बिना फारूक के चुनाव लड़ेगी नेकां
जम्मू-कश्मीर नेशनल कांफ्रेंस पार्टी अध्यक्ष डा. फारूक अब्दुल्ला की अनुपस्थिति में नेशनल कान्फ्रेंस विधानसभा चुनाव के लिए मैदान में उतरेगी। किडनी रोग से ग्रस्त होने के कारण डा. फारूक कई माह से इलाज के लिए लंदन में उपचाराधीन हैं। लोकसभा चुनाव के ठीक बाद उनकी तबीयत ज्यादा खराब हो गई थी।
यह पहला मौका है, जब फारूक के बिना पार्टी कोई चुनाव लड़ रही है। प्रचार अभियान में उनके शामिल न होने से पार्टी को वोटरों के समर्थन की कमी खल सकती है। डा. फारूक अब्दुल्ला विधानसभा चुनाव में कई बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान रहे हैं।
नेकां के प्रांतीय सचिव शेख बशीर अहमद का कहना है कि डा. फारूक की तबीयत खराब होने के कारण वह चुनाव से दूर रहेंगे। उनकी गैरमौजूदगी के बारे में पार्टी कैडर को समझाया गया है।
'बिना फरूक भी करेंगे अच्छा प्रदर्शन'
बशीर अहमद का कहना है कि मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व में पार्टी बेहतर प्रदर्शन करने में कामयाब होगी। डा. फारूक अब्दुल्ला का मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने का सिलसिला 1982 में शुरू हुआ था। 1977 के विधानसभा चुनाव में डा. फारूक के पिता शेख मोहम्मद अब्दुल्ला मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे, लेकिन सितंबर 1982 में उनका देहांत होने पर डा. फारूक को यह जिम्मेदारी दी गई।
1983 में हुए चुनाव में भी नेकां को बहुमत मिला, लेकिन 1984 में पार्टी के 13 विधायकों के कांग्रेस में चले जाने पर कांग्रेस के बाहरी समर्थन से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर गुलाम मोहम्मद शाह को बिठाया गया। इसके बाद 1986 में राज्यपाल शासन के बाद 1987 में हुए दोबारा चुनाव में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी और डा. फारूक के गठबंधन से सरकार बनाई गई। इसमें डा. फारूक मुख्यमंत्री रहे। यह सरकार 1990 तक चली।
पहले भी प्रचार से दूर रह चुके हैं फारूक
सरकार बनने के बाद किन्हीं कारणों से 1990-1996 तक राज्यपाल शासन लागू रहा। उस समय पीडीपी के संरक्षक मुफ्ती मोहम्मद सईद केंद्र में गृह राज्य मंत्री थे। उन्होंने जम्मू-कश्मीर में जगमोहन को राज्यपाल नियुक्त किया। सियासी कारणों से डा. फारूक ने बीच में ही अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
उस समय घाटी में आतंकवाद चरम पर था। इसके बाद 1996 में हुए चुनाव में डा. फारूक अब्दुल्ला दोबारा मुख्यमंत्री बने और वर्ष 2002 तक कार्यकाल पूरा किया। वर्ष 2002 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और पीडीपी की गठबंधन की सरकार बनी।
इसके बाद वर्ष 2008 में हुए चुनाव में नेकां और कांग्रेस ने गठबंधन कर सरकार बनाई। उस समय भी डा. फारूक किन्हीं कारणों से प्रचार अभियान में पूरी तरह से शामिल नहीं हुए। वर्ष 2008 से उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हैं।