सियासत से परे क्या है पकौड़ों का इतिहास
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बकौल गालिब (माफी के साथ), 'जिक्र उस पकौड़ी का और बयां अपने चायवाले का' तो नामुमकिन है कढ़ाही में खौलता तेल उबल कर बाहर ना आने लगे! जब से चिदंबरम ने भिर्रों के छत्ते को छेड़ा है कि पकौड़ी बेचना भीख मांगने जैसे है, स्वरोजगार नहीं तभी से अपने दिमाग में पकौड़ियां घूम रही हैं।किसी को अचरज नहीं होना चाहिए कि बहुत जल्दी कोई देशप्रेमी इतिहासकार ये दावा कर दे कि इस चटपटे व्यंजन का आविष्कार प्राचीन भारत में ही हुआ और यहीं से यह जापान पहुंचा जहां इसने 'टैंपुरा' का नाजुक नफीस अवतार प्रकट किया।
जिन्होंने 'टैंपुरा' चखा है उन्हें इससे थोड़ी उलझन हो सकती है पर सान्नूं की? वैसे ही स्वदेशी पकौड़ी के महिमामंडन की उतावली में हम यूरोप और अमरीका के 'फ्रिटर्स' को भी दरकिनार कर देंगे।
इस चटपटे व्यंजन का आविष्कार प्राचीन भारत में ही हुआ और यहीं से यह जापान पहुंचा।
वैदिककालीन पुरखे...
फिलहाल इस सब की चिंता हमें नहीं, हम तो भारतीय उपमहाद्वीप में पकौड़ियों की विविधता और उनके अब तक शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के बारे में सोच-सोच कर ही हुलस रहे हैं।यह संभव है कि तल कर मीठे पुए (अपूप) खाने वाले हमारे वैदिककालीन पुरखे नमकीन पकौड़ीनुमा चीज भी खाते थे पर निश्चय ही इसमें वह आलू-मिर्ची नहीं शामिल होते थे जो पुर्तगालियों के साथ यहां पहुंचे।
मिर्च के अभाव में राजस्थानी मिर्ची बड़े कहां से आते? ना ही मिली-जुली पकौड़ियों की तश्तरी सज सकती। बंगाल में बैंगुन भाजा जब बेसन की चादर ओढ़ लेता है बैंगुनी बन जाता है-यानी पकौड़ी!
पश्चिमी तटवर्ती इलाके में पकौड़ी का ही नाम भजिया है।उत्तर प्रदेश और बिहार में नटखट विनोदी छेड़ते हैं ये गुनगुननाते-"आलू-मेथी की भुजिया गरम होती है!' जाहिर है यह गरमी तापमानवाली नहीं जिस्मानी जोश वाली है।
इस चटपटे व्यंजन का आविष्कार प्राचीन भारत में ही हुआ और यहीं से यह जापान पहुंचा।
शरणार्थियों की सौगात
अर्थात् सात्विक चरित्रवान लोगों को इससे परहेज करन चाहिए, होली के दौरान भांग की पकौड़ियां धोखे से दोस्तों को खिला, फिर नशे में उनकी ऊलजलूल हरकतों से दिल्लगी की परंपरा अब कहां रही? हां, याद आती है लड़कपन में छुप कर पढ़ी वह अश्लील कहानियां जिनका शीर्षक 'भांग की पकौड़ी' होता था।बहरहाल बात यहां पेट की भूख मिटाने वाली पकौड़ियों की हो रही है अतः हम भटकें नहीं!
