अगर इस बार चूके तो कहीं के नहीं रहेंगे अखिलेश
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आज से शुरू हो रहे विधानमंडल के बजट सत्र के रूप में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पास अंतिम मौका। अगर वह इसे भुना नहीं सके तो वह कहीं के नहीं रहेंगे। इसलिए बजट को लेकर विशेषज्ञ उन्हें सलाह दे रहे हैं।
बदले सियासी माहौल में सूबे के लोगों को मुख्यमंत्री और वित्त मंत्री अखिलेश यादव से उम्मीदें कुछ ज्यादा ही बढ़ गई हैं।
इनमें आमजन के साथ वे विशेषज्ञ भी शामिल हैं जो सूबे के आर्थिक, सामाजिक व राजनैतिक ताने-बाने पर सतर्क निगाह रखते हैं।
इनका तर्क है कि मुख्यमंत्री के पास सूबे के हित में बजट के जरिये कुछ हटकर दिखाने का बड़ा मौका है। यदि इस बजट में वे चूके तो आगे के वर्षों में उनके पास वापसी का कोई मौका न होगा।
सरकार ले बड़े फैसले
मुख्यमंत्री से उम्मीद की जा रही है कि वे बजट में भी वैसे ही कड़े और साहस भरे कदम उठाएं जैसा कि उन्होंने अपने सहयोगी मंत्रियों के पर कतरने और कद बढ़ाने में दिखाया है।
इस समय उनके सामने न तो तत्काल किसी बड़े चुनाव का सामना करने की चुनौती है और न ही सरकार की ताकत को लेकर ही कोई खास चिंता।
ऐसे में वे चाहें तो प्रदेश की बिगड़ती आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए तमाम अनुत्पादक खर्चों पर लगाम लगा सकते हैं। सब्सिडी कम करके और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के लीकेज रोकने का ठोस बंदोबस्त कर आम लोगों का भरोसा जीत सकते हैं।
अभी चाहे जितने दावे किए जाएं, खाद्यान्नों का पात्रों तक पूरी मात्रा में पहुंचना मुश्किल बना हुआ है। कालाबाजारी और जमाखोरी की समस्या भी समय-समय उभर आती है।
दूर हो सकती हैं किसानों की चिंता
इसके अलावा सरकार ने सूबे के इन्फ्रास्ट्रक्चर व उद्योगों के विकास के लिए जो नीतियां बनाई हैं, उनमें घोषित इन्सेंटिव के लिए बजट का बंदोबस्त करना चाहिए।
इससे निवेशकों में भरोसा बढ़ेगा कि यूपी जाने पर उन्हें वास्तव में नीतियों का फायदा मिलेगा। मुख्यमंत्री वैट को लेकर कारोबारियों की चिंता दूर कर सकते हैं जिस पर वे लंबे समय से आश्वासन देते आ रहे हैं।
सपा ने अपने घोषणापत्र में किसान आयोग का ऐलान किया था, जो अब तक नहीं बना। सरकार आयोग बनाकर किसानों की बुनियादी चिंताओं को दूर कर सकती है।
बंद करें लोकलुभावन योजना
बिजली संकट जिस तरह सियासी मुद्दा बनता है, सरकार को पावर सेक्टर में उत्पादन के साथ वितरण सिस्टम का लीकेज दूर करना चाहिए। उपलब्ध बिजली का शत-प्रतिशत सदुपयोग करना आज सबसे बड़ी आवश्यकता है।
लैपटॉप व ‘हमारी बेटी-उसका कल’ जैसी लोक लुभावन योजनाओं की जगह स्कूलों में कंप्यूटर लैब बनवाकर युवाओं को कंप्यूटर शिक्षा देने और लड़कियों को इंटरमीडिएट की जगह हाईस्कूल पास करने पर ही कन्या विद्याधन देने जैसा विकल्प आजमाया जा सकता है।
बेरोजगारी भत्ता की जगह स्किल डवलपमेंट पर समयबद्ध कार्यक्रम शुरू करना चाहिए। ऐसे तमाम छोटे-छोटे कदम उठाकर सरकार बदलाव का संकेत दे सकती है।
ये हैं विशेषज्ञों की उम्मीदें
यूपी सरकार के बजट पर अर्थशास्त्री प्रो यशवीर त्यागी का कहना है कि प्रदेश के विकास के लिए लिहाज से बजट में यदि पांच प्रमुख कदम उठाए जाएं तो दीर्घकालिक असर नजर आएगा। पहला, प्रदेश में जबर्दस्त ऊर्जा संकट को देखते हुए उत्पादन व वितरण ठीक करने के लिए अधिक धन का प्रावधान होना चाहिए।
दूसरा, कमजोर मानसून की चेतावनी और प्रदेश के भी प्रभावित होने की खबरों के मद्देनजर प्रदेश सरकार को भी केंद्र की तरह सूखे से ज्यादा प्रभावित होने की आशंका वाले जिलों को चिह्नित करने की तैयारी करनी होगी। बजट में सिंचाई व जल प्रबंधन के लिए विशेष प्रावधान करना चाहिए।
