आज सारी दुनिया छोटे-छोटे गैजेट्स में सिमट कर जेब में आ गई है। दुनिया का कोई भी कोना सिर्फ एक क्लिक की दूरी पर है। आज हम उन रास्तों पर भी बेखौफ चल पड़ते हैं, जिनका ओर-छोर पता नहीं होता। हम बेफिक्र होते हैं, यह सोच कर कि हमारे पास गूगल मैप है, वो हमें भटकने नहीं देगा।
ट्रैवल गाइड, जिन्होंने बनाया दुनिया का नक्शा
- दुनिया का पहला नक्शा
शुरुआती दौर के नक्शे दुनिया की आधी-अधूरी तस्वीरें पेश करते थे। उस दौर में नक्शा बनाने का केंद्र इटली के शहर हुआ करते थे। इटली और स्पेन के कारोबारी और अन्वेषक पूरे हौसले से दुनिया की खोज को निकलते थे। फिर ये जो जानकारी लेकर लौटते थे, उनके आधार पर नक्शे बनाए जाते थे। पुराने नक्शों में सुधार किया जाता था।
यूरोप में दुनिया का पहला नक्शा 1448 में तैयार किया गया था जो कि खूबसूरत और दिलकश था। इसे वेनिस के मानचित्रकार जियोवान्नी लिआर्दो ने चमड़े पर तैयार किया था। इसका नाम था प्लेनिस्फेरो।.
इस नक्शे की बुनियाद थे यूनानी-रोमन विद्वान टॉलेमी का भूकेंद्रीय मॉडल, बुत परस्तों के निशान, ईसाइयों की श्रद्धा, अरबी भौगोलिक सिद्धांत और वैज्ञानिक फॉर्मूले शामिल थे। इस नक्शे में तमाम प्रायद्वीपों को उन्हीं नामों से रेखांकित किया गया है, जिस नाम से उस दौर में यूरोप के लोग इन्हें जानते थे।
नक्शे में दुनिया के चारों तरफ छह दायरे बने हैं, जिनमें छोटे-छोटे नंबर और अक्षर लिखे हैं। इन नंबरों और दायरों से जमीन के चारों तरफ चांद की चाल, मौसमों और त्यौहारों का चक्र समझाया जाता था।
प्लेनिस्फेरो, लैटिन भाषा का शब्द है। प्लेनस मतलब चपटा और स्फेरस मतलब गोला। मानचित्रकार जियोवान्नी लिआर्दो के दस्तखत वाले सिर्फ तीन ही नक्शे आज मौजूद हैं।
सबसे पुराना नक्शा 1442 का है, जो इटली के मध्यकालीन शहर वेरोना की बिबलियोटेका कम्यूनेला नाम की लाइब्रेरी में सुरक्षित है। लिआर्दो का आखिरी मानचित्र 1452 का है, जो अमरीकन ज्योग्राफिकल सोसाएटी लाइब्रेरी में है।
- नक्शे पर आधारित हजारों किताबें
लेकिन इस नक्शे से पहले 1448 में एक और नक्शा तैयार किया गया था। ये मानचित्र भी इटली के ही एक अन्य शहर वेनिस में बिबलियोटेका सिविका बर्टिलोनिया लाइब्रेरी में सुरक्षित है। बताया जाता है कि बिबलियोटेका सिविका बर्टिलोनिया में नक्शों पर हजारों किताबें और हस्तलिपियां हैं। अगर इन सभी को फैला कर रखा जाए तो करीब 19 किलोमीटर में फैल जाएंगी।
इटली के विसेन्जा शहर में अमीरों की तादाद ज्यादा थी। कहा जाता है कि ये अमीर नक्शे, गाइड और बेशकीमती किताबें लाइब्रेरी को दान कर देते थे।
15वीं और 16वीं सदी में खोजी सफर पर निकलने वालों के लिए ये नक्शे ट्रैवल गाइड की तरह काम करते थे। इन्हीं नक्शों की बुनियाद पर नाविकों ने दुनिया के कई हिस्से खोज निकाले।
15वीं और 16वीं शताब्दी के अंत में जिस समय दुनिया के नए-नए इलाके खोजे जा रहे थे, उसी समय प्रिंटिंग का काम भी शुरू हुआ। जिसने नक्शे छापने के काम में इंकलाब लाने का काम किया।नाविकों, व्यापारियों से जितनी भी जानकारियां मिलती थीं, उन्हें छापकर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जाता था।
छपाई के बाद जियोवान्नी लिआर्दो का प्लेनिस्फेरो पुराना पड़ चुका था। आज हम दुनिया को जितना जानते हैं, वो इन्ही नाविकों और व्यापारियों की जानकारी के बदौलत जानते हैं।
- टॉलेमी का किरदार
टॉलेमी के मुताबिक दुनिया चपटी और 70 डिग्री चौड़ी है। टॉलेमी को ये पता था कि भारत, चीन यूरोप के पूरब में हैं। इसी जानकारी के आधार पर टॉलेमी ने मानचित्र भी बनाया, जिसकी बुनियाद पर 15वीं शताब्दी में खोजकर्ताओं ने अपना सफर शुरू किया।
टॉलेमी के नक्शे की पहली कॉपी लैटिन में 1475 में छपी थी। टॉलेमी को लोग गणितज्ञ, भूगोल का माहिर, और नजूमी (ज्योतिष) के तौर पर जानते हैं, जिसे दूसरी सदी में रोमन साम्राज्य में दुनिया का भूगोल बताने का काम सौंपा गया था।
वर्षों तक टॉलेमी के भूज्ञान को ही सही माना जाता रहा, लेकिन बदकिस्मती से टॉलेमी के नक्शों का खजाना गायब हो गया। लिहाजा, 13वीं सदी में बाइजेंटाइन साम्राज्य में मैक्सिमस प्लेनूडस ने नए सिरे से दुनिया की खोज शुरू की।
चूंकि, 1406 तक टॉलेमी की तमाम जानकारियों को ग्रीक जबान से लैटिन भाषा में हाथ से लिख लिया गया था, लिहाजा इन्हीं जानकारियों की बुनियाद पर नए सिरे से नक्शे बनाए गए।
1475 की टॉलेमी की हस्तलिपियों में नक्शे शामिल नहीं थे, इनमें सिर्फ अनुभव के आधार पर लिखी जानकारियां थी। लेकिन बाद में जो नक्शे बनाए गए, उनमें हाथ से रंग भी भरे गए। जमीन दर्शाने के लिए पीला रंग और समुद्र के लिए नीला रंग इस्तेमाल हुआ।
- लेखक का नाम नहीं होते था किताबों में
1500 से पहले की जितनी भी किताबें या हस्तलिपियां नक्शों पर आधारित हैं, उन सभी में वो पेज नहीं है जिस पर किताब की प्रस्तावना, किताब और लिखने वाले का नाम, तारीख आदि लिखी रहती है।
इसका चलन 1500 के बाद प्रिंटिंग के जमाने में अलदुस मनुटियस ने शुरू किया था। वो पहला ऐसा शख्स था, जिसने इटैलिक्स फोन्ट का इस्तेमाल किया और करीब 130 किताबों को ग्रीक से लैटिन भाषा में छापा।