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झारखंड: चोट के निशान नहीं तो भी गवाही पर शक नहीं, झारखंड हाईकोर्ट ने तीन दोषियों की सजा रखी बरकरार
Thu, 08 Oct 2026 02:58 PM IST
तरुणेंद्र कुमार चतुर्वेदी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची
Published by: तरुणेंद्र कुमार चतुर्वेदी
Updated Thu, 08 Oct 2026 02:58 PM IST
सार
झारखंड हाईकोर्ट ने नाबालिग सामूहिक दुष्कर्म मामले में अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि पीड़िता के शरीर पर चोट या संघर्ष के निशान न होना उसकी गवाही को खारिज करने का आधार नहीं हो सकता। अदालत ने तीन दोषियों की 20 साल की सजा बरकरार रखी।
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झारखंड उच्च न्यायालय
- फोटो : ANI
विस्तार
झारखंड उच्च न्यायालय ने एक महत्त्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता के शरीर पर संघर्ष या चोट के निशान न होना उसकी गवाही पर अविश्वास करने का आधार नहीं हो सकता। अदालत ने कहा कि यदि चिकित्सीय साक्ष्य घटना की पुष्टि करते हैं, तो केवल चोट के निशान न होने के तर्क पर आरोपी को राहत नहीं दी जा सकती। न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति आनंद सेन और न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की पीठ ने सिमडेगा की विशेष पोक्सो अदालत द्वारा तीन दोषियों को सुनाई गई 20 साल की कठोर कैद और 50,000 रुपये जुर्माने की सजा को बरकरार रखा है।
सामूहिक दुष्कर्म की घटना
यह मामला सिमडेगा जिले के जलडेगा थाना क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। घटना के समय पीड़िता की उम्र लगभग 16 वर्ष थी। वह पारिवारिक कार्यक्रम में शामिल होने गई थी, जहां रात करीब 10:00 बजे ट्यूबवेल के पास तीन लोगों ने उसे दबोच लिया। एक आरोपी ने पीड़िता के साथ दुष्कर्म किया, जबकि दो अन्य आरोपियों ने उसके हाथ-पैर मजबूती से जकड़ रखे थे। इसके बाद आरोपी उसे जबरन ढोलीपहाड़ी की तरफ ले गए और वहां फिर से सामूहिक दुष्कर्म किया। घटना के बाद पीड़िता ने अपनी मां को पूरी आपबीती बताई, जिसके बाद पुलिस में प्राथमिकी दर्ज कराई गई।
बचाव पक्ष की दलीलें खारिज
निचली अदालत से सजा मिलने के बाद दोषियों ने उच्च न्यायालय में अपील दायर कर फैसले को चुनौती दी थी। अपीलकर्ताओं ने तर्क दिया था कि पूरा मामला केवल पीड़िता के बयान पर आधारित है और चिकित्सीय जांच में शरीर पर संघर्ष या चोट का कोई निशान नहीं मिला है। आरोपियों ने पीड़िता के परिवार से पुरानी रंजिश का दावा करते हुए खुद को झूठे मामले में फंसाने का आरोप लगाया था। उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने सबूतों और गवाहों का पुनर्मूल्यांकन करते हुए बचाव पक्ष की इन सभी दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया।
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उच्च न्यायालय की सख्त टिप्पणी
उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि तीन पुरुषों द्वारा 16 वर्षीय नाबालिग पर काबू पाने की स्थिति को ध्यान में रखना आवश्यक है। ऐसी स्थिति में पीड़िता के शरीर पर चोट के निशान न मिलने मात्र से उसके बयान पर अविश्वास नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि पीड़िता की मां के बयान और चिकित्सीय रिपोर्ट से घटना की पूरी पुष्टि होती है। चिकित्सीय रिपोर्ट तत्काल हुए यौन हमले को सिद्ध करती है। उच्च न्यायालय ने पाया कि अभियोजन पक्ष ने बिना किसी संदेह के आरोप साबित किए हैं, जिसके बाद दोषियों की अपील खारिज कर सजा बरकरार रखी गई।
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सामूहिक दुष्कर्म की घटना
यह मामला सिमडेगा जिले के जलडेगा थाना क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। घटना के समय पीड़िता की उम्र लगभग 16 वर्ष थी। वह पारिवारिक कार्यक्रम में शामिल होने गई थी, जहां रात करीब 10:00 बजे ट्यूबवेल के पास तीन लोगों ने उसे दबोच लिया। एक आरोपी ने पीड़िता के साथ दुष्कर्म किया, जबकि दो अन्य आरोपियों ने उसके हाथ-पैर मजबूती से जकड़ रखे थे। इसके बाद आरोपी उसे जबरन ढोलीपहाड़ी की तरफ ले गए और वहां फिर से सामूहिक दुष्कर्म किया। घटना के बाद पीड़िता ने अपनी मां को पूरी आपबीती बताई, जिसके बाद पुलिस में प्राथमिकी दर्ज कराई गई।
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बचाव पक्ष की दलीलें खारिज
निचली अदालत से सजा मिलने के बाद दोषियों ने उच्च न्यायालय में अपील दायर कर फैसले को चुनौती दी थी। अपीलकर्ताओं ने तर्क दिया था कि पूरा मामला केवल पीड़िता के बयान पर आधारित है और चिकित्सीय जांच में शरीर पर संघर्ष या चोट का कोई निशान नहीं मिला है। आरोपियों ने पीड़िता के परिवार से पुरानी रंजिश का दावा करते हुए खुद को झूठे मामले में फंसाने का आरोप लगाया था। उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने सबूतों और गवाहों का पुनर्मूल्यांकन करते हुए बचाव पक्ष की इन सभी दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया।
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उच्च न्यायालय की सख्त टिप्पणी
उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि तीन पुरुषों द्वारा 16 वर्षीय नाबालिग पर काबू पाने की स्थिति को ध्यान में रखना आवश्यक है। ऐसी स्थिति में पीड़िता के शरीर पर चोट के निशान न मिलने मात्र से उसके बयान पर अविश्वास नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि पीड़िता की मां के बयान और चिकित्सीय रिपोर्ट से घटना की पूरी पुष्टि होती है। चिकित्सीय रिपोर्ट तत्काल हुए यौन हमले को सिद्ध करती है। उच्च न्यायालय ने पाया कि अभियोजन पक्ष ने बिना किसी संदेह के आरोप साबित किए हैं, जिसके बाद दोषियों की अपील खारिज कर सजा बरकरार रखी गई।