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सिजेरियन डिलीवरी है बेहद खतरनाक, दर्द सहने की आदत डालिए वरना मिलेगा जिंदगी भर का ‘दर्द’

Thu, 08 Aug 2019 05:54 PM IST
ishwar ashish रोली खन्ना, अमर उजाला, लखनऊ
रोली खन्ना, अमर उजाला, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Thu, 08 Aug 2019 05:54 PM IST
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Doctors speak on side effects of cesarean delivery.
प्रतीकात्मक तस्वीर

क्या आप मां बनने वाली हैं या फिर बच्चा प्लान कर रही हैं? क्या आपको भी प्रसव पीड़ा से डर लगता है? तो यह खबर आपके लिए है। दर्द सहने की थोड़ी आदत डाल लीजिए, वरना यह डर आप और आपके गर्भ में पल रहे बच्चे दोनों के लिए बेहद घातक साबित हो सकता है।

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केस स्टडी बताती है कि सिजेरियन के प्रति महिलाओं का बढ़ता रुझान उनमें प्लेसेंटा प्रीविया और प्लेसेंटा एक्रीटा की समस्या बढ़ा रहा है। नतीजतन अत्यधिक ब्लीडिंग और हैमरेज मां और गर्भ में पल रहे बच्चे के लिए जानलेवा बनता जा रहा है। प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल और रेफरल सेंटर क्वीन मेरी की इमरजेंसी में रोजाना ऐसी दो से तीन मरीज आ रही हैं।
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वरिष्ठ स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ. एसपी जैसवार बताती हैं कि आज की युवतियां दर्द से बचने के लिए सिजेरियन कराना पसंद करती हैं। आमतौर पर हमारे पास 12 से 15 केस रोजाना रेफर होकर आते हैं। इसमें से इमरजेंसी में ऐसे दो से तीन केस आते हैं, जिनमें प्लेसेंटा एक्रीटा के कारण हद से अधिक ब्लीडिंग हो रही होती है।

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जानें, क्या होता है प्लेसेंटा प्रीविया व क्यों होता है

Doctors speak on side effects of cesarean delivery.
डॉ. एसपी जैसवार - फोटो : amar ujala

प्लेसेंटा प्रीविया : आम तौर पर प्लेसेंटा यानी गर्भनाल बच्चेदानी के ऊपर होती है। प्लेसेंटा प्रीविया की स्थिति में यह नीचे की तरफ होती है।

क्यों होता है : पहले प्रसव के दौरान दिक्कतें और सिजेरियन इसका मुख्य कारण है। सिजेरियन के कारण गर्भनाल बच्चेदानी के नीचे की तरफ हो जाती है। वहीं, 35 से ज्यादा की उम्र में प्रसव और गर्भाशय में रसौली (फाइब्रॉइड) निकलना जैसी दिक्कतें होती हैं।

आसान शब्दों में जानें क्या है समस्या
प्लेसेंटा एक्रीटा : गर्भनाल बच्चेदानी के आसपास या यूरिनरी ब्लैडर (पेशाब की थैली) में घुस जाती है।

बेहद खतरनाक : ऐसी स्थिति जानलेवा हो सकती है। इसमें गर्भनाल रहने पर अत्यधिक रक्तस्राव के साथ बच्चेदानी फट जाने की आशंका बढ़ जाती है।

वजह : डॉ. जैसवार बताती हैं कि सिजेरियन होना इसकी मुख्य वजह है। हमारे पास आने वाली मरीजों की केस स्टडी बताती है कि जिनमें पहला बच्चा सिजेरियन से हुआ, उनमें यह समस्या देखने को मिलती है। इसके पीछे प्रमुख वजह यही है कि स्पेशलिस्ट से सिजेरियन कराने के बजाय ऐसे चिकित्सक से सिजेरियन करा लेना, जिन्हें यह भी पता नहीं होता कि कितने टिश्यूज छोड़ने हैं, कितने नहीं। इसका नतीजा प्लेसेंटा एक्रीटा के रूप में सामने आता है।

अस्पतालों के ये आंकड़े बता रहे सिजेरियन का हाल

Doctors speak on side effects of cesarean delivery.

सीएमएस डॉ. सुधा वर्मा के मुताबिक महीने में करीब 300 प्रसव होते हैं। इसमें 25 से 30 सिजेरियन केस होते हैं। ये कहीं न कहीं से रेफर्ड केस होते हैं, जो काफी हालत बिगड़ने के बाद हमारे पास आते हैं। इसके अलावा हमने साल में दो केस प्लेसेंटा एक्रीटा वाले किए। हालांकि उन्हें बाद में क्वीन मेरी भेजा था मॉनीटरिंग के लिए।

सीएमएस डॉ. नीरा जैन बताती हैं कि एक महीने में दो केस तो प्लेसेंटा एक्रीटा वाले आते ही हैं। ज्यादातर वजह पहला सिजेरियन ही होती है। एक महीने में 600 से 700 डिलीवरी होती है। इसमें से 200-250 सिजेरियन होते हैं। जबकि ऑन डिमांड वाले केस रोज एक-दो तो आते ही हैं, जिनकी हमें कभी डांट कर तो कभी प्यार से काउंसलिंग करनी होती है।

कैसे जानें समस्या के बारे में

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डॉ. सुजाता देव। - फोटो : amar ujala

क्वीन मेरी की गाइनेकोलॉजिस्ट डॉ. सुजाता देव बताती हैं कि कलर डॉप्लर से ही इसका पता चल पाता है। अगर समस्या है तो ऐसे अस्पताल में ही इलाज कराएं जहां ऑपरेशन के दौरान विशेषज्ञ डॉक्टर, यूरोलॉजिस्ट, जांच की सुविधाएं, ब्लड की तुरंत उपलब्धता हो। इसके अलावा नौ महीने तक विशेष देखभाल की जरूरत होती है।

ऐसे बच सकती हैं समस्या से
डॉ. सुजाता बताती हैं कि 12 से 24 घंटे का दर्द गर्भवती सहना नहीं चाहती हैं। मॉनीटरिंग कोई करना नहीं चाहता। थोड़ी सी जल्दबाजी भविष्य के लिए बड़ी मुसीबत बन जाती है। जब तक जरूरी न हो तब तक सिजेरियन कराने की सोचे भी नहीं।

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