अपने 'अंश' के लिए मां की अनोखी लड़ाई
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उसको लोरी सुनाकर सुलाने की साध...उसकी मीठी मुस्कान में अपना सब कुछ भूल जाने की तमन्ना...। जन्म से पहले ऐसे न जाने कितने सपने बुने निशा ने। उन सपनों में खोकर न जाने कितनी बार हंसी...। पर बेटे को जन्म देने के बाद भी साध अधूरी ही रही...। सिस्टम की अंतहीन अंधियारी गलियों में भटकती वह आह में डूबी सिसकियों से सैकड़ों किमी दूर अपने लाडले को लोरी सुनाती रही...। कल्पना में ही उसे दुलारती और उसको बढ़ते देखती रही...। अब तो वह चलने भी लगा होगा...। पिछले बीस महीने यूं ही गुजरे बाराबंकी की रहने वाली निशा के। इस दौरान वह अपने लाडले को पाने के लिए कहां-कहां भटकी, सिस्टम का रवैया क्या रहा, उस पर पेश है रिपोर्ट।
दर्द भरी कहानी
बाराबंकी के नाऊ का पुरवा की रहने वाली सुजाऊ देवी की बेटी निशा की ममता की बेहद दर्द भरी कहानी है। 19-20 मई 2012 की दरमियानी रात बच्चे को जन्म दिया। प्रसव पीड़ा की वजह से वह अचेत हो गई। उस दौरान घर के सभी लोग खेत में सिंचाई के लिए गए हुए थे। इसी दौरान जगराना नामक एक विक्षिप्त महिला घर से नवजात शिशु को उठा ले गई। गांव वालों ने इसकी सूचना असंदरा पुलिस स्टेशन में दी और बच्चे को बरामद करके ग्राम प्रधान और ग्रामीणों की मदद से निशा को वापस दे दिया गया। पर लालची सिस्टम की संवेदनहीनता उसकी खुशियों पर नजर गड़ाए बैठी थी।
नानी का अंगूठा लगवाकर लिया बच्चा
बच्चा मां के पास पहुंचने के बाद किसी पुलिस वाले ने लखनऊ के अलीगंज सेक्टर 1 स्थित श्रीराम औद्योगिक अनाथालय में सुप्रिंटेंडेंट रुचि त्रिपाठी को लावारिस नवजात शिशु मिलने की सूचना दी। त्रिपाठी ने असंदरा थाने में आवेदन दिया कि कानूनी रूप से बच्चे की कस्टडी उसे दी जानी चाहिए। एसआई ने 21 मई को निशा को थाने बुलाया और सुपुर्दगीनामा बनाकर बच्चा रुचि को सौंप दिया। बच्चे की नानी सुजाऊ देवी के अंगूठे के निशान उस पर ले लिए। बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) बाराबंकी के पास मामला पहुंचा तो उन्हाेंने जेजे एक्ट के सेक्शन 29 के तहत असंदरा एसओ को बच्चे को उसके समक्ष पेश करने को कहा। पुलिस ने रुचि को 12 जून 2012 को बच्चा सीडब्ल्यूसी बाराबंकी में प्रस्तुत करने को कहा तो उसने बच्चे के बीमार होने का बहाना बनाया और नहीं आई।
सीडब्ल्यूसी बाराबंकी की किसी ने नहीं सुनी
सुजाऊ देवी ने भी सीडब्ल्यूसी से मदद मांगी। सीडब्ल्यूसी ने महिला एवं बाल कल्याण विभाग के निदेशक और एसपी बाराबंकी से रुचि की शिकायत कर मदद मांगी। 26 जुलाई को फिर से बच्चा प्रस्तुत करने की तारीख दी गई, रुचि फिर नहीं आई। उसने पुलिस को बताया कि बच्चा बीमार है और उसने सीडब्ल्यूसी लखनऊ में 25 मई को ही बच्चे को प्रस्तुत करके उसकी कस्टडी ले ली है। उसने दस्तावेज भेजकर कहा कि अब मामला सीडब्ल्यूसी बाराबंकी के क्षेत्राधिकार का नहीं है। सीडब्ल्यूसी बाराबंकी ने महिला कल्याण विभाग केनिदेशक से अगस्त में दो बार मदद मांगी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई।
