यहां जाए बिना पूर्ण नहीं होगी वैष्णो देवी की यात्रा
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श्रद्धा और आस्था से परिपूर्ण वैष्णो देवी की यात्रा को जाने वाले हर श्रद्धालु की अभिलाषा होती है कि वह हर उस स्थान पर नमन करते हुए माता के दरबार तक पहुंचे, जहां पर कभी मां भगवती ने विश्राम किया था। कोल कंडोली, देवा माई, भूमिका मंदिर, दर्शनी ड्योढ़ी, बाण गंगा, चरण पादुका, अर्द्धकुंवारी हाथी मत्था, भैरों मंदिर आदि ऐसे पड़ाव हैं, जो वैष्णो देवी यात्रा का प्रमुख हिस्सा हैं।
लेकिन मौजूदा समय में अनदेखी के चलते इनमें से अधिकतर पड़ाव अपना अस्तित्व खोते जा रहे हैं। पौराणिक कथा के अनुसार जब मां वैष्णो देवी ने कन्या के रूप में भैरो का वध किया था तो उसे वरदान में कहा गया कि जो भक्त मां वैष्णो के दर्शन के बाद भैरो मंदिर में माथा नहीं टेकेगा, उसकी यात्रा सफल नहीं होगी।
जबकि मौजूदा समय में मात्र 30 प्रतिशत तक ही दर्शनार्थी भैरों दर्शन के लिए जाते हैं। अधिकतर यात्रियों को भैरों मंदिर की महत्ता के बारे में जानकारी भी नहीं होती। अथवा कई को नए मार्ग से होते हुए अर्द्धकुंवारी पहुंचने पर ज्ञात होता है कि भैरों मंदिर का रास्ता दूसरी ओर से जाता है। ऐसे भक्तों को ना चाहते हुए भी भैरों मंदिर के दर्शन की इच्छा का त्याग करना पड़ता है।
बाण गंगा में स्नान का महत्व
वेदों के अनुसार प्राचीन समय में बाण गंगा में स्नान करने के बाद ही श्रद्धालु आगे की यात्रा शुरू करते थे। जबकि मौजूदा समय में बाण गंगा के कम हुए जलस्तर और बढ़ते प्रदूषण ने इस प्रथा को भी लगभग समाप्त कर दिया है। इसी प्रकार से चरण पादुका अर्द्धकुंवारी आदि के दर्शन का भी विशेष महत्व माना जाता है।
वैष्णो देवी की कथा के अनुसार प्राचीन दर्शनी ड्योढ़ी पर मां वैष्णो ने कन्या रूप में परम भक्त श्रीधर को दर्शन दिए थे। जबकि मौजूदा समय में पांच प्रतिशत तक ही यात्री इस स्थान से गुजरते हैं तथा बाण गंगा मार्ग से होते हुए सीधे दर्शन को निकल जाते हैं। बहुत कम संख्या में यात्री इन स्थानों तक पहुंचते हैं।
एक ओर भवन तक पहुंचने के लिए नए मार्गों की स्थापना और आधुनिकीरण भी इन पड़ाव के अस्तित्व के समापन को लेकर जिम्मेदार है। विभिन्न माध्यम से यात्री सीधे भवन पहुंचने लगे हैं, जिससे यात्रा मार्ग के पड़ावों से भक्त अंजान होने लगे हैं।