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योगी की 17 सभाओं पर भारी पड़ीं अखिलेश की दो सभाएं, डोर-टू-डोर नहीं गए भाजपाई

Thu, 15 Mar 2018 09:48 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Updated Thu, 15 Mar 2018 09:48 AM IST
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akhilesh yadav did just two rallies for bypoll.
अखिलेश यादव व मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ। - फोटो : amar ujala

गोरखपुर व फूलपुर उपचुनाव में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ताबड़तोड़ 17 सभाएं की थीं, पर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की महज दो सभाएं ही उन पर भारी पड़ गईं। गोरखपुर में हुए चार कार्यकर्ता सम्मेलन भी भाजपा के काम न आए।

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भाजपा ने गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव की घोषणा होते ही घर-घर पहुंचने का अभियान शुरू कर दिया था। पूरे प्रदेश से भाजपा कार्यकर्ताओं, नेताओं और मंत्रियों तक ने दोनों क्षेत्रों में डेरा डाल दिया था। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह खुद पर्दे के पीछे से चुनावी बागडोर संभाले थे। जिन मंत्रियों की वहां ड्यूटी लगी थी, उन्हें साफ निर्देश थे कि वे प्रचार थमने तक क्षेत्र से बाहर न जाएं।
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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर में एक के बाद एक 12 जनसभाएं कीं। फूलपुर में भी उनकी 5 बड़ी सभाएं कराई गई थीं। गोरखपुर में चार कार्यकर्ता सम्मेलनों में भी योगी मौजूद रहे। उन्होंने कार्यकर्ताओं को चुनाव अभियान में जुटने के लिए प्रेरित करने में भी अपने स्तर से कोई कसर नहीं छोड़ी।
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गोरखपुर में 14 मंत्री के साथ 8 सांसद और 10 विधायक भी डटे रहे। इनमें कैबिनेट मंत्री धर्मपाल सिंह, सूर्य प्रताप शाही, स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान, अनुपमा जायसवाल और सिद्धार्थ नाथ सिंह आदि प्रमुख हैं। इसके अलावा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र नाथ पांडेय और प्रदेश महामंत्री (संगठन) सुनील बंसल भी गए थे। केंद्रीय मंत्री शिवप्रताप शुक्ल और साध्वी निरंजन ज्योति भी गोरखपुर में कई दिनों तक जमी रहीं।

जीत के प्रति आश्वस्त थे भाजपा नेता

akhilesh yadav did just two rallies for bypoll.

उधर, डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य की सीट फूलपुर में केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल के साथ-साथ 10 मंत्री, 7 विधायक और 4 सांसदों ने प्रचार किया था। इनमें खास तौर पर सिद्धार्थनाथ सिंह, रीता जोशी, नंद गोपाल नंदी, आशुतोष टंडन, स्वतंत्रदेव सिंह, गिरीश यादव आदि शामिल थे। वहीं, अखिलेश यादव ने फूलपुर और गोरखपुर में मात्र एक-एक सभा की। इसके अलावा फूलपुर में एक रोड शो किया।

भाजपा के सूत्र बताते हैं कि पार्टी कार्यकर्ता और नेता प्रचार में गए तो, पर जीत के प्रति इतने ज्यादा आश्वस्त थे कि वे पूरे मनोयोग से ‘करो या मरो’ की स्थिति में डोर टू डोर प्रचार अभियान में नहीं जुटे।

वहीं, बसपा कोऑर्डिनेटर्स ने हर गांव और हर कस्बे में मायावती का यह संदेश पहुंचा दिया कि भाजपा को हराने के लिए सपा प्रत्याशी को जिताना है। सपा के एक नेता कहते हैं- सही बात तो यह है कि उनके शीर्ष नेतृत्व को भी यह उम्मीद नहीं थी कि दोनों सीटें उनकी झोली में आएंगी।

चुनाव प्रचार की प्रभावी रणनीति, विपक्ष का वोट न बंटने देने और कम्युनिस्ट जैसे छोटे दलों के कार्यकर्ताओं की पूरी मदद लेने का ही परिणाम है कि सपा को उल्लेखनीय सफलता मिली।

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