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भगवान श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व सबसे संघर्षशील

Mon, 23 Apr 2018 12:17 AM IST
Updated Mon, 23 Apr 2018 12:17 AM IST
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भगवान श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व सबसे संघर्षशील
भगवान श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व सबसे संघर्षशील
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सीतापुर। ईश्वर की भक्ति से कहीं अधिक महत्वपूर्ण उनकी कर्म साधना है। क्योंकि कर्म के माध्यम से ही मोक्ष का द्वार खुलता है। आज हमारी सनातन संस्कृति पर तरह-तरह के हमले हो रहे हैं। हमारे आदर्शों को गलत तरीके से निरूपित करके नई पीढ़ी के सामने परोसा जा रहा है।

जिनसे उन आदर्शों के प्रति नकारात्मक छवि बनती है। ऐसे में हम सबका दायित्व है कि हम लोगों को इस बात के लिए तैयार करें कि वे हमारी संस्कृति व महापुरुषों के प्रति फैलाए जा रहे नकारात्मक विचारों का दृढ़ता के साथ उत्तर दे सकें। ये बातें पवन महराज ने रविवार को ‘श्रीकृष्ण के अनछुए पहलू’ विषय पर व्याख्यान देते हुए कहीं।
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नैमिषारण्य के रामजानकी भवन में आयोजित व्याख्यान में पवन महाराज ने कहा कि, श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व सृष्टि का सबसे संघर्षशील और जुझारू प्रवृत्ति का व्यक्तित्व है जो तमाम झंझावात का सामना करने के बावजूद विजय ही प्राप्त करता है।
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हमें श्रीकृष्ण को ईश्वर व भगवान मानने के बजाए ऐसे स्थान पर स्वीकार करना होगा जो निरंतर संघर्ष यात्रा को जारी रखता है। जिन्हें शिशुपाल के अपशब्द भी कर्तव्य मार्ग से विचलित नहीं कर सके। कई धर्म ग्रंथों का हवाला देते हुए पवन महाराज ने श्रीकृष्ण के राधा के प्रेमी होने की बात को सिरे से खारिज किया। उन्होंने कहा कि, जो भी प्रमाणिक ग्रंथ हैं उनमें कहीं भी इस बात का उल्लेख नहीं मिलता।

उन्होंने कहा कि, हमारा मिशन है कि हम समाज को और विशेष रूप से नई पीढ़ी को इसके प्रति आग्रह करें ताकि समाज में श्रेष्ठ मूल्यों व विचारों का संचार हो सके। पवन जी ने कहा कि, ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम किसी पुस्तक में लिखी बात को प्रमाणित मानकर उसे महत्व देना प्रारंभ कर देते हैं। जबकि प्रत्येक ग्रंथ शास्त्र नहीं होता है। जबकि शास्त्र का सृजन मनुष्यों के गहन विचार और उससे निकले निष्कर्ष के पश्चात होता है।

पवन महराज ने नैमिषारण्य का महत्व बताते हुए कहा कि, ये 88 हजार ऋषि-मुनियों की प्रशिक्षण स्थली रही है। सृष्टि में कश्मीर, नैमिषारण्य व दंडकारण तीन ही ऐसे क्षेत्र हैं जहां सर्वाधिक शास्त्रों की रचना हुई।


उन्होंने नैमिष को निमिष शब्द से बताते हुए कहा कि, निमिष का अर्थ एक सेकेंड का भी सूक्ष्म भाग है। यहां पर इतने अंतराल में असुरों का विनाश किया गया। उन्होंने वेद व्यास के नैमिषारण्य से जुड़ाव का उल्लेख करते हुए कहा प्रभु का चिंतन मनन करना अत्यंत पुण्य का कार्य है।
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