UP: सियासी सपनों की बिसात का साल बनेगा 2016
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सूबे में सियासी पार्टियों के बीच शह और मात के खेल का नतीजा तो 2017 में सामने आएगा, लेकिन उसके लिए बिसात बिछाने का काम इसी साल शुरू हो जाएगा। केंद्र में सत्ता पाने के बाद 2017 में यूपी की सत्ता पर भी कब्जा जमाने का सपना देख रही भाजपा के लिए यह साल बदलाव और नई चुनौतियों वाला बनेगा।
सत्ता पर कब्जा बरकरार रखने का सपना देख रही सपा और सत्ता में वापसी की कोशिश में जुटी बसपा के लिए यह वर्ष कई कसौटियों भरा रहने वाला है तो कांग्रेस के लिए भी कुछ करके दिखाने की चुनौती इंतजार कर रही है।
भाजपा : बदलाव और चुनावी चुनौतियों का साल
भाजपा के लिए यह वर्ष मुख्य रूप से बदलाव और चुनावी चुनौतियों का साल बनने वाला है। इनमें संगठन के चुनाव से लेकर विधानसभा उपचुनाव, विधान परिषद चुनाव और अन्य कई चुनाव शामिल हैं। बदलाव की बात करें तो सबसे बड़ा बदलाव भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष का है।
पार्टी के सांगठनिक चुनाव का सिलसिला पिछले साल ही शुरू हो चुका है, लेकिन अगले कुछ दिनों में भाजपा को नए प्रदेश अध्यक्ष देने के साथ इस सिलसिले का समापन इसी वर्ष होगा।
प्रदेश अध्यक्ष के साथ नई टीम में भी होंगे बदलाव
स्वाभाविक है कि नए प्रदेश अध्यक्ष के साथ पार्टी की प्रदेश टीम में भी कई बदलाव सामने आएंगे। नया अध्यक्ष और नई टीम के बाद देखने वाली बात यह भी होगी कि पार्टी के कामकाज के तौर-तरीकों में क्या बदलाव होते हैं और नई टीम 2017 में पार्टी की प्रदेश की सत्ता पर कब्जा के लिए किस रणनीति पर काम आगे बढ़ाती है।
अन्य चुनाव भी लेंगे परीक्षा
संगठनात्मक चुनाव के साथ अन्य चुनाव की चुनौतियां भी इस साल भाजपा की कदम-कदम पर परीक्षा लेंगी। पिछले एक दशक से अधिक समय से क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के प्रभाव में फंसे उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव 2014 में भाजपा के जबर्दस्त उभार ने क्षेत्रीय दलों का वर्चस्व कम होने का संकेत जरूर दिया था, पर बाद में हुए विधानसभा उपचुनाव और अभी हाल ही जिला पंचायत सदस्यों के चुनाव ने क्षेत्रीय दलों के कमजोर होने की धारणा बदलने के लिए एक बार फिर मजबूर कर दिया है।
खुद को खरा नहीं उतार पा रही है भाजपा
जिला पंचायत सदस्यों की तीन हजार से अधिक सीटों में भाजपा की झोली में 538 सीटें आई थीं लेकिन जिला पंचायत अध्यक्षों के चुनाव की कसौटी पर वह खुद को खरा नहीं उतार पा रही है।
निकट भविष्य में विधान परिषद की 36 सीटों के चुनाव में भी भाजपा की उम्मीद काफी धुंधली दिख रही है। अगले कुछ दिनों में विधानसभा की तीन सीटों के उपचुनाव भी ‘कमल खिलाने’ के लिए कम चुनौतीपूर्ण नहीं रहेंगे।
जाहिर है इन नतीजों का असर भी भाजपा के मिशन 2017 की चुनावी नीति और रणनीति पर पड़े बिना नहीं रहेगा। यूपी विधानसभा के चुनाव भले ही अगले साल होंगे, लेकिन उनकी भूमिका के संकेत इसी साल सामने आने लगेंगे।
कितना बदलेगा बसपा का चेहरा
बसपा सुप्रीमो मायावती ने 2015 में यह घोषणा करके कि वह दोबारा सत्ता में आती हैं तो पार्कों और प्रतिमाओं के काम के बजाय विकास के एजेंडे पर अपना काम आगे बढ़ाएंगी, पार्टी के चेहरे के बदलाव का संकेत दिया है।
इसलिए 2016 में सबसे खास बात यही देखने वाली होगी कि यह बदलाव और किस दिशा में आगे बढ़ता है। सबसे बड़ी बात यह भी देखने वाली होगी कि विकास के एजेंडे के साथ 2017 के चुनावी समर में उतरने का एलान करने वाली बसपा वोटों की गणित दुरुस्त करने के लिए क्या-क्या बदलाव करती है।
वर्ष 2012 और 2014 में चुनावी झटके के बाद अपर कास्ट का वोट बसपा को न मिलने की बात कहने वाली मायावती इन जातियों का समर्थन हासिल करने के लिए किस तरह की बिसात बिछाती हैं।
ये चुनौतियां होंगी बसपा के सामने
