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भक्ति के बदले लाभ चाहने वाले भक्त भी भगवान को प्रिय: सुरेश शास्त्री
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गांव चन्नी टरगवाल में 21 कुंडीय महायज्ञ सप्ताह जारी
संवाद न्यूज एजेंसी
अखनूर। गांव चन्नी टरगवाल में 21 कुंडीय महायज्ञ सप्ताह में वीरवार को कथावाचक सुरेश शास्त्री ने कहा कि ऐसा नहीं है कि जो कम ज्ञानी भक्त हैं, वे भगवान को प्रिय नहीं। जो भक्त भक्ति के बदले कुछ लाभ चाहते हैं उन्हें भी भगवान स्वीकार करते हैं। क्योंकि, इससे स्नेह का विनिमय होता है। वे स्नेहवश भगवान से लाभ की याचना करते हैं। और जब उन्हें वह प्राप्त हो जाता है तो वे इतने प्रसन्न होते हैं कि भगवद्भक्ति करने लगते हैं।
कहा कि ज्ञानी भक्त भगवान को इसलिए प्रिय हैं क्योंकि उनका उद्देश्य प्रेम तथा भक्ति से परमेश्वर की सेवा करना होता है। ऐसा भक्त भगवान की सेवा किए बिना क्षण भर भी नहीं रह सकता। इसी प्रकार परमेश्वर अपने भक्त को बहुत चाहते हैं और वे उससे विलग नहीं हो पाते। उन्होंने कहा कि जो समस्त भौतिक कल्मष से मुक्त हो चुके हैं, वे भगवान की शरण ग्रहण करते हैं, और उनकी भक्ति में तत्पर होते हैं। जब तक भौतिक कल्मष धुल नहीं जाता, तब तक वे स्वभावत: अभक्त रहते हैं। किंतु जो भौतिक इच्छाओं के होते हुए भी भगवान की ओर उन्मुख होते हैं, वे बहिरंगा प्रकृति द्वारा आकृष्ट नहीं होते। चूंकि, वे सही उद्देश्य की ओर अग्रसर होते हैं। अत: वे शीघ्र ही सारी भौतिक कामेच्छाओं से मुक्त हो जाते हैं। श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि मनुष्य को चाहिए कि स्वयं को वासुदेव के प्रति समर्पित करे और उनकी पूजा करे। चाहे वह भौतिक इच्छाओं से रहित हो या भौतिक इच्छाओं से पूरित हो या भौतिक कल्मष से मुक्ति चाहता हो।
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संवाद न्यूज एजेंसी
अखनूर। गांव चन्नी टरगवाल में 21 कुंडीय महायज्ञ सप्ताह में वीरवार को कथावाचक सुरेश शास्त्री ने कहा कि ऐसा नहीं है कि जो कम ज्ञानी भक्त हैं, वे भगवान को प्रिय नहीं। जो भक्त भक्ति के बदले कुछ लाभ चाहते हैं उन्हें भी भगवान स्वीकार करते हैं। क्योंकि, इससे स्नेह का विनिमय होता है। वे स्नेहवश भगवान से लाभ की याचना करते हैं। और जब उन्हें वह प्राप्त हो जाता है तो वे इतने प्रसन्न होते हैं कि भगवद्भक्ति करने लगते हैं।
कहा कि ज्ञानी भक्त भगवान को इसलिए प्रिय हैं क्योंकि उनका उद्देश्य प्रेम तथा भक्ति से परमेश्वर की सेवा करना होता है। ऐसा भक्त भगवान की सेवा किए बिना क्षण भर भी नहीं रह सकता। इसी प्रकार परमेश्वर अपने भक्त को बहुत चाहते हैं और वे उससे विलग नहीं हो पाते। उन्होंने कहा कि जो समस्त भौतिक कल्मष से मुक्त हो चुके हैं, वे भगवान की शरण ग्रहण करते हैं, और उनकी भक्ति में तत्पर होते हैं। जब तक भौतिक कल्मष धुल नहीं जाता, तब तक वे स्वभावत: अभक्त रहते हैं। किंतु जो भौतिक इच्छाओं के होते हुए भी भगवान की ओर उन्मुख होते हैं, वे बहिरंगा प्रकृति द्वारा आकृष्ट नहीं होते। चूंकि, वे सही उद्देश्य की ओर अग्रसर होते हैं। अत: वे शीघ्र ही सारी भौतिक कामेच्छाओं से मुक्त हो जाते हैं। श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि मनुष्य को चाहिए कि स्वयं को वासुदेव के प्रति समर्पित करे और उनकी पूजा करे। चाहे वह भौतिक इच्छाओं से रहित हो या भौतिक इच्छाओं से पूरित हो या भौतिक कल्मष से मुक्ति चाहता हो।
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