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Work Life Balance: कितने घंटे काम करना सेहत के लिए ठीक? बर्नआउट सिंड्रोंम का शिकार हो रहे हैं कर्मचारी

Tue, 11 Mar 2025 01:24 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिलाष श्रीवास्तव Updated Tue, 11 Mar 2025 01:24 PM IST
सार

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की पूर्व मुख्य वैज्ञानिक और स्वास्थ्य मंत्रालय की सलाहकार सौम्या स्वामीनाथन ने कहा है कि अच्छी सेहत के लिए काम के साथ आराम भी जरूरी है। लंबे समय तक काम करने से न सिर्फ कार्यक्षमता पर बुरा असर होता है, ये सेहत को भी प्रभावित करने वाली स्थिति हो सकती है।

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कितने घंटे काम करना चाहिए? - फोटो : freepik.com

विस्तार

वर्क लाइफ बैलेंस लंबे समय से वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय रहा है। विशेषज्ञों के इसपर अलग-अलग मत हैं, हाल ही में  इंफोसिस के सह-संस्थापक नारायण मूर्ति ने हर हफ्ते 70 घंटे काम करने का सुझाव दिया था। इसी तरह एलएंडटी के चेयरमैन एसएन सुब्रह्मण्यन ने कहा  कि कर्मचारियों को रविवार सहित हर हफ्ते 90 घंटे काम चाहिए। पर क्या अच्छी सेहत के लिए ये सही है?

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विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की पूर्व मुख्य वैज्ञानिक और स्वास्थ्य मंत्रालय की सलाहकार सौम्या स्वामीनाथन ने इस संबंध में कहा है कि अच्छी सेहत के लिए काम के साथ-साथ पूरा आराम भी जरूरी है। लंबे समय तक काम करने से न सिर्फ कार्यक्षमता पर बुरा असर होता है बल्कि दीर्घकालिक रूप से ये सेहत को भी प्रभावित करने वाली स्थिति हो सकती है। लोगों को अपने शरीर की आवाज सुननी चाहिए और यह पहचानना चाहिए कि उन्हें कब आराम की जरूरत है? लंबे वक्त तक काम करने से थकान होने के साथ ही कार्यक्षमता और उत्पादकत भी कम हो सकती है।
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स्वास्थ्य विशेषज्ञ ने कहा कि लंबे समय तक काम करते रहने और पर्याप्त आराम न मिलने पर सोचने-समझने की शक्ति और मानसिक सेहत प्रभावित हो सकती है। बड़ी संख्या में कर्मचारी बर्नआउट का शिकार हो रहे हैं।

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सौम्या स्वामीनाथन, पूर्व डब्ल्यूएचओ प्रमुख - फोटो : ANI

डब्ल्यूएचओ की क्या राय है?

स्वामीनाथन कहती हैं, काम करने के साथ-साथ सभी लोगों के लिए अपनी सेहत पर ध्यान देते रहना भी जरूरी है। लंबे वक्त तक बहुत अधिक काम करने से बर्नआउट हो सकता है। बर्न आउट एक सिंड्रोम है जो रोजाना बहुत अधिक काम करने से जुड़े तनाव की वजह से होता है। इससे कार्यक्षमता में कमी और नकारात्मक भावनाएं पैदा हो सकती हैं।

डॉ स्वामीनाथन ने बताया कि जैसा कि कोविड-19 महामारी के दौरान देखा गया था, जरूरत पड़ने पर कुछ वक्त के लिए अधिक घंटे काम करना ठीक है और जरूरी भी, पर दीर्घकालिक रूप में इससे शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार की सेहत को नुकसान पहुंच सकता है। 

महामारी के वक्त कई स्वास्थ्यकर्मी बिना पर्याप्त नींद के और भारी तनाव में लगातार काम कर रहे थे। इस वजह से कुछ लोगों ने पेशा भी छोड़ दिया। कुछ महीनों के लिए यह किया जा सकता है, लेकिन सालों तक ऐसा करना मुश्किल है।

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बर्नआउट और स्ट्रेस की समस्या - फोटो : Adobe stock photos

