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नगर निगम में तीन साल से बिना वेतन काम कर रहे 23 कर्मचारी
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प्रवेंद्र गुप्ता
नगर निगम में करीब तीन साल से 23 ऐसे चालक गाड़ियां चला रहे हैं जो न तो स्थायी हैं, न संविदा पर हैं और न ही कार्यदायी संस्था के जरिये तैनात हैं।
इनका कर्मचारी के तौर पर कोई अस्तित्व नहीं है। ऐसे में इन्हें वेतन भी नहीं मिलता है। ये खुद को संविदाकर्मी बताते हैं, लेकिन नगर निगम इन्हें संविदाकर्मी नहीं मानता है।
ये 23 कर्मचारी पहले संविदा पर ही थे। 2005 में शासन के आदेश पर जब संविदा समाप्त की गई तो नगर निगम के अलग-अलग विभाग में तैनात करीब 200 कर्मचारी भी हटाए गए।
इनमें ये कर्मचारी भी शामिल थे। विरोध पर जिन कर्मचारियों ने कार्यदायी संस्था के जरिये अनुबंध कर काम करने की सहमति दी तो उनको रख लिया गया।
इस दौरान निगम का ही एक कर्मचारी गुपचुप तरीके से दूसरी कार्यदायी संस्था के नाम पर इन 23 कर्मचारियों को चेक से वेतन देता रहा। तीन साल पहले ये कर्मचारी सेवानिवृत्त हो गया।
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इस बीच निगम प्रशासन ने टेंडर जारी कर अवनि परिधि नामक कार्यदायी संस्था को काम दिया। इस संस्था ने उन कर्मचारियों से फिर से अनुबंध फार्म भराना शुरू किया जो पहले किसी और संस्था से थे।
इस पर इन 23 कर्मचारियों ने विरोध किया और अवनि परिधि से वेतन नहीं लिया। एक साल पहले अवनि परिधि संस्था का भी अनुबंध समाप्त हो गया और नई संस्था आ गई।
इस विवाद को तीन साल हो गए, लेकिन ये 23 कर्मचारी कार्यदायी संस्था से वेतन नहीं ले रहे हैं, जबकि करीब 100 चालक कार्यदायी संस्था से वेतन ले रहे हैं।
वेतन न लेने के पीछे यह वजह
मामले की जानकारी रखने वाले जानकारों ने बताया कि 24 फरवरी 2016 को शासन ने उन सभी संविदाकर्मियों का नियमित करने का आदेश दिया जो 31 दिसंबर 2001 तक नियुक्त हुए और शासनादेश जारी होने की तिथि तक उसी रूप में कार्यरत हैं। ऐसे कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए काफी संख्या में पद सृजन की भी अनुमति दी गई। नियमित होने की आस में ही ये कर्मचारी कार्यदायी संस्था से वेतन नहीं ले रहे हैं। यदि कार्यदायी संस्था से वेतन ले लेंगे तो वह नियमित कर्मचारी होने के दावे से बाहर हो जाएंगे।
...आखिर कैसे चल रहा तीन साल से बिना वेतन काम
नगर निगम के ही कर्मचारी कहते हैं कि बिना वेतन कोई तीन साल कैसे काम कर सकता है। नियमित कर्मचारी एक सप्ताह वेतन लेट होने पर अफसरों का घेराव करने लगते हैं। आर्थिक समस्या बताने लगते हैं वहीं, संविदाकर्मी, जिसे आठ हजार रुपये वेतन मिलता है, इसे भी वह तीन साल से मना कर आखिर काम कैसे कर रहा है। यह चौंकाने वाली बात है। जानकार कहते हैं कि गाड़ी चलाने में कार्यदायी के वेतन से अधिक फायदा है। इसी कारण लोग गाड़ी चलाने के लिए जोड़-जुगाड़ तक करते हैं।
न्यायालय में है मामला
मामला न्यायालय में है। नगर निगम से वेतन दिए जाने की मांग है। इधर, तीन साल से वेतन नहीं मिला है।
- राजेश भारती, वेतन न लेने वाला चालक
इस मामले की जानकारी नहीं है। जिम्मेदार अफसरों से इस बारे में पूरी रिपोर्ट ली जाएगी और आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।
