रहे हैं कि प्रधानमंत्री मोदी और योगी ही नहीं अमित शाह ने भी इस चुनाव को मुद्दों पर लड़ा है। चुनाव मोदी और योगी के चेहरे को आगे करके लड़ा गया है, इसलिए यह जीत विधायकों की क्षमता व साख की नहीं है। सपा को इतनी सीटें मिलने का मतलब स्थानीय स्तर पर लोगों की भाजपा से या विधायकों से कुछ न कुछ नाराजगी होना ही साबित करता है, जिसे भाजपा को ठीक करना होगा। साथ ही इस चुनाव ने जिस तरह दलबदलुओं को सबक सिखाया है, वह राजनीति के लिए जहां अच्छा संकेत है तो पक्ष व विपक्ष के लिए भी सबक है कि अवसरवादियों के सहारे सत्ता पाने की कोशिश होगी तो जनता सबक सिखाने से बाज नहीं आएगी। साथ ही जातिवाद और तुष्टीकरण की राजनीति अब ज्यादा नहीं चलेगी । विरासत और विकास तथा कानून-व्यवस्था एवं लोगों के भरोसे से ही बात बनेगी।