जहां तक चुनौतियों का सवाल है तो बसपा के सामने भी कम चुनौतियां नहीं खड़ी दिख रही हैं। जिला पंचायत चुनाव में पार्टी समर्थित कई लोगों की जीत से पार्टी के पक्ष में बना माहौल जिला पंचायत अध्यक्षी के चुनाव में फिलहाल हाथी के आगे बढ़ने का कोई करिश्मा करता नहीं दिखता।
जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव सत्तापक्ष का होने का तथ्य सर्वविदित होने के बावजूद इससे इन्कार नहीं किया जा सकता है कि सपा की बढ़त सबसे ज्यादा बसपा के ऊपर ही मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने वाली होगी।
इसलिए यह बात भी खास तौर से देखने वाली होगी कि सपा की इस मनोवैज्ञानिक बढ़त से बसपा किस तरह उबरती है। भले ही मायावती 2017 में सूबे की सत्ता में वापसी का सपना देख रही हों, लेकिन अपर कास्ट के अलावा पिछड़ी जातियों को बसपा के साथ फिर जोड़ना भी बसपा के लिए किसी चुनौती से कम नहीं रहने वाला है।
खास तौर से तब, जब सपा और भाजपा का काम भी पिछड़ों की लामबंदी पर ही चल रहा है।
सपा के लिए मुश्किल होगा पैदा खाई पाट पाना
सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के लिए वर्ष 2016 काफी चुनौतियों से भरा रहने वाला है। विधानसभा चुनाव के समीकरण साधने के साथ ही सपा को नई और पुरानी पीढ़ी के बीच गहराते अंतर्विरोधों को कम करना होगा।
पार्टी जिस तरह 2017 में भी सत्ता पर कब्जा बरकरार रखने का सपना देख रही है, उसके चलते पंचायत चुनाव के कारण कार्यकर्ताओं में निचले स्तर तक बढ़ी खाई को भी इसी साल पाटना होगा। संगठन और सत्ता के बीच संतुलन की कमी को दूर करने की चुनौती से भी पार्टी को पार पाना होगा।
सपा के पास 2017 की चुनावी जंग के लिए बिसात सजाने को केवल 2016 ही बचा है। इस दौरान जहां संगठन की मशीनरी के मार्फत जनता के बीच सुशासन और कानून-व्यवस्था बेहतर होने का संदेश देना है, वहीं सेनापतियों और कार्यकर्ताओं की फौज का मनोबल बढ़ाना होगा। वर्ष 2015 जाते-जाते कुछ ऐसी चुनौतियां दे गया है, जिनसे पार्टी को चुनावी साल में दो-चार होना होगा।
सपा के दो युवा नेताओं आनंद भदौरिया व सुनील यादव ‘साजन’ के निष्कासन से पार्टी में ‘नई पीढ़ी बनाम पुरानी पीढ़ी’ के बीच संघर्ष की नई शुरुआत सामने आई है। पार्टी नेतृत्व ने भदौरिया व साजन का निष्कासन भले ही खत्म कर दिया हो, लेकिन इस प्रकरण से पुरानी और नई पीढ़ी के बीच अंतर्विरोध खुलकर सामने आ गए।
पैदा हुए नई और पुरानी पीढ़ी में मतभेद
सोशल मीडिया पर चले अभियान में सीएम के नजदीकी दोनों युवा नेताओं को निकाले जाने पर सवालिया निशान लगाए गए। लिहाजा, 2017 की जंग लड़ने के लिए सपा को नई और पुरानी पीढ़ी में पैदा हुए मतभेदों को दूर करके दिखाना होगा।
पंचायत चुनावों ने बढ़ाई गुटबंदी
भले ही सपा ने जिला पंचायत सदस्य, ग्राम प्रधान और बीडीसी के चुनाव में अधिकृत प्रत्याशी उतारने से परहेज किया हो, लेकिन पार्टी नेताओं ने एक-दूसरे के खिलाफ ताल ठोकने में कसर नहीं छोड़ी। कुछ जगह तो पार्टी नेताओं ने एक-दूसरे को हराने के लिए काम किया।
इससे निचले स्तर तक पार्टी नेताओं के बीच दरारें गहरी हो गईं हैं। शायद ही कोई जगह हो जहां पार्टी की गुटबंदी मुखर न हो। इसे दूर नहीं किया गया तो 2017 में नुकसान को रोक पाना आसान नहीं होगा। 2016 में सपा को इस मोर्चे पर भी जूझना होगा।
सत्ता-संगठन में बिठाना होगा तालमेल
सपा की पौने चार साल की सरकार में सत्ता और संगठन में तालमेल की कमी का मुद्दा हमेशा उठता रहा है।
जिलाध्यक्ष, युवा नेता और आम कार्यकर्ता सपा सुप्रीमो के सामने सरकार में सुनवाई न होने के आरोप लगाते रहे हैं।
आखिरी साल में सरकार से कार्यकर्ताओं की कुछ ज्यादा उम्मीदें रहेंगी। ऐसे में सत्ता और संगठन में तालमेल की कमी दूर करने की चुनौती होगी।
इसी से कार्यकर्ताओं की मायूसी दूर कर उनमें उत्साह का संचार किया जा सकेगा।