श्रीनगर में जीत फारूक के डूबते कॅरियर को सहारा, पर उपद्रवी हुए मजबूत
श्रीनगर उपचुनाव के नतीजे से पूर्व मुख्यमंत्री डा. फारूक अब्दुल्ला के डूबते सियासी कॅरियर को सहारा जरूर मिल गया है, लेकिन चुनाव के दौरान उपद्रवियों के उत्पात का संदेश खतरनाक है। वोटों की गिनती में फारूक की जीत बेशक हुई है, लेकिन नतीजे ने बताया है कि यह न तो नेशनल कांफ्रेंस की जीत है और न ही पीडीपी की हार।
परिणाम सही अर्थों में अलगाववादियों और उपद्रवियों की मजबूत पकड़ को दर्शाता है। पत्थरबाजों और पाकिस्तान के प्रति नरमी दिखाकर फारूक ने जो समर्थन हासिल किया है, वह उनके लिए भी भस्मासुर साबित हो सकता है।
श्रीनगर उपचुनाव में महज सात फीसदी वोट पड़े। जाहिर है 93 प्रतिशत लोगों ने खुद को चुनाव से दूर रखा। यह आंकड़ा अलगाववादियों के हौसले बुलंद कर रहा है। पिछले चुनावों में अलगाववादियों के वोट बहिष्कार की अपीलें बेअसर होती रहीं थीं।
फारूक के प्रति अलगाववादियों का रुख पहले से अनुकूल नहीं
कश्मीर की अवाम को यह महसूस होने लगा था कि मतदान ही वह रास्ता है जो उनके सुनहरे भविष्य पथ से जुड़ता है। यही कारण है कि 2014 के लोकसभा चुनाव और बाद में हुए विधानसभा चुनाव में कश्मीर के मतदान केंद्रों पर वोटरों का हुजूम पहुंचा था, लेकिन यह जज्बा कायम नहीं रह सका।
आतंकी बुरहान वानी की मुठभेड़ में मौत के बाद कश्मीर में छह महीने तक चले हिंसा के दौर के क्रम में यह साफ हो गया था कि कश्मीर के हालात एक बार फिर 1990 के दशक के हालात से सुर मिला रहे हैं। बाढ़ के बाद पीड़ितों के पुनर्वास और बेरोजगारों को रोजगार की उम्मीदों पर निराशा भी हिंसक विरोध का एक अहम कारण रहा।
तीन बार जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री रहे फारूक अब्दुल्ला जानते हैं कि पत्थरबाजी की जिस हिंसक संस्कृति को उन्होंने सहलाया है, वही संस्कृति मौका मिलते ही उन्हें भी आंखें दिखा सकती है। फारूक के प्रति अलगाववादियों का रुख पहले से अनुकूल नहीं रहा है। विपक्ष में रहते हुए पीडीपी ने भी इन पत्थरबाजों का समर्थन हासिल किया, लेकिन वह टिक नहीं पाया।
नहीं मनाया जीत का जश्न
मौके की नजाकत के मद्देनजर फारूक ने जीत का जश्न नहीं मनाया। श्रीनगर के नेकां मुख्यालय में चुनाव परिणाम के रुझान के बाद कुछ लोगों ने डांस शुरू किया था, जिसे बंद करा दिया गया। नतीजे के बाद मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की चुनौतियां बढ़ीं हैं और अब उन पर सियासी हमले और तेज हो सकते हैं। इस उपचुनाव में भाजपा की भूमिका महज दर्शक की ही थी, लेकिन वोट बहिष्कार की सफलता और कम मतदान में फारूक की जीत भाजपा की सियासत पर भी असर डालेगी।