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‘मय्यत के मेले’ में आंसुओं का सैलाब

Tue, 08 Sep 2015 12:02 AM IST
Updated Tue, 08 Sep 2015 12:02 AM IST
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one year of kashmir flood, Kashmir bandh today
सद्दल में हुई त्रासदी के एक साल पूरा होने पर रविवार को ग्रामीणों ने मृतकों को श्रद्धांजलि भेंट की और एक साथ 40 लोगों की बरसी हिंदू रीति-रिवाज के साथ की। बाकायदा पंडित बुलाए गए थे। पिंडदान भी किया गया। सब कुछ उसी जगह पर किया गया, जहां हादसा हुआ था।
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इस मौके पर सरपंच रोमेश सिंह इस मौके पर उस खौफनाक रात की घटना को याद कर सिहर उठा। उन्होंने बताया कि छह सितंबर 2014 को तड़के अचानक उन्हें चीखें सुनाई दी। जब बाहर निकल कर देखा तो पहाड़ी खिसक रही थी और मकान दब रहे थे।
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कई लोग दलदल में चीख रहे थे। गांव पल-पल दलदल में बदल रहा था। कई लोगों का शरीर दलदल में था केवल हाथ बचाने के लिए इशारे कर रहे थे। लेकिन बचे ग्रामीणों को हिम्मत नहीं पट रही थी कि उस दलदल में जाकर किसी को बचा सके। बेबस होकर मौत का तांडव देखता रहा। उन्होंने बताया कि त्रासदी के एक साल पूरा होने पर विशेष श्रद्धांजलि समारोह का आयोजन किया है।
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बाढ़ की बरसी पर कश्मीर घाटी बंद

one year of kashmir flood, Kashmir bandh today
विनाशकारी बाढ़ को एक साल पूरा हो गया हैं, लेकिन अभी तक बाढ़ पीड़ितों को सरकार ने फूटी कौड़ी तक नहीं दी है। कश्मीर में लोग आज भी पुर्नवास का इंजार कर रहे हैं। कश्मीर में आज बाढ के साल होने पर बंद रखा गया है।

भाजपा-पीडीपी की सरकार को छह महीने पूरे हो चुके हैं। लेक‌िन जम्मू कश्मीर की जनता अब भी सरकार की सहायता का इंतजार कर रही है। केंद्र सरकार की ओर से कश्मीर बाढ़ पीड‌ितों के ल‌िए भले ही पैकेज की घोषणा की थी। लेक‌िन ये पैकज भी राजनीत‌ि के श‌िकार हो गए।

कश्मीर में अलगावादी नेताओं ने राज्य सरकार की लगातार उदासीन के ख‌िलाफ आज श्रीनगर में बंद बुलाया है।

कैसा प्रशासन, कैसा जनप्रतिनिधि’

one year of kashmir flood, Kashmir bandh today

हमारे लिए कैसा प्रशासन और कैसा जनप्रतिनिधि। सभी हमारी विपत्तियों पर औपचारिकता करते हैं। राजनीतिक रोटियां सेकते हैं। ऐसा नहीं है तो सद्दल की त्रासदी का एक साल पूरा हुआ। कहां गया प्रशासन और कहां गए नेता। सभी मगरमच्छ के आंसू बहाते हैं। यह गुस्से का गुबार उन ग्रामीणों का था, जो रविवार को सद्दल अपनों और अपने गांव के चालीस मृतकों की बरसी पर पहुंचे थे।

बरसी और श्रद्धांजलि कार्यक्रम में किसी प्रशासनिक अधिकारियों की गैर मौजूदगी और विधायक या अन्य पार्टी के नेताओं का नहीं पहुंचना ग्रामीणों को नागवार गुजरा। सरपंच रोमेश सिंह ने कहा कि ऐसा कौन सा जनप्रतिनिधि होता है जो इतनी बड़ी त्रासदी के बरसी पर पीड़ितों का जख्म भी नहीं सहलाएगा।

आज उनके स्थानीय विपक्षी होने के नाते भी नदारद रहे। विधायक अजय नंदा को भी अपने क्षेत्र के उन मासूम जिंदगी की याद नहीं आई। बरसी पर औपचारिकता निभाना भी मुनासिब नहीं समझा।

ग्रामीण सरदारी लाल व्यथा पूछने पर बिलख पड़ा। उसने कहा कि ऐसा लगता है जैसे हम ग्रामीणों को अपने हाल पर छोड़ दिया गया है। न विधायक यहां पहुंचे और न ही नायब तहसीलदार। हम अपनी परेशानी कहें भी तो किसे।

अपने परिवार के सभी सदस्यों को खो चुका कपूर सिंह कहता है कि हमें उम्मीद नहीं है कि शायद हमारा गांव फिर बसेगा। गिरधारी लाल की आंखें झलक पड़ी। वह पूरी तरह टूट चुका था। उसने कहा कि अब हमारा भगवान ही मालिक हैं। ऐसी ही बेबसी और नाराजगी सद्दल सभी ग्रामीणों ने व्यक्त की। ग्रामीण कैंपों में मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं।

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