महबूबा मुफ्ती की रिहाई से तेज होगी जम्मू-कश्मीर में सियासी हलचल
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करीब चौदह महीने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की रिहाई से जम्मू-कश्मीर में सियासी गतिविधियां तेज होने के आसार हैं। अनुच्छेद 370 हटने के दौरान हिरासत और फिर पीएसए में नजरबंद महबूबा की रिहाई के कई मायने निकाले जा रहे हैं। एक तरफ जहां इसे घाटी में विश्वास बहाली और प्रदेश में राजनीतिक संवाद शुरू करने की केंद्र को कोशिशों से भी जोड़कर देखा जा रहा है, वहीं महबूबा की नजरबंदी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दो दिन बाद होने वाली सुनवाई को भी इस फैसले की वजह माना जा रहा है। कोर्ट ने हाल ही में सरकार से इस बारे में जवाब मांगा था।
रिहा होते ही केंद्र पर निशाना, गुपकार घोषणा पर होगी लामबंद
महबूबा की रिहाई से गुपकार घोषणा के तहत विपक्ष के अब केंद्र के खिलाफ लामबंद होने के आसार हैं। रिहाई के साथ ही महबूबा ने केंद्र पर निशाना साधकर अपने इरादे जता दिए हैं। महबूबा ने कहा - मैं एक साल से भी ज्यादा अरसे बाद रिहा हुई हूं। पांच अगस्त के काले दिन का काला फैसला हर पल मेरे दिल और रूह पर वार करता रहा। यही कैफियत जम्मू-कश्मीर के तमाम लोगाें की रही होगी। जो छिन गया उसे हासिल करने के लिए जद्दोजहद जारी रखनी होगी। चार अगस्त 2019 को गुपकार घोषणा के तहत घाटी के तमाम दलों के नेताओं ने केंद्र के खिलाफ जद्दोजहद तेज करने का एलान किया था। महबूबा की रिहाई पर जिस तरह से धुर विरोधी उमर अब्दुल्ला ने त्वरित प्रतिक्रिया दी है, उसे केंद्र के खिलाफ लामबंदी तेज होने के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
उपचुनाव से पहले दांव
पंचायत उपचुनाव से ठीक पहले महबूबा की रिहाई के समय को भी सियासी दांव के रूप में देखा जा रहा है। पंचायत उपचुनाव पार्टी चिह्न पर नहीं होंगे। अधिसूचना जारी होते ही चुनावी माहौल बनेगा, जिसमें अनुच्छेद 370 की वापसी तक चुनाव को बेमानी करार देने वाले दल भी परोक्ष रूप से हाथ आजमा सकते हैं। ऐसे में केंद्र शासित जम्मू-कश्मीर के पहले चुनाव में विपक्ष को चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा बनाने के लिए भी महबूबा की रिहाई को जोड़कर देखा जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने की थी टिप्पणी
महबूबा की बेटी इल्तिजा ने सुप्रीम कोर्ट में इसके लिए याचिका दाखिल की थी। जिस पर 29 सितंबर को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा था कि किसी को कब तक नजर बंद रखा जा सकता है। इस मामले में 15 अक्तूबर को सुनवाई तय थी। इससे पहले ही प्रदेश सरकार ने महबूबा को मुक्त कर सकारात्क कोशिश की है।
मार्च में ही रिहा हुए थे फारूक और उमर
नेशनल कांफ्रेस अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला को मार्च में ही रिहा कर दिया गया था। इसके बाद लगातार महबूबा को रिहा करने की मांग उठ रही थी। सरकार को इसके लिए बार-बार कठघरे में खड़ा किया जा रहा था।