हारकर पहुंची हाईकोर्ट
निशा ने 22 अगस्त को डीएम बाराबंकी से मदद मांगी लेकिन कोई मदद नहीं मिली। अंतत: उसने हैबियस कॉर्पस के तहत हाईकोर्ट में याचिका दायर की। 19 फरवरी 2013 को हाईकोर्ट ने सीडब्ल्यूसी बाराबंकी व रुचि से जवाब तलब किया। इसमें सामने आया कि रुचि ने बच्चे की दो दफा चिकित्सकीय जांच करवाई और उसे स्वस्थ पाया गया। इसके बाद 31 मई को उसे सेप्टिसीमिया बताते हुए 7 दिन बलरामपुर अस्पताल में भर्ती दिखाया गया।
दे दिया गोद
वहीं श्रीराम औद्योगिक अनाथालय के ही किसी मनोज कुमार ने 22 जुलाई को बच्चा गोद लेना चाह रहे जयपुर के सोनी दंपती की ‘होम स्टडी’ करवाई। इसमें परिवार को उपयुक्त बताया गया। बच्चे को दो महीने अनाथालय में रखा गया और प्रक्रिया के यह अवधि बीतने पर ‘फ्री फॉर अडॉप्शन’ घोषित कर दिया गया। वहीं श्रुति त्रिपाठी ने बच्चे की बनाई गई रिपोर्ट में उसे शिवा व प्रतीक नाम देते हुए बताया कि वह 6 मई 2012 को बाराबंकी में जन्मा है और लावारिस है। उसे 21 मई को अनाथालय लाया गया और 28 जुलाई को बच्चा जयपुर के दंपती सतेंद्र सोनी और मीनाक्षी सोनी को गोद दे दिया गया। कोर्ट को दिए दस्तावेज में संदिग्ध यह भी रहा कि अडॉप्शन समिति की बैठक उसी दिन शाम 6 बजे की गई थी। सारी प्रोसीडिंग को अलग-अलग कागजात में लिखकर समिति के हस्ताक्षर लिए गए।
उल्टा चोर कोतवाल को डांटे
इस बीच सीडब्ल्यूसी बाराबंकी अध्यक्ष अंगद सिंह ने जब रुचि पर बच्चा वापस देने केलिए कानूनी दबाव बनाया तो रुचि ने उल्टे उन्हीं के खिलाफ बाराबंकी पुलिस को हैरेसमेंट की शिकायत दे दी। उनके द्वारा बच्चा वापसी केलिए किए जा रहे प्रयासों को व्यक्तिगत दुर्भावना से प्रेरित बताया और कहा कि पुलिस उनके खिलाफ उचित कार्रवाई करे।
पुलिस की भूमिका भी संदिग्ध
दूसरी ओर मामले में बाराबंकी पुलिस की भूमिका भी संदिग्ध नजर आती है। 25 जुलाई 2012 के जिला क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो केअनुसार यहां उस दौरान पिछले 2 महीने में 15 दिन की उम्र के किसी बच्चे के लापता होने की रिपोर्ट नहीं दर्ज हुई। निशा के विवरण से स्पष्ट था कि बच्चा 2 दिन का है जबकि रुचि त्रिपाठी ने उसे 15 दिन का बताया था। ऐसे में 15 दिन के बच्चे की गुमशुदगी की कोर्ट को रिपोर्ट देना पुलिस का झुकाव रुचि की ओर दर्शाता है।
रुचि का झूठ
रुचि ने हाईकोर्ट में अपने बयान में पुलिस द्वारा दी गई जानकारियों पर सारा दोष मढ़ा। उसने कहा कि पुलिस ने उसे बताया था कि बच्चे की मां एक पागल औरत है। वह यह मानने को कतई तैयार नहीं थी कि निशा ही बच्चे की मां है। वहीं निशा पूरे समय कहती रही, चिल्लाती रही कि बच्चा उसी का है, लेकिन न पुलिस ने उसकी सुनी और न रुचि का दिल पसीजा।
फिर भी अड़ी रही रुचि
