अंकल! गोलों से नहीं, सन्नाटे से डर लगता है
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‘अंकल, मुझे गोली-गोलों से नहीं, उनके कारण होने वाले सन्नाटे से डर लगता है।’ यह कहना है भारत-पाक सीमा पर बसे गांव अब्दुलियां के करण का, जहां रात भर पाकिस्तान ने गोलाबारी की।
छठवीं कक्षा के छात्र दस साल के कारण का कहना है वह और उसके सारे दोस्त जन्म से ही गोलियां बरसते देख रहे हैं। हम तो इनके आदी हो गए हैं। उससे और उसके साथ खड़े बच्चों से पूछा कि ये गोलाबारी होती क्यों है, तो ज्यादातर बच्चे बोले- यही तो समझ में नहीं आता है।
करण बोला ‘घरवाले कहते हैं, पाक की मति मारी गई है।’ एक दूसरे सीमांत गांव कोरटाला खुर्द में पाकिस्तान से आई गोली को खिलौने की तरह दिखाते 11 साल के मनप्रीत का भी कहना था कि रात को गोलियां बरसती है तो सुबह ढेर सारे अफसर, नेता और मीडिया वाले गांव में आते हैं, मजमा लगता है और फिर सब कुछ पहले सा हो जाता है।
क्रिकेट नहीं खेलते, कब खुले में आ जाए गोली
आशंका और डर, इन दोनों शब्दों के फर्क को सीमा पर बसे गांवों में महसूसा जा सकता है। यहां लोग आशंकित तो रहते हैं कि पता नहीं कब पाक की ओर से आई कोई नापाक गोली नुकसान कर दे, लेकिन उनमें डर रंचमात्र भी नहीं दिखा।
बच्चों को धमाकों से दहशत भले ही न होती हो, पर अपने सवालों का जवाब न मिलने से बच्चे हैरान-परेशान जरूर रहते हैं। पाक गोलाबारी ने सीमांत खेतों को ही नहीं, बचपन को भी मुरझा दिया है।
करण से पूछे कुछ सवालों का जवाब देखिए- ‘स्कूल का काम कर लेने के बाद क्या करते हो? छुपन-छुपाई खेलते हैं।’ ‘टीवी नहीं देखते? बिजली ही नहीं होती’ ‘क्रिकेट नहीं खेलते? नहीं, खुले में पता नहीं कब कोई गोली जख्मी कर दे।’
‘पतंग उड़ाते हो? छत पर जाना मना है।’ ऐसे माहौल में सयाना हो रहा है सीमांत गांवों का बचपन। मां-बाप कुछ कर पाने में असमर्थ हैं और सियासत को इसकी कोई फिक्र फिलहाल तो नहीं ही लगती।