सियाचिन जैसे रण क्षेत्र में दुश्मन से यूं ही लोहा नहीं लेते जांबाज
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सेना का हाई एल्टीट्यूड वारफेयर स्कूल (हॉज) देश का ही नहीं, बल्कि विश्व भर का एक ऐसा प्रशिक्षण स्कूल है, जहां भारतीय सेना के जवानों को किसी भी ऊंचाई वाले रण क्षेत्र पर जाने से पूर्व विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है।
खासकर सियाचिन ग्लेशियर जैसी विश्व की सबसे ऊंची रणभूमि पर। जो भी जवान सियाचिन में तैनात होते हैं, उनकी तैनाती से पूर्व उन्हें भी यहां विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है। भारतीय सैनिक के अलावा कई अन्य देशों के सैनिक यहां प्रशिक्षण ले चुके हैं। इनमें अमेरिकी और नेपाली सेना भी शामिल हैं।
हाई एल्टीट्यूड वारफेयर स्कूल (हॉज) गुलमर्ग में स्थित है। प्रशिक्षण स्कूल के बेस कैंप से करीब चार किलोमीटर की कठिन चढ़ाई के बाद करीब 12000 फीट की ऊंचाई पर ट्रेनिंग एरिया में जवानों को प्रशिक्षण देकर उन्हें दुर्गम क्षेत्रों में तैनाती के लिए तैयार किया जाता है।
दुर्घटनाओं के समय रेस्क्यू का भी विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है
इस ट्रेनिंग में बर्फीली पहाडि़यों की चढ़ाई, सर्वाइवल ट्रेनिंग के अलावा एवलांच वाले इलाकों में होने वाली दुर्घटनाओं के समय रेस्क्यू का भी विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है, ताकि अगर वह कभी एवलांच में फंसे तो अपना बचाव कर सकें। इसके अलावा उन्हें विशेष रेस्क्यू ट्रेनिंग भी दी जाती है, जिन्हें एवलांच रेस्क्यू टीम (एआरटी) में बाद में शामिल किया जाता है।
इस विशेष ट्रेनिंग के दौरान जवानों को न सिर्फ विषम परिस्थितियों के दौरान दुश्मन से लोहा लेने के तरीके बल्कि इन परिस्थितियों में अपना रख रखाव करना भी सिखाया जाता है।
इस सबके लिए विशेष उपकरणों का प्रयोग करना भी सिखाया जाता है। इनमें स्कीइस, स्नो शूज, शॉवेल, ह्वाइट स्पेशल ड्रेस, नाइट्रोजन सिलेंडर, एवीडी, वॉकी टॉकी, ऑक्सीजन सिलेंडर, एवलांच सर्वाइवल बॉल जैसे उपकरण शामिल हैं।
बर्फ के भीतर खोज का तरीका
भारतीय सेना के प्रशिक्षण ले रहे जवानों ने एक ड्रिल में यह दिखाया कि अगर कोई जवान हिमस्खलन में फंस जाता है, तो उसे कैसे सुरक्षित बाहर निकाला जाए। इस प्रक्रिया में उन्होंने एक डमी, जो बर्फ के नीचे दबी हुई थी पहले उसे एवलांच विक्टिम डिटेक्टर (एवीडी) द्वारा खोजने की कोशिश की गई।
यह एक ऐसा उपकरण है, जो 15 फीट तक की गहराई से करीब 40 मीटर के रेडियस तक तरंगें भेजता है, जिसे पता चल जाता है कि बर्फ के नीचे कोई है। और अगर नहीं खोजा जाता है, तो फिर विशेष उपकरण द्वारा बर्फ में उन्हें खोजने का प्रयास किया जाता है।
जैसे ही जवान को बर्फ से बाहर निकाला जाता है, तो पहले उसे निकट के चिकित्सा शिविर में ले जाया जाता है, जहां उन्हें शुरूआती चिकित्सा देकर शिफ्ट किया जाता है।