अफ़ज़ल गुरु के बेटे के सीने में कौन सी आग धधक रही है?
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आगे आती थी हाल-ए-दिल पर हंसी अब किसी बात पर नहीं आती। काबा किस मुंह से जाओगे ग़ालिब, शर्म तुमको मगर नहीं आती। ग़ालिब की ये ग़ज़ल सुनाई ख़ुद उन्हीं के हमनाम ने।
ये हैं 15 साल के ग़ालिब गुरु जो दसवीं की परीक्षा में कुल 500 में से 474 अंक लाए हैं और उन्हें सारे विषयों में ‘ए1’ ग्रेड मिले। ग़ालिब के पिता अफ़ज़ल गुरु को संसद हमले का दोषी पाया गया था और नौ फ़रवरी 2013 को उन्हें फांसी दे दी गई थी।
वो कहते हैं, 'मेरे अब्बू(अफ़ज़ल गुरु) के जाने के बाद मुझ में एक आग सी लग गई थी जो मुझे हमेशा हिम्मत देती थी।'
लोग मुझे ‘सायको’ कहते हैं
'पहले मैं तीन घंटे पढ़ता था पर जब परीक्षाओं के बारे में पता लगा तब मैंने 20 घंटे पढ़ना शुरू कर दिया।' 'पढ़ाई करते वक़्त कभी-कभी मुझे कई बार ग़ुस्सा आ जाता था, तब मैं अपने आप को समझाता था कि नहीं मुझे पढ़ाई करनी है और अब्बू-अम्मी का सपना पूरा करना है।
ग़ालिब एक साल के थे जब उनके पिता जेल चले गए थे। पर एक ऐसी जगह पर रहना जहां कई चरमपंथी गतिविधियां होती रहती हैं, अपने आप को किस तरह से अलग रख पाए ग़ालिब?
ग़ालिब बताते हैं, 'मैंने अपने आपको काफ़ी कंट्रोल किया है। मैं न अपने इमोशंस दिखाता हूं और न ही किसी से लड़ाई के वक़्त कुछ कहता हूं। जब मैं लड़ाई के वक़्त चुप हो जाता हूं तो लोग मुझे ‘सायको’ कहते हैं पर मैंने अपने इमोशंस छिपाने का तरीक़ा सीख लिया है'
डॉक्टर बनकर कश्मीर में लोगों की मदद करुंगा
ग़ालिब डॉक्टर बनकर कश्मीर में लोगों की मदद करना चाहते हैं। 'जब मैं जेल में अब्बू से मिलने गया तो उन्होंने मुझे बायलॉजी के कुछ सवाल दिए और वहीं से मैं समझ गया था कि उनका रुझान बायलॉजी की तरफ़ ही है और वहीं से मेरे डॉक्टर बनने की इच्छा जागी।'
वो कहते हैं, 'मैं कश्मीर में ही रहूंगा और यहीं से और पढ़कर मेडिकल सीट में अपनी जगह बनाउंगा।' ग़ालिब की मां एक नर्स हैं। उन्होंने ग़ालिब के दसवीं कक्षा में बेहतर नतीजे के लिए अपनी नौकरी छोड़ दी और ग़ालिब का कहना है कि वो आज जो कुछ भी हैं अपनी मां की वजह से हैं।
उन्होंने कहा, 'मेरी अम्मी मुझसे कहती थीं कि जब तुम्हारा पढ़ने का मन हो तभी पढ़ना। जब पढ़ने का मन नहीं हो तो कोई और काम करो।' ग़ालिब को वीडियो गेम का शौक़ है और वो आजकल ‘कॉल ऑफ़ ड्यूटी’ खेलते हैं।