नौ घंटे के बाद मिला नवजात को इलाज
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सरकारी अस्पतालों के एनआईसीयू और एसएनसीयू की लचर व्यवस्था नवजातों की जान पर भारी पड़ने लगी है।
परिवारीजन दो नवजात को लेकर भटकते रहे लेकिन सरकारी अस्पतालों के डॉक्टर उनको एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भेजते रहे।
लापरवाही का आलम ये रहा कि केजीएमयू के बाल रोग विभाग के बाहर मां बाप नवजात को लेकर बेड खाली होने का इंतजार करते रहे लेकिन इलाज नहीं मिला।
वहीं दूसरी ओर सिविल अस्पताल से नवजात को बिना रेफरल स्लिप और एम्बुलेंस दिए ही ट्रॉमा रेफर कर दिया गया।
सरकारी अस्पतालों के सिक न्यू बोर्न केयर यूनिट और न्यू बोर्न केयर यूनिट की लचर व्यवस्था नवजात बच्चों की जान पर भारी पड़ने लगी है।
बहराइच के रहने वाले नंदकिशोर की पत्नी रिता (26) का दस दिन पहले प्रसव हुआ था।
नंदकिशोर ने बताया कि मंगलवार को सुबह चार बजे सात दिन की गुड़िया को वो गंभीर हालत में मेडिकल कॉलेज लेकर पहुंचे तो डॉक्टरों ने ओपीडी में दिखाने की बात कहकर लौटा दिया।
उसके बाद नवजात को लेकर परिवारीजन करीब पांच बजे बलरामपुर अस्पताल ले गए तो डॉक्टरों ने एनआईसीयू की सुविधा न होने की बात कहकर लौटा दिया।
नंदकिशोर नवजात को वापस लेकर ट्रॉमा सेंटर पहुंचे तो भर्ती नहीं किया गया और बाल रोग विभाग भेज दिया गया।
वहां पहुंचने के बाद एनआईसीयू में बेड खाली न होने की बात कहकर वार्ड से निकाल दिया गया। इसके बाद मां रीता नवजात को लेकर वार्ड के बाहर बैठी रही।
बच्चे की हालत खराब होते देख पिता ने हंगामा करना शुरू कर दिया तो मौके पहुंची बाल रोग विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. माला कुमार ने बच्चे को वापस ट्रॉमा सेंटर भेजा तब जाकर करीब नौ घंटे बाद उसे भर्ती किया गया।
वहीं दूसरी ओर गोसाईंगंज की मालती भी अपने तेरह दिन के नवजात मयंक को लेकर सिविल अस्पताल पहुंची।
वहां इमरजेंसी में मौजूद डॉक्टरों ने डायरिया की शिकायत के बाद केजीएमयू रेफर कर दिया लेकिन नियमानुसार बच्चे की न तो रेफरल स्लिप बनाई गई और न ही केजीएमयू जाने के लिए एम्बुलेंस दी गई।