द रियल कश्मीर फाइल्स: जहां पैदा हुए.. जिंदगी गुजारी, घर छोड़ने का हुक्म सुनाया तो हैरान रह गए पिता
कश्मीर पंडित आशीष कौल बताते हैं कि द कश्मीर फाइल्स फिल्म में कुछ चुनिंदा किरदारों की चर्चा है। हालात इससे भी बदतर थे। तब कश्मीरियत और सूफिज्म की बात करने वाले कश्मीर से गायब हो चुके थे।
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जब मेरी उम्र 16-17 साल की थी तब घाटी के हालात काफी बिगड़ चुके थे। वहां पढ़ाई के साथ-साथ नौकरियों में भी बड़े पैमाने पर पक्षपात शुरू हो गया था। हर मस्जिद से रात भर नारे लगते थे ‘रालीव गालिव या चलिव ’। वर्ष 1989 में मैंने स्थानीय अखबार में कश्मीरी पंडितों के साथ हो रहे जुल्म के बारे में लेख लिखा। इसके बाद बची-खुची परिस्थितियां और खराब हो गईं। मेरे पिता अनंतनाग जिले में बिजली विभाग में नौकरी करते थे। उन्हें कुछ नामचीन वकीलों ने कोर्ट में तलब किया। कहा कि आपका यहां रहना अब मुश्किल है। बेटे और परिवार को लेकर यहां से निकल जाएं। पिता अवाक थे। जहां पैदा हुए, जिंदगी गुजार दी वहां से जाने के लिए कहा जा रहा था। यह दर्द है कश्मीरी पंडित आशीष कौल का।
फिल्म द कश्मीर फाइल्स के रिलीज होने के बाद कश्मीरी पंडितों के पलायन का मुद्दा जोर-शोर से छाया हुआ है।
मीडिया और इंटरटेनमेंट इंडस्ट्री से जुड़े और वर्तमान में मुंबई में रहने वाले आशीष ने बताया कि घाटी छोड़ने की धमकी मिलने के दौरान माता जी का स्वास्थ्य खराब था। अक्तूबर 1989 की रात पिता ने बमुश्किल सेना से संपर्क किया। किसी तरह एक एंबुलेंस की व्यवस्था हुई। दो छोटे बैग में जो कुछ आ सकता था वह साथ लेकर वहां से निकल आए।
कश्मीरियत की बात करने वाले कश्मीर से गायब हो गए थे
आशीष बताते हैं कि फिल्म में कुछ चुनिंदा किरदारों की चर्चा है। हालात इससे भी बदतर थे। मुझे आज भी याद है हर तरफ जिहादियों का नंगा नाच हो रहा था। इंसानियत शर्मसार हो रही थी। तब कश्मीरियत और सूफिज्म की बात करने वाले कश्मीर से गायब हो चुके थे।
वर्षों के रिश्ते कुछ ही दिनों में हो गए खत्म
मस्जिदों से कहा जाता था हमें चाहिए कश्मीर हिन्दू मर्दो के बगैर और हिन्दू स्त्रियों के साथ। वर्षों के रिश्ते और दोस्त जिन की आंखों में मोहब्बत हुआ करती थी वह सब खत्म हो चुका था। रातभर सफर कर हम जम्मू पहुंचे तब अहसास हुआ कि अब हम सुरक्षित हैं। लेकिन हम अपने ही देश में शरणार्थी हो चुके थे। रिफ्यूजी कैंप का फटा हुआ टेंट हमारी तकदीर बन चुका था।
दो दिन तक एक घर में पड़ी रहीं 9 लाशें, कोई झांकने नहीं आया
आशीष बताते हैं कि उनकी मौसी उषा कौल श्रीनगर की एचएमटी घड़ी फैक्ट्री में सुपरवाइजर थीं। हमारे मौसा राजेंद्र कृष्ण कौल एक निजी होटल के लेखा विभाग के प्रमुख थे। यह सभी संयुक्त परिवार के रूप में सफाकदल स्थित अपने पुश्तैनी घर में रहते थे। उनका मानना था कि वह अपने पड़ोसियों के बीच सुरक्षित हैं।
नश्तर की तरह दिल में चुभता है वह दिन
परंतु मई 1990 का वह दिन नश्तर की तरह आज भी दिल में चुभता है। जब पता चला कि उस पूरे परिवार को बड़ी बेरहमी के साथ घर के अंदर ही कत्ल कर दिया गया। इसमें कई महिलाएं और बच्चे भी थे। दो दिन 9 लाशें घर में पड़ी रहीं परंतु कोई भी पड़ोसी घर में झांकने नहीं गया। चूंकि कई कश्मीरी परिवार अभी भी घाटी में थे वह एक दूसरे की खैरियत लेते रहते थे। दो दिन बाद जब किसी तरह कुछ कश्मीरी रिश्तेदार उनकी खबर लेने पहुंचे तो यह मनहूस खबर मिली। उसके बाद आनन-फानन में किसी तरह उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। उसके बाद से उस घर में कोई नहीं गया।
न्याय की उम्मीद बंधी
आशीष कहते हैं कि वर्तमान में जिस प्रकार से द कश्मीर फाइल्स ने कश्मीर पंडितों के दर्द को सबके सामने लाया है और जिस प्रकार से पूरी दुनिया में समर्थन मिल रहा है उससे न्याय मिलने की उम्मीद बंधी है।