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अच्छे-बुरे का भेद बताने वाली बुद्धि सात्विक: हृदयानंद गिरि
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संवाद न्यूज एजेंसी
अखनूर। चिनाब दरिया के किनारे जिया पोता घाट पर नवरात्र के अवसर पर आयोजित श्रीमद् देवी भागवत कथा में मंगलवार को कथावाचक हृदयानंद गिरि ने प्रवचन किए। कहा कि मनुष्य सदैव किसी कार्य के प्रति या फल के प्रति इसलिए अत्यधिक आसक्त रहता है, क्योंकि वह भौतिक पदार्थों, घर-द्वार, पत्नी-पुत्र के प्रति अत्यधिक अनुरक्त होता है। ऐसा व्यक्ति जीवन में ऊपर उठने की आकांक्षा नहीं रखता। वह इस संसार को यथासंभव आरामदेय बनाने में ही व्यस्त रहता है। सामान्यत: वह अत्यंत लोभी होता है।
उन्होंने कहा कि ऐसा व्यक्ति अन्य से ईर्ष्या करता है और इंद्रीय तृप्ति के लिए कोई भी अनुचित कार्य कर सकता है। ऐसा व्यक्ति अपवित्र होता है और वह इसकी चिंता नहीं करता कि उसकी कमाई शुद्ध है या अशुद्ध। यदि उसका कार्य सफल हो जाता है तो वह अत्यधिक प्रसन्न और असफल होने पर अत्यधिक दुखी होता है। रजोगुणी कर्ता ऐसा ही होता है। उन्होंने कहा शास्त्रों के अनुसार कर्म करने को या उन कर्मों को करना, जिन्हें किया जाना चाहिए, प्रवृत्ति कहते हैं। जिन कार्यों का इस तरह निर्देश नहीं होता वे नहीं किए जाने चाहिए। जो व्यक्ति शास्त्रों के निर्देशों को नहीं जानता, वह कर्मों तथा उनकी प्रतिक्रिया से बंध जाता है। जो बुद्धि अच्छे-बुरे का भेद बताती है, वह सात्विक है।
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अखनूर। चिनाब दरिया के किनारे जिया पोता घाट पर नवरात्र के अवसर पर आयोजित श्रीमद् देवी भागवत कथा में मंगलवार को कथावाचक हृदयानंद गिरि ने प्रवचन किए। कहा कि मनुष्य सदैव किसी कार्य के प्रति या फल के प्रति इसलिए अत्यधिक आसक्त रहता है, क्योंकि वह भौतिक पदार्थों, घर-द्वार, पत्नी-पुत्र के प्रति अत्यधिक अनुरक्त होता है। ऐसा व्यक्ति जीवन में ऊपर उठने की आकांक्षा नहीं रखता। वह इस संसार को यथासंभव आरामदेय बनाने में ही व्यस्त रहता है। सामान्यत: वह अत्यंत लोभी होता है।
उन्होंने कहा कि ऐसा व्यक्ति अन्य से ईर्ष्या करता है और इंद्रीय तृप्ति के लिए कोई भी अनुचित कार्य कर सकता है। ऐसा व्यक्ति अपवित्र होता है और वह इसकी चिंता नहीं करता कि उसकी कमाई शुद्ध है या अशुद्ध। यदि उसका कार्य सफल हो जाता है तो वह अत्यधिक प्रसन्न और असफल होने पर अत्यधिक दुखी होता है। रजोगुणी कर्ता ऐसा ही होता है। उन्होंने कहा शास्त्रों के अनुसार कर्म करने को या उन कर्मों को करना, जिन्हें किया जाना चाहिए, प्रवृत्ति कहते हैं। जिन कार्यों का इस तरह निर्देश नहीं होता वे नहीं किए जाने चाहिए। जो व्यक्ति शास्त्रों के निर्देशों को नहीं जानता, वह कर्मों तथा उनकी प्रतिक्रिया से बंध जाता है। जो बुद्धि अच्छे-बुरे का भेद बताती है, वह सात्विक है।
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