पहले बर्न आउट सिंड्रोंम को समझिए

बर्नआउट, आपके काम करने के घंटे से जुड़ी स्थिति है जिसके परिणामस्वरूप लगातार थकान, काम पर कम प्रदर्शन और काम से निराशा या अलगाव की भावना होती है। ये मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों को प्रभावित करती है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, अगर नियोक्ता या ऑफिस, कार्यस्थल में कर्मचारियों के बीच तनाव की स्थिति पर ध्यान नहीं देता है तो इससे नौकरी को लेकर असंतुष्टि और कर्मचारियों की अनावश्यक अनुपस्थिति बढ़ने लग जाती है। यह 'अपोजिट प्रेजेंटिज्म' को भी जन्म दे सकता है, जिसमें लोग काम पर तो आते हैं लेकिन उनकी उत्पादक बहुत कम हो जाती है।

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बढ़ती स्ट्रेस की समस्या - फोटो : Freepik.com

कैसे जानें कहीं आप भी तो नहीं हैं बर्नआउट का शिकार?

इंटरनेशनल क्लासिफिकेशन ऑफ डिजीज के 11वें संशोधन (ICD-11) के अनुसार कुछ संकेत हैं जिसपर सभी कर्मचारियों को गंभीरता से और निरंतर ध्यन देते रहना चाहिए। 

  • काम के समय ऊर्जा में कमी या थकावट महसूस होते रहना। 
  • नौकरी को लेकर नकारात्मकता की भावना आना और अक्सर काम पर न जाने की इच्छा होना। 
  • बर्नआउट के शिकार लोग अधिक चिड़चिड़े या ऊबे हुए महसूस कर सकते हैं। 

साल 2022 के अध्ययन में पाया गया कि वेतन में असमानता और ऑफिस की तरफ से मेंटल सपोर्ट न मिलने के कारण इस तरह की दिक्कतें होने का जोखिम अधिक देखा जाता रहा है।

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कितना होना चाहिए वर्किंग ऑवर - फोटो : freepik.com

फिर कितने घंटे काम करना ठीक है?

अमर उजाला से बातचीत में मुंबई स्थित एक अस्पताल में इंटरनल मेडिसिन के डॉक्टर रजत धीर कहते हैं, कितने घंटे काम करना चाहिए इसका कोई फिट फार्मूला नहीं हो सकता है। यह काम के नेचर और कर्मचारी की सहज क्षमता पर निर्भर करता है। हालांकि अधिकतर शोध और विशेषज्ञों की सिफारिश है कि प्रति सप्ताह 42-48 घंटे काम करना अच्छे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए इष्टतम माना जाता है। यानी कि रोजाना में 7-8 घंटे काम करना ठीक है।

काम करने के साथ सभी लोगों को अपनी शारीरिक मानसिक सेहत पर भी ध्यान देते रहना चाहिए। शरीर को अच्छी कार्यक्षमता बनाए रखने के लिए नींद और मानसिक शांति की जरूरत होती है। काम के घंटों से ज्यादा गुणवत्ता मायने रखती है।

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सेहत का रखें ध्यान - फोटो : Freepik.com

लंबे समय तक बैठना सेहत के लिए नुकसानदायक

लंबे समय तक बैठे रहने को सेहत के लिए कई प्रकार से नुकसानदायक माना जाता रहा है। इस तरह की गतिहीन जीवनशैली मधुमेह, हृदय स्वास्थ्य की समस्याएं, वजन बढ़ाने, अवसाद और डिमेंशिया के खतरे को बढ़ाने वाली मानी जाती रही है। 

  • साल 2023 में मार्केट रिसर्च फर्म आईपीएसओएस द्वारा किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि भारत में हर दो में से एक कॉर्पोरेट कर्मचारी में किसी न किसी प्रकार की मानसिक स्वास्थ्य समस्या का जोखिम हो सकता है। पुरुष कर्मचारियों की तुलना में महिला कर्मियों में इसका जोखिम अधिक देखा जा रहा है।
  • प्लसवन जर्नल में प्रकाशित अध्ययन की रिपोर्ट के मुताबिक लंबे समय तक बैठे रहने वाले लोगों में डेमेंशिया का खतरा अधिक हो सकता है। वैज्ञानिकों ने पाया कि 7-8 घंटे तक लगातार बैठे रहने की आदत समय के साथ मस्तिष्क के नई चीजों को संग्रहित करने की क्षमता को कमजोर कर सकती है, इसका याददाश्त पर भी असर हो सकता है। 


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स्रोत और संदर्भ
Sedentary Behavior and Incident Dementia Among Older Adults


अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।

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