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ऐसे पहुंचे केदारनाथ जहां कण-कण में विराजते हैं शिव, पंच केदार भी घूम आएं और कर आएं भगवान के दर्शन

Wed, 29 May 2019 07:16 PM IST
ललित फुलारा लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला Published by: ललित फुलारा Updated Wed, 29 May 2019 07:16 PM IST
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How to go kedarnath temple uttarakhand Panch kedar and story of load shiva
केदारनाथ - फोटो : अमर उजाला
उत्तराखंड स्थित केदारनाथ में भगवान शिव कण-कण में विराजते हैं। यह पवित्र धार्मिक स्थल है जहां लाखों-करोड़ों की संख्या में श्रद्धालु भगवान आशुतोष के दर्शन और पूजा-पाठ के लिए पहुंच रहे हैं। केदारनाथ के कपाट इसी महीने खुले हैं और अक्टूबर के बाद बंद हो जाएंगे। दिल्ली से केदारनाथ की दूरी महज  295 किलोमीटर है। अगर आप केदारनाथ की यात्रा पर जा रहे हैं तो हम आपको केदारनाथ से जुड़ी धार्मिक मान्यता, केदारनाथ के साथ ही पंच केदार कौन- से हैं और यहां कैसे पहुंचे इस बारे में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं। ताकि आप यहां पहुंचकर प्रकृति के अनुपम सौंदर्य का लुत्फ उठाने के साथ ही भगवान शिव के विभिन्न विग्रहों की पूजा भी कर सकें। 

 

 

How to go kedarnath temple uttarakhand Panch kedar and story of load shiva
केदारनाथ
देश में भगवान शिव के कई मंदिर हैं। लेकिन केदारनाथ का धार्मिक महत्व सर्वोपरी है। धर्मशास्त्रों में केदारनाथ का बेहद ही महात्म्य बताया गया है। केदारनाथ के दर्शन से सभी तरह की मनोकामना पूर्ण होती है। भगवान शिव की इस स्थली का धार्मिक महत्व महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। यह धार्मिक स्थल हिमालय की गोद में बसा है। केदारनाथ के अलावा यहां चार और केदार हैं जहां भगवान शिव विभिन्न रूपों में विराजमान हैं। आइए पहले पंच केदार के बारे में विस्तार से जानते हैं... 

 
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केदारनाथ - फोटो : अमर उजाला
केदारनाथ को बारहवें ज्योर्तिलिंग के रूप में जाना जाता है। पंच केदार में प्रथम भगवान केदारनाथ हैं। द्वितीय केदार मद्महेश्वर हैं। तृतीय केदार तुंगनाथ हैं। चतुर्थ केदार भगवान रुद्रनाथ और पंचम केदार कल्पेश्वर  हैं। कहा जाता है कि महाभारत का युद्ध खत्म होने के बाद पांडव भ्रातृहत्या के पाप से मुक्ति पाना चाहते थे। वेदव्यास के कहने पर पांडव सगोत्र बंधु-बांधव की हत्या का प्रायश्चित करने के लिए केदारनाथ तप करने आए। लेकिन भगवान शिव पांडवों से नाराज थे और उन्हें दर्शन देना नहीं चाहते थे।
 
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केदारनाथ मंदिर
भगवान शिव ने पांडवों से बचने के लिए बैल का रूप धारण कर लिया। भीम ने भगवान शिव को पहचान लिया। शिव अन्य पशुओं के बीच बैल रूप में मौजूद थे। भीम ने भगवान शिव को अन्य पशुओं के बीच उनके वास्तविक स्वरूप में पहचानने के लिए विशाल रूप धारण कर दो पहाड़ों के बीच पैर फैला लिए। बाकी पशु भीम के पैर के नीचे से निकल गए लेकिन बैल के रूप में मौजूद शिव ने ऐसा नहीं किया। यह देख भगवान शिव बैल रूप में ही धरती में अंतरध्यान होने लगे लेकिन भीम ने उनके आधे हिस्से को पकड़ लिया। इस तरह पांडव भगवान शिव के दर्शन पाकर संगोत्र भाईयों और मित्र-बांधवों की हत्या के पाप से मुक्त हुए। तभी से केदारनाथ में भगवान शिव बैल की पीठ की आकृति के शिला स्वरूप में मौजूद हैं और पूजे जाते हैं।
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ऊखीमठ से केदारपुरी जाती डोली (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
मद्महेश्वर मंदिर
यहां भगवान शिव मध्य भाग में विराजमान हैं। समुद्र तल से 12 हजार से ज्यादा ऊंचाई पर स्थित मद्महेश्वर के कपाल भी शीतकाल के लिए छह महीने तक बंद रहते हैं। यहां की नैसर्गिक सुंदरता आपका मन मोह लेगी। अगर आप केदारनाथ जा रहे हैं तो द्वितीय केदार मद्महेश्वर भी जरूर जाएं।
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