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...जब नगर पालिका परिषद का चपरासी बना चेयरमैन
Updated Fri, 17 Nov 2017 12:19 AM IST
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गोंडा। ब्रिटिश काल 1880 में गठित हुई गोंडा नगर पालिका ने अपने 137 वर्ष की उम्र में 46 प्रशासक/अध्यक्षों का कार्यकाल देखा है, लेकिन 1943-44 का वह दौर देश में लोकतंत्र की ताकत का अहसास कराने के लिए अविस्मरणीय है, जब यहां नगर पालिका परिषद में चपरासी रहे बांके लाल श्रीवास्तव के सिर पर चेयरमैन का ताज बंधा था। एक साल के कार्यकाल के बाद चपरासी चेयरमैन बने बांकेलाल की कुर्सी पर फिर गोंडा के राजा ने कब्जा कर लिया था।
1880 में अंग्रेजों ने गोंडा शहर में नगर पालिका परिषद का गठन किया, जिसके पहले अध्यक्ष डब्ल्यू ब्वायज बनाए गए। 1912 तक नगर पालिका परिषद में जो भी चेयरमैन हुए, वे सब अंग्रेज थे। 1914 में गोंडा शहर में राय बहादुर वैष्णो प्रसाद को चेयरमैन नियुक्त किया गया, जिन्होंने 1923 तक पारी खेली। इसके बाद अवध बिहारी लाल श्रीवास्तव, बनवारी लाल सक्सेना, राय बहादुर दुर्गाप्रसाद व जगदीश प्रसाद सक्सेना ने 1942 तक कुर्सी संभाली। 1942 में चेयरमैन पद का चुनाव हुआ तो उस समय यह चुनाव आम जनता नहीं करती थी, बल्कि उसके द्वारा विभिन्न वार्डों से चुने गए सभासद चेयरमैन चुनते थे। 1943 का वह दौर ऐसा था जब अंग्रेजी हुकूमत हिंदुस्तान में लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत दिखाकर खुद के तानाशाही दाग को धोने की कोशिश कर रही थी। चुनाव के दौरान नगर पालिका परिषद में चपरासी रहे राजा मोहल्ला निवासी बांके लाल श्रीवास्तव ने चेयरमैन पद के लिए दावेदारी की और फिर सारे सभासदों ने उनके सिर पर चेयरमैन का ताज बांध दिया। 1943 से 1944 के कार्यकाल में बांके लाल श्रीवास्तव ने गोंडा में कई काम कराए। 1944 में जब चुनाव हुआ तो चपरासी रहे चेयरमैन बांकेलाल श्रीवास्तव की कुर्सी पर गोंडा के राजा भइया जगदीश दत्त राम पांडेय ने विजय हासिल कर ली। भले ही 1943-44 का यह कार्यकाल कम समय का रहा, लेकिन लोकतंत्र की ताकत का अहसास करा गया।
13 साल तक ठप रही लोकतांत्रिक व्यवस्था
गोंडा नगर पालिका परिषद ने 137 साल की उम्र में जहां चपरासी को चेयरमैन बनते देखा है, वहीं 13 साल का वह दौर भी देखा है, जब लोकतांत्रिक व्यवस्था दम तोड़ती नजर आई। 1975 में हाजी इब्राहिम का कार्यकाल खत्म होने के बाद लोकतंत्र की दुर्गति शुरू हो गई। नगर पालिका परिषद के चेयरमैन का चुनाव ही नहीं हुआ। इस दौरान आईएएस हर्षवर्धन सनवाल, आईएएस मोहर सिंह, आईएएस एबी श्रीवास्तव, आईएएस आरएन सिन्हा, आईएएस एएन सिंह व आईएएस आरएन श्रीवास्तव ने प्रशासक के रूप में 1988 तक अपनी पारी खेली। इस तरह गोंडा को 13 साल तक अपना चेयरमैन नहीं मिला और उधार के अफसर नगर पालिका परिषद का प्रशासक बन विकास की गाड़ी दौड़ाने का दावा करते रहे। हालांकि 1988 के बाद भी कई मौके आए, जब उधार के अफसरों ने प्रशासक बन नगर पालिका परिषद के चेयरमैन का कामकाज निपटाते रहे।
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1880 में अंग्रेजों ने गोंडा शहर में नगर पालिका परिषद का गठन किया, जिसके पहले अध्यक्ष डब्ल्यू ब्वायज बनाए गए। 1912 तक नगर पालिका परिषद में जो भी चेयरमैन हुए, वे सब अंग्रेज थे। 1914 में गोंडा शहर में राय बहादुर वैष्णो प्रसाद को चेयरमैन नियुक्त किया गया, जिन्होंने 1923 तक पारी खेली। इसके बाद अवध बिहारी लाल श्रीवास्तव, बनवारी लाल सक्सेना, राय बहादुर दुर्गाप्रसाद व जगदीश प्रसाद सक्सेना ने 1942 तक कुर्सी संभाली। 1942 में चेयरमैन पद का चुनाव हुआ तो उस समय यह चुनाव आम जनता नहीं करती थी, बल्कि उसके द्वारा विभिन्न वार्डों से चुने गए सभासद चेयरमैन चुनते थे। 1943 का वह दौर ऐसा था जब अंग्रेजी हुकूमत हिंदुस्तान में लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत दिखाकर खुद के तानाशाही दाग को धोने की कोशिश कर रही थी। चुनाव के दौरान नगर पालिका परिषद में चपरासी रहे राजा मोहल्ला निवासी बांके लाल श्रीवास्तव ने चेयरमैन पद के लिए दावेदारी की और फिर सारे सभासदों ने उनके सिर पर चेयरमैन का ताज बांध दिया। 1943 से 1944 के कार्यकाल में बांके लाल श्रीवास्तव ने गोंडा में कई काम कराए। 1944 में जब चुनाव हुआ तो चपरासी रहे चेयरमैन बांकेलाल श्रीवास्तव की कुर्सी पर गोंडा के राजा भइया जगदीश दत्त राम पांडेय ने विजय हासिल कर ली। भले ही 1943-44 का यह कार्यकाल कम समय का रहा, लेकिन लोकतंत्र की ताकत का अहसास करा गया।
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13 साल तक ठप रही लोकतांत्रिक व्यवस्था
गोंडा नगर पालिका परिषद ने 137 साल की उम्र में जहां चपरासी को चेयरमैन बनते देखा है, वहीं 13 साल का वह दौर भी देखा है, जब लोकतांत्रिक व्यवस्था दम तोड़ती नजर आई। 1975 में हाजी इब्राहिम का कार्यकाल खत्म होने के बाद लोकतंत्र की दुर्गति शुरू हो गई। नगर पालिका परिषद के चेयरमैन का चुनाव ही नहीं हुआ। इस दौरान आईएएस हर्षवर्धन सनवाल, आईएएस मोहर सिंह, आईएएस एबी श्रीवास्तव, आईएएस आरएन सिन्हा, आईएएस एएन सिंह व आईएएस आरएन श्रीवास्तव ने प्रशासक के रूप में 1988 तक अपनी पारी खेली। इस तरह गोंडा को 13 साल तक अपना चेयरमैन नहीं मिला और उधार के अफसर नगर पालिका परिषद का प्रशासक बन विकास की गाड़ी दौड़ाने का दावा करते रहे। हालांकि 1988 के बाद भी कई मौके आए, जब उधार के अफसरों ने प्रशासक बन नगर पालिका परिषद के चेयरमैन का कामकाज निपटाते रहे।
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