आखिरी चरण में कास्ट कार्ड से ही मिलेगी जीत
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
12 मई को आखिरी चरण में यूपी और बिहार की जिन सीटों पर मतदान होना है, उन पर जातीय राजनीति गर्मा गई है।
इन सभी सीटों पर पिछड़े और दलित मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। नरेंद्र मोदी को फर्जी ओबीसी साबित करने की कांग्रेस की कवायद इसी खेल का नतीजा है।
हालांकि इसकी शुरुआत खुद मोदी ने ‘नीच राजनीति’ संबंधी प्रियंका वाड्रा के बयान को नीची जाति से जोड़कर की थी।
भाजपा इस पहल का लाभ उठाने के लिए पूर्वांचल के सामाजिक समीकरणों के मद्देनजर जातिवाद की सवारी कराना चाहती है, तो कांग्रेस ही नहीं सपा और बसपा भी अपने वोटों में सेंधमारी रोकने के लिए हर कोशिश कर रही हैं।
सोशल इंजीनियरिंग जनाधार बना
पूर्वांचल की 18 सीटें सियासी दलों के लिए जातिवाद की प्रयोगशाला रही हैं।
पिछड़ों की एकजुटता से ही साठ के दशक में इस इलाके में चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस को कड़ी टक्कर दी थी।
किसी जमाने में यहां समाजवादी और वामपंथी आंदोलन के विस्तार की प्रमुख वजह भी सामाजिक अंतर्विरोधों को ठीक से समझना और पिछड़ों व दलितों की आवाज को उठाना था।
सोशल इंजीनियरिंग के भरोसे ही सपा और बसपा ने यहां जनाधार बनाया। ये समीकरण कांग्रेस-भाजपा को भी सामाजिक परिस्थितियों को नजरअंदाज न करने का सबक दे चुके है।
कुछ इसी तरह के हालात पड़ोसी बिहार राज्य में भी हैं। मोदी यहां की सामाजिक-राजनीतिक संरचना को भांप चुके हैं।
हर तरीके से साध रहे ‘जाति’
मोदी आठ मई को वाराणसी के रोहनिया क्षेत्र में चुनावी सभा करते हैं तो क्षेत्रीय विधायक अनुप्रिया पटेल और उनकी मां एवं अपना दल की अध्यक्ष कृष्णा पटेल को न केवल मंच पर बैठाते हैं, वरन पूरी तवज्जो भी देते हैं।
अनुप्रिया के दिवंगत पिता सोने लाल पटेल की तारीफों के पुल बांधते हैं, गुजरात में सरदार वल्लभ भाई पटेल की सबसे ऊंची और भव्य मूर्ति बनवाने का जिक्र करते हैं।
‘कथित’ मोदी लहर के बावजूद भाजपा समझौते में दो सीटें अपना दल को दे ही चुकी है।
यह सब इसलिए कि कुर्मी वोटों को भाजपा के पक्ष में लाया जा सके। मोदी खुद को छोटी जाति से जुड़ा, चाय बेचने वाला शायद इसीलिए बता रहे हैं कि उनकी नजर पिछड़ों, दलितों पर लगी हुई है।
आखिर क्या है मजबूरी
मोदी जानते हैं कि मुस्लिमों की ज्यादा आबादी वाले क्षेत्रों में दलित, पिछड़ों, अति पिछड़ों के बिना उनकी नैया पार नहीं लगेगी।
मोदी के मंसूबों को भांपकर ही बसपा सुप्रीमो मोदी से लगातार उनकी जाति पूछ रही हैं। देर से ही सही कांग्रेस ने भी मोदी की जाति व जातीय राजनीति को लेकर सवाल उठाए हैं।
कांग्रेस के प्रवक्ता शक्ति सिंह गोहिल का दावा है कि मोदी जिस मोढ़ घांची जाति से हैं, वह पिछड़ी नहीं, वैश्य वर्ग की संपन्न जाति है। घी के कारोबार से जुड़ी यह जाति गुजरात में पिछड़े वर्ग में शामिल है।
अखिलेश भी पीछे नहीं
यह जातीय गणित की मजबूरी ही है कि आमतौर पर मायावती पर तल्ख टिप्पणियां करने से बचने वाले मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी चुनावी सभाओं में मायावती पर आक्रामक नजर आ रहे हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि आने वाले दिनों में वे हाथी की सवारी छोड़कर भैंस पालने लगेंगी।
प्रतिक्रिया भी होती है जातीय ध्रुवीकरण की
महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर सतीश राय का कहना है कि पूर्वांचल की राजनीति में जातीय ध्रुवीकरण पहले भी होता रहा है।
मोदी भी पूर्वी यूपी में इसी राह पर चलना चाहते हैं लेकिन इसकी प्रतिक्रिया भी होती है। इस समय कहीं प्रो-मोदी तो कहीं एंटी-मोदी पोलेराइजेशन है।
अति पिछड़ी जातियो के कुछ दल भी बने हैं। वे किससे जुड़े हैं, यह भी मायने रखता है।
पिछड़ों, दलितों के साथ ही पूर्वांचल में मुस्लिमों के ध्रुवीकरण पर नजर है। इसीलिए सभी जातियों की बात को लेकर सामने आ गए हैं। पर, हमेशा इससे फायदा ही मिले, यह जरूरी नही है।