Jharkhand: उधवा बर्ड सेंचुरी में 10 साल बाद दिखा दुर्लभ पक्षी पैलस गल, 2015 के बाद दर्ज हुई उपस्थिति
उधवा बर्ड सेंचुरी साहिबगंज में लगभग दस साल बाद दुर्लभ प्रवासी पक्षी पैलस गल दोबारा देखा गया। 2015 के बाद इसका यह पहला दर्शन है। वन विभाग ने इसे जैव विविधता के लिए सकारात्मक संकेत बताया है और सेंचुरी में सुरक्षा व निगरानी और कड़ी कर दी गई है।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
झारखंड के साहिबगंज स्थित उधवा बर्ड सेंचुरी में करीब एक दशक बाद दुर्लभ प्रवासी पक्षी पैलस गल (ग्रेट ब्लैक-हेडेड गल) दिखा है। अधिकारियों ने बताया कि यह पक्षी बुधवार शाम को देखा गया।
साहिबगंज के डीएफओ प्रभाल गर्ग ने बताया कि पैलस गल का एक जुवेनाइल बुधवार को बर्ड वॉचर्स ने देखा। उद्वा बर्ड सैंक्चुअरी राज्य का एकमात्र रामसर साइट है और पूर्वी भारत का एकमात्र बर्ड सैंक्चुअरी भी। अधिकारी के अनुसार, यह पक्षी यहां बहुत कम आता है और 2015 में बर्ड सर्वे के दौरान अंतिम बार देखा गया था। लगभग 10 साल बाद इसकी वापसी सैंक्चुअरी की जैव विविधता के लिए सकारात्मक संकेत है।
यह प्रजाति दक्षिणी रूस से मंगोलिया तक की दलदली जमीनों और द्वीपों में कॉलोनियों में प्रजनन करती है। सर्दियों में यह पूर्वी भूमध्यसागर, अरब और भारत में प्रवास करती है। यह जमीन पर घोंसला बनाती है और दो से चार अंडे देती है। अधिकारी ने बताया कि सभी प्रवासी पक्षी वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत संरक्षित हैं और किसी भी तरह की क्षति या बाधा एक संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध है, जिसकी सजा 7 साल तक हो सकती है।
पढ़ें: सीआरपीएफ जवान सुजीत सिंह जम्मू-कश्मीर में शहीद, छह माह पहले हुई थी शादी
एशियन वॉटर बर्ड सेंसेस के राज्य संयोजक सत्य प्रकाश ने कहा कि यह दिखना इस बात का संकेत है कि झील का पर्यावास प्रवासी पक्षियों के लिए सुरक्षित और अनुकूल है। 2015 में यह पटौरा झील में दिखा था, जबकि इस बार बेरहले झील में दिखा दोनों गंगा नदी के किनारे स्थित हैं। उन्होंने बताया कि जनवरी में हुए सर्वे में 18 परिवारों के 60 प्रजाति के आर्द्रभूमि पक्षी दर्ज किए गए। इनमें 33% निवासी, 32% निवासी प्रवासी और 35% शीतकालीन प्रवासी थे। कुल 10,031 पक्षियों की गिनती हुई।
सर्दी में बार-हेडेड गीज़, नॉर्दर्न पिंटेल, कॉमन टील, ग्रेलैग गीज़, गैडवाल, स्पॉट-बिल्ड डक और रेड-क्रेस्टेड पोकर्ड जैसी प्रजातियाँ सबसे आम हैं। वहीं पर्पल हेरॉन, एशियन ओपनबिल, लिटिल ग्रीब और किंगफिशर भी बड़ी संख्या में दिखते हैं। प्रशासन ने बताया कि छात्रों में जागरूकता कार्यक्रमों के साथ-साथ कैमरे लगाए गए हैं और गश्त भी बढ़ाई गई है। इसके लिए थर्मल ड्रोन कैमरे भी इस्तेमाल किए जा रहे हैं ताकि किसी भी अवैध गतिविधि पर नज़र रखी जा सके।