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मुखिया की मजबूरी
टीम डिजिटल/लखनऊ
Updated Sat, 02 Nov 2013 10:37 AM IST
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प्रदेश के मुखिया के सामने आगे कुआं पीछे खाई जैसी स्थिति है। वजह, कहते हैं कि उन्हें प्रदेश की कमान तो दे दी गई पर वे अधिकार नहीं दिए गए जो होने चाहिए।
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हाल ही पार्टी मुख्यालय पर हुई बैठक में पदाधिकारियों ने एक सुर में अफसरों की शिकायत की। कहा कि अपनी ही सरकार में उनकी नहीं सुनी जा रही है। जायज काम के लिए भी गिड़गिड़ाना पड़ रहा है।
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पार्टी के मुखिया ने प्रदेश के मुखिया को हिदायत दी- कार्यकर्ताओं की अनदेखी नहीं होनी चाहिए। पर प्रदेश के मुखिया करें भी तो क्या करें। वे तो चाहते हैं कि पार्टी कार्यकर्ताओं के सभी जायज काम हों।
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उनकी अनदेखी न हो, पर चर्चा है कि कुछ मामलों में चाहकर भी वे कुछ नहीं कर पाते हैं।
अंदर खाने से जो बात निकल कर आ रही है उसके मुताबिक उनकी एक मातहत उनके ही निर्देशों पर अमल नहीं करती हैं और मजबूरी यह कि वे उनका कुछ कर भी नहीं सकते।
वजह साफ है कि वे सीधे पार्टी की मुखिया से जुड़ी हुई हैं। यही वजह है कि प्रदेश के मुखिया मन मसोस कर रह जाते हैं। वे खुलकर पार्टी के मुखिया से तो यह कह नहीं सकते कि वे चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं।
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