पंजाब के जिंदादिल लोगों ने पकौड़ियों को पकौड़े में बदल दिया, शायद इसलिए कि बेचारी को लिंगभेदी अन्याय का सामना न करना पड़े।'गोभी के पकौड़े', 'पनीर के पकौड़े' ही नहीं 'अंडे और चिकन तथा मछली के पकौड़े' भी उन शरणार्थियों की ही सौगात हैं जो 'पार्टीशन' के बाद देश भर में फैले।
इस चटपटे व्यंजन का आविष्कार प्राचीन भारत में ही हुआ और यहीं से यह जापान पहुंचा।
साठ के दशक में ब्रेड पकौड़ा
जाने कब 1960 वाले दशक में गरीब परवर 'ब्रेड पकौड़ा' सामने आया। किफायती, पेट भरने वाला मसालेदार आलू की पीठी से भरा या कोरा जो चलते फिरते ठंडा या गरम निबटाया जा सकता था।आज अनाज के अभाव से हम दुखी नहीं सो यह पनीर की परत वाले सैंडविच की शक्ल लेने लगा है।कुछ बरस पहले तक अवध तथा पूरबी उत्तर प्रदेश में मूंग की दाल की (बेसन की नहीं) नन्ही-नन्ही मंगौड़ियां मुंह में पानी भर लाती थीं- वह पकौड़ियों की मौसेरी बहिनें ही तो थीं।
जाने कहां खो गई हैं। गोआ में एक बार हमने काजू की पकौड़ियां आजमाई थीं जो अलग सी थीं। ओडिशा में बनती है पियाजी जो मुरमुरे (मूढी) के साथ जुगलबंदी साथ संकट के वक्त साथ देती है भूख मिटाने में।
इस चटपटे व्यंजन का आविष्कार प्राचीन भारत में ही हुआ और यहीं से यह जापान पहुंचा।
'खतरनाक खाद्य पदार्थ'
बंगाल, ओडिशा, झारखंड आदि में कुम्हड़े तथा दूसरे कुछ फूलों को पतले बेसन या चावल के आटे के घोल में डुबाकर जो भाजा बनाए जाते हैं वह पकौड़ी का ही एक रूप हैं।कोलकाता की एक दूकान (लक्खीनारायन साहू) का दावा है कि इसी ठिए पर कभी नेताजी तेलिया भाजा (पकौड़ी) खाने आते थे। आज तक वह उनके जन्मदिन पर सभी ग्राहकों को मु़फ्त पकौड़ी खिलाता है।
पकौड़े तल कर खिलाने वाले उद्यमी सिर्फ खोमचा या रेहड़ी का ही सहारा नहीं लेते।नई दिल्ली में रीगल बिल्डिंग के पीछे मलिक और सरोजनिनी नगर के नुक्कड़ पर खानदानी पकौड़ा शॉप इसके प्रमाण हैं कि ये व्यवसाय बेरोजगार बच्चों का खेल नहीं! जुमला तो कतई नहीं समझा जाना चाहिए!
कभी अचानक घर पहुंचे मेहमान की आवभगत झटपट बेसन घोल कर गरमागरम पकौड़ियों और चाय से की जाती थी।आज वक्त की कमी और नई पीढ़ी की बदलती पसंद तथा सेहत के बारे में चिंता ने पकौड़ियों को 'खतरनाक खाद्य पदार्थ' वाली सूची में डाल दिया है।
इस चटपटे व्यंजन का आविष्कार प्राचीन भारत में ही हुआ और यहीं से यह जापान पहुंचा।
पकौड़ा जिंदाबाद!
चिकनाई में तो जो बुराई बतलाई जाती है, सो है साथ ही जोख़िम है पुराने तेल में जहरीले 'ट्रांसफैट' का! हम अपने पाठकों को बस इतना याद दिलाना चाहते हैं कि वह जो कुछ पश्चिमी नाश्ता चबैना करते हैं केक-बिस्किट-पैटी वाला उसमें जाने कितना अदृश्य ट्रांसफैट या नुकसानदेह स्वाद बढ़ाने वाली चीजें रहती हैं।
पकौड़े कहिए या पकौड़ियां आज कल इनसे मुलाकात इतवार के दिन कढ़ी में ही हो जाती है कभी कभार। यहां भी कम दुख नहीं।घर हो या ढाबा बताशे की तरह हल्की मुंह मे रखते ही घुल जाने वाली हाथ से फेंटी पकौड़ियां बनाने का कौशल बचा नहीं रहा है।भला हो हमारी दोस्त रुशीना घिल्डियाल का जो कभी समोसा तो कभी पकौड़ा दिवस मना कर खान पान के शौकीनों का ध्यान इस विरासत की तरफ दिलाती रहती हैं।
पकौड़ा जिंदाबाद!