नई सरकार के गठन में अभी और देर संभव
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भाजपा को पीडीपी की पहल का इंतजार है जबकि पीडीपी अपने वोट बैंक को संतुष्ट करने के लिए ठोस आधार चाहती है। पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती कोई ऐसा कदम नहीं उठाना चाहतीं जिससे सत्तालोलुपता का कोई संदेश आम लोगों में जाए।
लिहाजा, वह सुलझी नेत्री की तरह बारी-बारी से एक-एक कदम उठाना चाहती हैं।
महबूबा केंद्र को बता चुकी हैं गठबंधन एजेंडे के प्रति समर्पण
पीडीपी सूत्रों का कहना है कि महबूबा ने केंद्र सरकार के दो दूतों को बता दिया है कि उनका वोट बैंक गठबंधन एजेंडे की अनदेखी से नाराज है।
वह अपने पिता मुफ्ती मोहम्मद के फैसले को बदलना नहीं चाहतीं लेकिन इसके लिए केंद्र की ओर से कोई ठोस आधार मुहैया कराया जाना जरूरी है। पीडीपी की ओर से भाजपा के साथ गठबंधन बनाए रखने का संकेत दिया जा चुका है और सरकार गठन के लिए फैसला महबूबा पर छोड़ा गया है।
दो दिन बाद श्रीनगर में होने वाली पीडीपी की बैठक के बाद आम कार्यकर्ताओं से सलाह मशविरा का दौर शुरू हो सकता है। श्रीनगर के बाद ऐसी एक बैठक जम्मू में 3 फरवरी को प्रस्तावित है।
सईद ने गठबंधन एजेंडा तय करने में लिया था दो महीने का वक्त
एक मार्च, 2015 को शपथ ग्रहण से पहले महबूबा के पिता मुफ्ती मोहम्मद ने गठबंधन एजेंडा तय करने में लगभग दो महीने लगाए थे।
इस एजेंडे को आधार बनाकर मुफ्ती ने विपरीत ध्रुव के सियासी दल भाजपा से गठबंधन का औचित्य तलाशा था। पीडीपी की दिक्कत यह है कि उसके पास उपलब्धियों को गिनाने के नाम पर कुछ खास नहीं है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 80 हजार करोड़ के पैकेज का ऐलान जरूर किया है लेकिन बाढ़ पीड़ितों के पुनर्वास का मामला अब तक सुलझ नहीं पाया है। पीड़ितों के खाते में राहत के पैसे नहीं आ सके।
कुछ मुद्दों पर उलझन में है केंद्र
केंद्र की अपनी मजबूरियां हैं। नतीजतन एनएचपीसी को दो प्रोजेक्टों की वापसी के वादे से केंद्र सरकार कन्नी काट चुकी है। अफस्पा की आंशिक वापसी का जोखिम केंद्र सरकार उठा नहीं सकती।
सेना और सुरक्षा बलों द्वारा भवनों और जमीन को तुरंत खाली करना संभव नहीं है। इसलिए इन मुद्दों पर केंद्र खुलकर कोई ठोस आश्वासन नहीं दे सकता। पेच इन्हीं मुद्दों पर फंसा है।
श्रीनगर को स्मार्ट सिटी बनाने की घोषणा होती है तो जम्मू में आंदोलन खड़ा हो सकता है। इस तरह पीडीपी और भाजपा दोनों अपने वोट बैंक को संतुष्ट करने की जुगत निकालने की कोशिश में हैं। ऐसे में जनादेश का सम्मान और दिलों को जोड़ने जैसी बातें सरकार के गठ का फिर से आधार बन सकती हैं।