इंसान आने वाले दिनों में बुढ़ापा आना रोक देगा? रिसर्च में हुआ खुलासा
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बुढ़ापा है क्या
उन्नीसवीं सदी की शुरुआत तक दुनिया भर में इंसान की औसत उम्र 40 साल थी, लेकिन आज लोग ज़्यादा लंबी और सेहतमंद जिंदगी जीते हैं। उत्तरी यूरोप में तो औसत उम्र 80 साल तक है। बहुत जल्द दुनिया के बाक़ी देशों में भी औसत उम्र इतनी हो जाएगा। इसकी बड़ी वजह है बीमारियों पर काबू। जब तक बीमारियों और दवाओं पर रिसर्च नहीं हुई थी बड़ी संख्या में कम उम्र में ही मौत हो जाती थी। इस तरक्की से साफ है कि इंसान बुढ़ापे को लंबे वक्त के लिए टाल सकता है। मौत का समय आने में देर कर सकता है। सेहत में बेहतरी से ऐसा मुमकिन हो सकता है और इसकी शुरुआत दांतों से हो सकती है।
अंग ट्रांसप्लांट एक रास्ता
बुढ़ापे में ज्यादातर लोगों की मौत शरीर के नाजुक अंगों जैसे दिल, जिगर और गुर्दों के काम बंद करने की वजह से होती है। अगर ये नाजुक अंग हमेशा स्वस्थ रहें या इनके खराब होने पर सेहतमंद अंग ट्रांसप्लांट कर दिए जाएं तो ज्यादा वक्त जिया जा सकता है, लेकिन दुनिया में बुज़ुर्ग इतने ज्यादा हैं कि सभी के लिए ये बंदोबस्त नहीं किया जा सकता। इसके अलावा डोनर और रिसीवर का अंग एक जैसा होना भी शर्त है और ऐसा अक्सर हो नहीं पाता।
भौमिक और उनकी टीम भारत का पहला ह्यूमन लिवर टिशू बना चुकी है और अब उनका अगला कदम पोर्टेबल मिनिएचर लिवर बनाने का है जिसके साथ मरीज कहीं भी घूम फिर सकता है। वहीं, अगले दस साल में ऐसा लिवर तैयार करने की तैयारी है, जिसे शरीर कें अंदर फिट किया जा सकेगा। इस काम में करीब दस साल का वक्त लग सकता है। भौमिक का मानना है कि अगर ये तजुर्बा कामयाब रहा तो इंसान की उम्र 135 साल की हो जाएगी।
कितने काम के माइक्रोबायोम
हमारे शरीर के अंदर और बाहर बहुत तरह के छोटे-छोटे कीटाणु रहते हैं। ये इतने छोटे होते हैं कि हम इन्हें नंगी आंखों से नहीं देख सकते। बैक्टीरिया,फफूंद और भी कई तरह के वायरस इसी फेहरिस्त में आते हैं। साइंस की भाषा में इन्हें माइक्रोबायोम कहा जाता है। ये माइक्रोबायोम बीमारियों का कारण तो हैं ही, साथ ही हमें सेहतमंद रखने के लिए जरूरी भी हैं। हाल में हुई रिसर्च से पता चला है कि माइक्रोबायोम हमारे शरीर के लिए उतने ही जरूरी हैं जितना कि शरीर का कोई अंग। अमरीका के बेलर कॉलेज ऑफ मेडिसिन की प्रोफेसर मेंग वांग रिसर्च के जरिए ये पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि क्या माइक्रोबायोम के जरिए बुढ़ापे के असर को कम किया जा सकता है।
रिसर्च के लिए उन्होंने खास किस्म के कीड़ों को चुना जिनकी खुद की उम्र बहुत छोटी थी। प्रोफेसर वांग ने कीड़ों की आंत में पलने वाले बेक्टीरिया को तोड़कर दूसरी किस्म के कीड़ों में डाल दिया। तीन हफ्ते बाद उन्होंने देखा कि जिन कीड़ों को इतने वक्त में मर जाना चाहिए उनमें से बहुत से कीड़े ना सिर्फ जिंदा थे बल्कि सेहतमंद थे। अब प्रोफेसर मेंग वांग यही तजुर्बा चूहों पर कर रही हैं। अगर ये तजुर्बा कामयाब रहा तो ऐसी गोलियां बना ली जाएंगी जिनके खाने से इंसान की उम्र 100 से 200 साल तक हो सकेगी।
हमारा शरीर छोटी-छोटी कोशिकाओं से मिलकर बनता है। हर एक कोशिका की एक खास उम्र होती है जो समय के साथ बूढ़ी होकर निष्क्रिय हो जाती हैं और शरीर में जमा रहती हैं। ये अन्य स्वस्थ कोशिकाओं को प्रभावित करने लगती हैं। शरीर एक हद तक इनकी मार झेलता है लेकिन एक समय बाद हिम्मत हार जाता है।
इंग्लैंड की एक्सटर यूनिवर्सिटी में मॉलिक्युलर जेनेटिक्स की प्रोफेसर लोरेना हैरिस का कहना है कि बहुत जल्द रिसर्च के जरिए ऐसे रसायन तैयार कर लिए जाएंगे जिनकी मदद से बूढ़ी हो रही कोशिकाओं को फिर से जवान किया जा सकेगा और मौजूदा कोशिकाओं को बूढ़ा होने से रोका जकेगा। इससे ना सिर्फ उम्र में इजाफा होने की उम्मीद है बल्कि बहुत सी बीमारियों से लड़ने में भी मदद मिलेगी।
सवाल अंत में यही है कि इन तजुर्बों के बाद अगर कामयाबी मिल भी जाती है तो और कितने साल हम अपनी उम्र में जोड़ सकते हैं। तुहिन भौमिक की बात पर विश्वास किया जाए तो 135 साल की उम्र तो कम से कम हर इंसान को मिल ही जाएगी, लेकिन जिंदगी का अंत तो मौत ही है। मौत से कोई भी रिसर्च किसी भी जीव को नहीं बचा सकती। जिंदगी छोटी हो या बड़ी वो सेहतमंद, खुशहाल और कामयाब होनी चाहिए।