- अजय द्विवेदी, नगर आयुक्त
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नगर निगम में करीब तीन साल से 23 ऐसे चालक गाड़ियां चला रहे हैं जो न तो स्थायी हैं, न संविदा पर हैं और न ही कार्यदायी संस्था के जरिये तैनात हैं।
इनका कर्मचारी के तौर पर कोई अस्तित्व नहीं है। ऐसे में इन्हें वेतन भी नहीं मिलता है। ये खुद को संविदाकर्मी बताते हैं, लेकिन नगर निगम इन्हें संविदाकर्मी नहीं मानता है।
ये 23 कर्मचारी पहले संविदा पर ही थे। 2005 में शासन के आदेश पर जब संविदा समाप्त की गई तो नगर निगम के अलग-अलग विभाग में तैनात करीब 200 कर्मचारी भी हटाए गए।
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इनमें ये कर्मचारी भी शामिल थे। विरोध पर जिन कर्मचारियों ने कार्यदायी संस्था के जरिये अनुबंध कर काम करने की सहमति दी तो उनको रख लिया गया।
इस दौरान निगम का ही एक कर्मचारी गुपचुप तरीके से दूसरी कार्यदायी संस्था के नाम पर इन 23 कर्मचारियों को चेक से वेतन देता रहा। तीन साल पहले ये कर्मचारी सेवानिवृत्त हो गया।
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इस बीच निगम प्रशासन ने टेंडर जारी कर अवनि परिधि नामक कार्यदायी संस्था को काम दिया। इस संस्था ने उन कर्मचारियों से फिर से अनुबंध फार्म भराना शुरू किया जो पहले किसी और संस्था से थे।
इस पर इन 23 कर्मचारियों ने विरोध किया और अवनि परिधि से वेतन नहीं लिया। एक साल पहले अवनि परिधि संस्था का भी अनुबंध समाप्त हो गया और नई संस्था आ गई।
इस विवाद को तीन साल हो गए, लेकिन ये 23 कर्मचारी कार्यदायी संस्था से वेतन नहीं ले रहे हैं, जबकि करीब 100 चालक कार्यदायी संस्था से वेतन ले रहे हैं।
वेतन न लेने के पीछे यह वजह
मामले की जानकारी रखने वाले जानकारों ने बताया कि 24 फरवरी 2016 को शासन ने उन सभी संविदाकर्मियों का नियमित करने का आदेश दिया जो 31 दिसंबर 2001 तक नियुक्त हुए और शासनादेश जारी होने की तिथि तक उसी रूप में कार्यरत हैं। ऐसे कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए काफी संख्या में पद सृजन की भी अनुमति दी गई। नियमित होने की आस में ही ये कर्मचारी कार्यदायी संस्था से वेतन नहीं ले रहे हैं। यदि कार्यदायी संस्था से वेतन ले लेंगे तो वह नियमित कर्मचारी होने के दावे से बाहर हो जाएंगे।
...आखिर कैसे चल रहा तीन साल से बिना वेतन काम
नगर निगम के ही कर्मचारी कहते हैं कि बिना वेतन कोई तीन साल कैसे काम कर सकता है। नियमित कर्मचारी एक सप्ताह वेतन लेट होने पर अफसरों का घेराव करने लगते हैं। आर्थिक समस्या बताने लगते हैं वहीं, संविदाकर्मी, जिसे आठ हजार रुपये वेतन मिलता है, इसे भी वह तीन साल से मना कर आखिर काम कैसे कर रहा है। यह चौंकाने वाली बात है। जानकार कहते हैं कि गाड़ी चलाने में कार्यदायी के वेतन से अधिक फायदा है। इसी कारण लोग गाड़ी चलाने के लिए जोड़-जुगाड़ तक करते हैं।
न्यायालय में है मामला
मामला न्यायालय में है। नगर निगम से वेतन दिए जाने की मांग है। इधर, तीन साल से वेतन नहीं मिला है।
- राजेश भारती, वेतन न लेने वाला चालक
इस मामले की जानकारी नहीं है। जिम्मेदार अफसरों से इस बारे में पूरी रिपोर्ट ली जाएगी और आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।
- अजय द्विवेदी, नगर आयुक्त