डीएनए टेस्ट के बावजूद रुचि अड़ी रही कि गोद देने की प्रक्रिया कानून के तहत की गई है, और बच्चा गोद दिया जा चुका है। उसने दावा किया कि उसका अनाथालय कानूनी तौर पर पंजीकृत अडॉप्शन एजेंसी है।
डीएनए टेस्ट ने किया दूध का दूध
निशा ने डीएनए टेस्ट की मांग की। कोर्ट ने इसे स्वीकार कर लिया। अगले दिन पीजीआई लखनऊ में सैंपल लिए गए और टेस्ट हुआ। रिपोर्ट में सामने आया कि बच्चा निशा का ही है। रुचि त्रिपाठी को कार्रवाई का नोटिस दिया गया और डीएनए टेस्ट की रकम 25,400 रुपए मांगी गई। वहीं सोनी दंपती को बच्चा वापस नहीं करने की वजह पूछी गई।
खुद बनाती थी सीडब्ल्यूसी लखनऊ के दस्तावेज
इस मामले में रुचि ने हाईकोर्ट में जो दस्तावेज पेश किया उनमें खास बात थी कि उन्हें वह खुद बनाती थी। दरअसल सीडब्ल्यूसी लखनऊ के पास अपना काम करने केलिए खुद का कोई ऑफिस नहीं था। ऐसे में रुचि त्रिपाठी उनके दस्तावेज तैयार करती थी, उन्हें मेंटेन करती थी और रखती थी।
नई मुश्किल
भावनात्मक तौर पर जयपुर के दंपती के लिए 15 जनवरी मुश्किल समय होगा। विशेषज्ञों केअनुसार अपने परिवार में 20 महीने तक एक नवजात बच्चे को रखकर उसे लौटाना उनके लिए दुखद होगा। वहीं कानून के विशेषज्ञ कहते हैं कि उन्हें इस स्थिति के लिए तभी से तैयार रहना चाहिए था जब उन्होंने कानून को ताक पर रखकर बच्चा गोद लिया। कानून को भावनाओं से फर्क नहीं पड़ता, जो सत्य है, वही अंतिम है।
और हाईकोर्ट का रुख
कोर्ट ने इस मामले में स्पष्ट किया कि रुचि की ओर से अपनाई गई वैधानिक प्रक्रिया उसी पल खारिज हो जाती है जब उसने सीडब्ल्यूसी बाराबंकी के बजाय सीडब्ल्यूसी लखनऊ में बच्चे को पेश किया। उसके आगे उसने जो भी कार्यवाही की वह निष्प्रभावी हो जाती है।
इन सवालों ने किया फैसला
हाईकोर्ट ने जेजे एक्ट के आधार पर कहा कि जब बच्चे निशा के पास ही था तो उसे गोद दिए जाने की जरूरत नहीं थी। बच्चे को निशा से पुलिस इंस्पेक्टर सतीश कुमार सिंह ने छीनकर रुचि के हाथ में दिया। इस बात की जांच कराई जा सकती थी कि बच्चा निशा का है या नहीं। और डीएनए रिपोर्ट ने साबित कर दिया कि बच्चा निशा का ही है।
क्या रुचि त्रिपाठी, श्रीराम औद्योगिक अनाथालय, सीडब्ल्यूसी लखनऊ, जिला जज लखनऊ ने एक्ट के अनुसार काम किया?
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यह स्पष्ट है कि पुलिस, सोनी दंपती और रुचि त्रिपाठी येन केन प्रकारेण बच्चे को हासिल करना चाहते थे। देखने पर लगता है कि उन्होंने आपराधिक साजिश रचकर कानूनी प्रावधानों का दुरुपयोग किया और कानून को धोखा देने में लगभग सफल हो गए। सीडब्ल्यूसी लखनऊ और लखनऊ जिला जज का यह क्षेत्राधिकार नहीं था क्यों बच्चा बाराबंकी जिले का है। कोर्ट ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि ‘विधायिका कानून तो बना देती है, महज यही काफी नहीं है। समस्याओं को हल करने के लिए इन कानूनों को सही अमल भी जरूरी है।’