तीसरा, निवेश तब आएगा जब प्रदेश में कानून-व्यवस्था सही होगी। बजट में पुलिस आधुनिकीकरण पर जोर हो और पुलिस के नियमित प्रशिक्षण और मोटिवेशन का प्रावधान हो। चौथा, निवेशकों को आकर्षित करने के लिए कर प्रणाली की जटिलताएं कम की जाएं।
पांचवां और सबसे अहम, चुनाव खत्म हो गए हैं। ऐसे में लोक लुभावन घोषणाएं न कर विकास को बढ़ाने वाले कदम उठाए जाएं। उच्च शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया जाए। अनुसंधान से जुड़े संस्थानों की सहायता बढ़ाई जाए।
लैपटॉप और टेबलेट का फेर छोड़ें अखिलेश
लखनऊ विश्वविद्यालय के समाजशास्त्री डॉ. डीआर साहू का कहना है कि 12 वीं पंचवर्षीय योजना सामाजिक क्षेत्र के लिए अच्छी रूपरेखा पेश करती है। समावेशी विकास के लिए बहुत अच्छे सुझाव व रोडमैप है। लुभावने वादे व अनुदान से लंबा रास्ता नहीं तय हो सकता।
कुछ अल्पकालिक व दीर्घकालिक कदम उठाए जाएं तो ऐसी जरूरत ही नहीं आएगी। सरकार को लैपटॉप व टैबलेट के फेर में पड़ने की जगह शिक्षा की गुणवत्ता पर ध्यान देना चाहिए। हर स्कूल में बिजली, कंप्यूटर लैब और कंप्यूटर शिक्षक होना चाहिए। प्राथमिक विद्यालयों के ढांचा व गुणवत्ता पर ध्यान दिया जाए ताकि अमीर व गरीब सभी अपने बच्चे को वहां पढ़ाने में रुचि लें।
कोई अच्छा काम कर रहा है तो उसे आजमाने में संकोच नहीं होना चाहिए। छत्तीसगढ़ की पीडीएस प्रणाली, गुजरात का बिजली सिस्टम, महाराष्ट्र के अहमदनगर में सूखा की समस्या दूर करने वाला और भ्रष्टाचार पर अंकुश का कर्नाटक मॉडल सामने है।
स्वास्थ्य के क्षेत्र में केंद्र की कई स्कीमें हैं। सरकार इन्हें आजमा सकती है। इसी तरह सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए कि किसान का गन्ना बिके तो उसे तत्काल पैसा मिल जाए। मुख्यमंत्री बजट के साथ उसके क्रियान्वयन का स्पीडी सिस्टम बनाकर इस चुनौती को अवसर में बदल सकते हैं।
प्रदेश की वित्तीय स्थिति सुधारें अखिलेश
बजट सत्र पर अखिलेश सरकार को सलाह देते हुए यूपी सीआईआई के चेयरमैन सचिन अग्रवाल का कहना है कि आमदनी चवन्नी-खर्च रुपैया पर तत्काल अंकुश जरूरी है। प्रदेश की वित्तीय स्थिति बेहद नाजुक है।
जिस तरह लोक लुभावन व सियासी योजनाओं का दौर चल रहा है, उससे ज्यादा उम्मीद नहीं की जा सकती। प्रदेश के जो हालात हैं, उनमें वित्तीय घाटे पर अंकुश लगाना सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
वरना, आमदनी चवन्नी और खर्च रुपैया की मौजूदा स्थिति के कारण आगे बहुत मुश्किल आने वाली है। सब्सिडी पर खर्च कम किया जाना चाहिए और सरकारी योजनाओं का लाभ बिना बिचौलिए के सीधे पात्र तक पहुंचे, ऐसा तंत्र विकसित करना चाहिए।
लोक लुभावन स्कीम पर अंकुश लगानी होगी। दूसरे राज्यों की तरह वैट को तर्कसंगत बनाने के साथ एंट्री टैक्स को पूरी तरह खत्म किया जाना चाहिए।
बिजली समस्या का हल निकालना जरूरी
आईआईए यूपी के अधिशासी निदेशक डीएस वर्मा का का कहना है कि प्रदेश में बिजली की गंभीर समस्या है। पावर हाउस को ऐसी तकनीक से लैस किया जाए जिससे वहां उपलब्ध बिजली पूरी तरह से उपभोक्ताओं तक पहुंच सके। इसके लिए तंत्र और बजट बढ़ाना चाहिए।
मुख्यमंत्री ने निवेश लाने के लिए कई अच्छी नीतियां बनाई हैं। इन नीतियों के प्रोत्साहन व मदद के लिए बजट का बंदोबस्त होना चाहिए। सरकार को इंडस्ट्री से तमाम टैक्स के रूप में इस रकम की वापसी में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा।
डायरेक्टर ऑफ इंडस्ट्रीज द्वारा विकसित औद्योगिक क्षेत्रों की बदहाली दूर करने के लिए बजट में कदम दिखेगा तो बेहतर रहेगा।
इससे उद्योगों के विकास का रास्ता बनेगा। सरकार उद्योगों के लिए समयबद्ध क्लीयरेंस व सुविधाओं का कानूनी प्रावधान यदि कर दे तो बड़ा फर्क नजर आ सकता है। इंडस्ट्रियल सर्विसेज गारंटी एक्ट को कानूनी शक्ल मिलना चाहिए।