यूपी में भी भाजपा के खिलाफ महागठबंधन बना रहे नीतीश
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वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश में भाजपा और सपा विरोधी महागठबंधन की खिचड़ी पक रही है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह प्रदेश में संभावित विकल्पों के लिए कसरत कर रहे हैं।
दोनों नेताओं की लंबी वार्ता हो चुकी है। एक विकल्प मायावती की अगुवाई में महागठबंधन बनाना है तो दूसरा कांग्रेस, जनता दल यू, रालोद और अन्य छोटे दलों को मिलाकर चुनाव लड़ने का है।
गठबंधन की कोशिशों में जुटे नेताओं का मानना है कि बिहार जैसी राजनीतिक परिस्थितियां यूपी में भी मौजूद हैं। बिहार में भाजपा छोटी ताकत थी लेकिन लोकसभा चुनाव में उसने 31 सीटें जीती। इसी तरह यूपी में भाजपा ने 73 सीटों पर कामयाबी हासिल की।
...तो क्या राष्ट्रीय राजनीति में कदम बढ़ा रहे नीतीश
बिहार में विधानसभा चुनाव में भाजपा की बढ़त रोकने के लिए नीतीश कुमार और लालू यादव ने आपसी मतभेद भुला दिए। अभी यूपी में दोनों बड़े प्लेयर सपा और बसपा को लगता है कि वे अकेले दम पर भाजपा को हराने में सक्षम हैं। लेकिन, आने वाले समय में समीकरणों में बदलाव आ सकता है।
जदयू प्रदेश में बड़ी सियासी ताकत नहीं है लेकिन नीतीश भाजपा के खिलाफ समान विचार वाले दलों की लामबंदी के पक्ष में हैं। इसे राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका निभाने की तरफ उनका कदम माना जा रहा है।
कोशिश बसपा को साथ लाने की भी है लेकिन यह परवान चढ़ेगी या नहीं, यह मायावती के रुख पर निर्भर है। मायावती अगुवाई करने को तैयार हुईं तो यह भाजपा, सपा के खिलाफ सशक्त गठबंधन होगा।
'माया-मुलायम में नीतीश-लालू जैसी कटुता नहीं'
जनता दल यू के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद केसी त्यागी का कहना है कि मुलायम सिंह और मायावती के बीच उतनी कटुता नहीं है जितनी नीतीश और लालू के बीच थी।
बिहार में भाजपा को रोकने के लिए वे एक साथ आ गए लेकिन उप्र में सपा-बसपा इसके लिए तैयार नहीं लगते। इसलिए प्रदेश में महागठबंधन का स्वरूप अलग होगा। वह मानते हैं कि भाजपा ने यूपी में बिहार से ज्यादा सांप्रदायिक माहौल बनाया है।
पश्चिमी यूपी में दादरी से कांधला तक न जाने कितनी पंचायतें सांप्रदायिक आधार पर की गई हैं। मध्य यूपी में भी भाजपा इसी लाइन पर चल रही है। अफवाहों का बाजार गर्म है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएंगे, माहौल और गरम होगा।
बिहार में हारने के बाद भाजपा यूपी में आक्रामक तरीके से चुनाव मैदान में उतरेगी। राम मंदिर मुद्दा उठाना और पैगंबरों पर टिप्पणी कर माहौल को गरमाना इसी रणनीति का हिस्सा है। इसलिए भाजपा यहां चुनौती रहेगी और जितना संभव हो, उसके खिलाफ एकजुटता जरूरी है।
इस तरह की जा रही है तैयारी
बकौल केसी त्यागी, भाजपा के खतरे और सपा- बसपा के रवैये को भांपते हुए पिछले दिनों दिल्ली में शरद यादव के निवास पर नीतीश कुमार और चौधरी अजित सिंह की लंबी वार्ता हुई है।
तय हुआ कि चौधरी चरण सिंह ने जिस शक्ति का नेतृत्व किया था, उसे फिर से एकत्र किया जाए। इस बैठक के बाद आधा दर्जन दलों से सक्रिय संपर्क बना हुआ है।
हालांकि उन्होंने इन दलों के नामों का यह कहकर खुलासा नहीं किया कि वक्त आने पर रणनीति सामने आएगी। माना जा रहा है कि यदि बड़े प्लेयर साथ न आएं तो कांग्रेस, रालोद और जेडीयू के साथ ही छोटे दलों को जोड़ा जाएगा।
वाराणसी में रैली की तारीख की घोषणा 15 को
15 जनवरी को जदयू ने पटना में पटेल नवनिर्माण सेना के जिम्मेदार लोगों को बुलाया है। संभवत: नीतीश कुमार की वाराणसी में प्रस्तावित रैली की तारीख उसी दिन तय कर दी जाएगी। इसमें गुजरात के पाटीदार आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल की रिहाई की मांग भी उठाई जाएगी।
इसके बाद पूरब से पश्चिम तक पांच-छह रैलियां की जाएंगी। वह कहते हैं, यदि चरण सिंह के समर्थकों को भाजपा से अलग करने में सफलता मिली तो पश्चिमी यूपी में भाजपा रुक जाएगी। यह अजित सिंह की मदद से संभव है।
मांझी की मायावती को सलाह, एनडीए में आइए
बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और हिंदुस्तानी अवामी मोर्चा (हम) के नेता जीतन राम मांझी ने बसपा सुप्रीमो मायावती को एनडीए में शामिल होकर यूपी विधानसभा चुनाव लड़ने की सलाह दी है।
मांझी की सलाह से यूपी में 2017 से पहले राजनीतिक ध्रुवीकरण की अटकलों को बल मिला है। उन्होंने मायावती के एनडीए में शामिल होने पर उन्हें पूरा सहयोग देने का वादा किया।