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Jammu News: हाईकोर्ट ने सोपोर आतंकी मामले में दोषी की जमानत याचिका की खारिज
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- बीमार मां की देखभाल के लिए मानवीय आधार पर दो महीने की अंतरिम जमानत मांगी थी
- अदालतस से ... का लोगो लगाएं
संवाद न्यूज एजेंसी
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने सोपोर के एक निवासी फेरोज अहमद डार की याचिका को खारिज कर दिया। उसने बीमार मां की देखभाल के लिए मानवीय आधार पर दो महीने की अंतरिम जमानत मांगी थी। डार को 2013 के एक हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है।
जस्टिस सिंधु शर्मा और जस्टिस शहजाद अजीम की खंडपीठ ने एनआईए विशेष अदालत के दिसंबर 2024 के आदेश को बरकरार रखा, जिसमें डार की जमानत याचिका को खारिज कर दिया गया था। 32 वर्षीय फेरोज अहमद डार, जो सोपोर के दोआबगाह का निवासी है, ने अपनी मां की बीमारी का हवाला देते हुए जमानत की मांग की थी।
अभियोजन पक्ष के रिकॉर्ड के अनुसार डार और कई अन्य कैदियों ने अप्रैल 2019 में जेल के अंदर राष्ट्र-विरोधी नारे लगाए। बैरक में आग लगाई और एलपीजी सिलेंडरों का उपयोग कर विस्फोट करने की कोशिश की। उन पर जेल कर्मचारियों पर पथराव करने और जेल की दीवार को नुकसान पहुंचाने की साजिश रचने का भी आरोप है, ताकि वे भाग सकें। जांचकर्ताओं का दावा है कि आरोपियों ने उच्च-सुरक्षा जेल में एक आतंकी गिरोह बनाया था और जेल कर्मचारियों और सुरक्षा बलों पर सुनियोजित हमले की योजना बनाई थी।
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हाईकोर्ट ने कहा कि डार की याचिका में कोई ठोस आधार नहीं है क्योंकि उनकी मां केवल उन पर निर्भर नहीं हैं। उनके पिता, भाई और बहनें उनकी देखभाल के लिए उपलब्ध हैं। खंडपीठ ने यह भी कहा कि गैरकानूनी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम (यूएपीए) की धारा 43-डी(5) के तहत जमानत तब तक नहीं दी जा सकती, जब तक कि कोर्ट को यह न लगे कि कोई प्रथम दृष्टया मामला नहीं है। कोर्ट ने कहा कि यह अपील पूरी तरह से आधारहीन है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि डार ने अपनी मूल याचिका में केवल अपनी मां की बीमारी का उल्लेख किया था और अपील में नए आधार नहीं जोड़े जा सकते।
कोर्ट ने जोर दिया कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता एक मौलिक अधिकार है लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता से समझौता नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के गुरविंदर सिंह बनाम पंजाब राज्य (2024) के फैसले का भी हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि गंभीर यूएपीए मामलों में केवल मुकदमे में देरी जमानत का आधार नहीं हो सकती।
नतीजतन हाईकोर्ट ने डार की अपील खारिज कर दी और ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा। हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस फैसले में की गई टिप्पणियां मुकदमे की मेरिट या भविष्य में किसी जमानत याचिका पर प्रभाव नहीं डालेंगी।
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- अदालतस से ... का लोगो लगाएं
संवाद न्यूज एजेंसी
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने सोपोर के एक निवासी फेरोज अहमद डार की याचिका को खारिज कर दिया। उसने बीमार मां की देखभाल के लिए मानवीय आधार पर दो महीने की अंतरिम जमानत मांगी थी। डार को 2013 के एक हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है।
जस्टिस सिंधु शर्मा और जस्टिस शहजाद अजीम की खंडपीठ ने एनआईए विशेष अदालत के दिसंबर 2024 के आदेश को बरकरार रखा, जिसमें डार की जमानत याचिका को खारिज कर दिया गया था। 32 वर्षीय फेरोज अहमद डार, जो सोपोर के दोआबगाह का निवासी है, ने अपनी मां की बीमारी का हवाला देते हुए जमानत की मांग की थी।
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अभियोजन पक्ष के रिकॉर्ड के अनुसार डार और कई अन्य कैदियों ने अप्रैल 2019 में जेल के अंदर राष्ट्र-विरोधी नारे लगाए। बैरक में आग लगाई और एलपीजी सिलेंडरों का उपयोग कर विस्फोट करने की कोशिश की। उन पर जेल कर्मचारियों पर पथराव करने और जेल की दीवार को नुकसान पहुंचाने की साजिश रचने का भी आरोप है, ताकि वे भाग सकें। जांचकर्ताओं का दावा है कि आरोपियों ने उच्च-सुरक्षा जेल में एक आतंकी गिरोह बनाया था और जेल कर्मचारियों और सुरक्षा बलों पर सुनियोजित हमले की योजना बनाई थी।
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हाईकोर्ट ने कहा कि डार की याचिका में कोई ठोस आधार नहीं है क्योंकि उनकी मां केवल उन पर निर्भर नहीं हैं। उनके पिता, भाई और बहनें उनकी देखभाल के लिए उपलब्ध हैं। खंडपीठ ने यह भी कहा कि गैरकानूनी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम (यूएपीए) की धारा 43-डी(5) के तहत जमानत तब तक नहीं दी जा सकती, जब तक कि कोर्ट को यह न लगे कि कोई प्रथम दृष्टया मामला नहीं है। कोर्ट ने कहा कि यह अपील पूरी तरह से आधारहीन है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि डार ने अपनी मूल याचिका में केवल अपनी मां की बीमारी का उल्लेख किया था और अपील में नए आधार नहीं जोड़े जा सकते।
कोर्ट ने जोर दिया कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता एक मौलिक अधिकार है लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता से समझौता नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के गुरविंदर सिंह बनाम पंजाब राज्य (2024) के फैसले का भी हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि गंभीर यूएपीए मामलों में केवल मुकदमे में देरी जमानत का आधार नहीं हो सकती।
नतीजतन हाईकोर्ट ने डार की अपील खारिज कर दी और ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा। हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस फैसले में की गई टिप्पणियां मुकदमे की मेरिट या भविष्य में किसी जमानत याचिका पर प्रभाव नहीं डालेंगी।