नगरोटा एनकाउंटर: पांच महीने से थी आतंकियों के आने की सूचना, जम्मू के आईजी ने तभी बिछा दिया था जाल
सुरंग का पता लगाने वाली तकनीक किसी भी सुरक्षा बल के पास नहीं है। एक दशक में करीब दर्जनभर सुरंग मिल चुकी हैं। साल 2012 में तो ऐसी सुरंगों का पता लगाने के लिए मेक्सिको की तकनीक पर उपकरण खरीदे जाने पर चर्चा शुरू हुई थी...
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नगरोटा एनकाउंटर इत्तेफाक नहीं था। जम्मू के तेजतर्रार ‘आईपीएस’ आईजी मुकेश सिंह, जिनका एनआईए में बेहतरीन सेवा काल रहा है, उनके पास आतंकियों के आने की सूचना करीब पांच महीने पहले से थी। आईजी के पास ये ठोस इनपुट थे कि पाकिस्तान के दो बड़े आतंकी संगठन 'जैश-ए-मोहम्मद' और 'लश्कर-ए-तैयबा' जम्मू संभाग में आतंकी हमला करने की योजना बना रहे हैं। उससे पहले भी इन संगठनों ने अपने गुर्गों को आगे भेजने का प्रयास किया था, लेकिन वे पकड़े गए थे।
उसके बाद आईजी मुकेश सिंह ने जम्मू क्षेत्र में इंटेलिजेंस विंग और दूसरी एजेंसियों के साथ मिलकर जाल बिछा दिया था। वे लगातार उस इनपुट पर काम कर रहे थे। जब आतंकी ट्रक में छिपकर आए तो उन्हें जम्मू संभाग से बाहर नहीं निकलने दिया। चारों आतंकियों को ट्रक में ही ढेर कर दिया गया। इनके कब्जे से बरामद सेटेलाइट फोन, कंपास और दूसरे उपकरणों की मदद से अब यह मालूम करने का प्रयास किया जा रहा है कि इन्होंने किस इलाके में सुरंग खोदकर जम्मू क्षेत्र में प्रवेश किया है।
आईजी मुकेश सिंह के अनुसार, जम्मू कश्मीर घाटी में सुरक्षा बलों को आतंकियों के खिलाफ लगातार सफलता मिल रही थी। घुसपैठ के लिए आतंकी नए नए रास्ते खोज रहे हैं। जिन इलाकों से वे पहले घुसपैठ करते रहे हैं, वहां भी सुरक्षा बलों की कड़ी चौकसी रही है। आतंकी, जम्मू क्षेत्र में आएंगे, ये पक्की सूचना थी। जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा, इन दोनों संगठनों ने पहले भी प्रयास किया था। उनके कई प्रयासों को विफल बनाया गया।
जब से कश्मीर में आतंकियों का तेजी से सफाया होना शुरू हुआ है और उनके घुसपैठ वाले रास्तों को बंद कर दिया गया तो वे जम्मू के जरिए सीमा पार कर कश्मीर पहुंचने का प्रयास करने लगे। इसके अलावा, ये दोनों आतंकी संगठन, जम्मू संभाग में अपनी गतिविधियां शुरु करना चाहते थे। इन्होंने जम्मू के साथ लगती अंतरराष्ट्रीय सीमा से भारतीय सीमा में घुसने की प्लानिंग की थी। सीधे बॉर्डर के किसी हिस्से से इनके लिए अब सीमा पार करना आसान नहीं है। यही वजह है कि पिछले कुछ वर्षों से ये आतंकी सुरंग तैयार करने पर फोकस कर रहे हैं। कुछ माह पहले सांबा सेक्टर में सुरंग मिली थी।
इनपुट पक्का था, इसलिए जम्मू पुलिस ने कोताही नहीं बरती। सड़क मार्ग एवं दूसरे संदिग्ध रास्तों पर नजर रखी गई। पुलवामा में सीआरपीएफ बस को उड़ाने की योजना बनाने वाला आतंकी मोहम्मद उमर फारूख भी अफगानिस्तान में ट्रेनिंग लेने के बाद दो साल पहले जम्मू के सांबा सेक्टर से ही भारत में घुसा था। सांबा सेक्टर के आसपास इन संगठनों की गतिविधियां देखी गई थी। इस इलाके के युवाओं को अपने संगठन में भर्ती कर उन्हें हैंड ग्रेनेड फेंकने का प्रशिक्षण देने का प्रयास कर रहे थे।
दिक्कत यह है कि सुरंग का पता लगाने वाली तकनीक किसी भी सुरक्षा बल के पास नहीं है। एक दशक में करीब दर्जनभर सुरंग मिल चुकी हैं। साल 2012 में तो ऐसी सुरंगों का पता लगाने के लिए मेक्सिको की तकनीक पर उपकरण खरीदे जाने पर चर्चा शुरू हुई थी। सामने आया कि जमीन के नीचे पानी भरा है तो ये उपकरण काम नहीं करेंगे। इसके अलावा उपकरणों की गहराई में काम करने की अपनी एक सीमा भी थी। इन सब बातों पर चर्चा करने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि सुरंग का पता लगाने के लिए लोकल इंटेलिजेंस की मदद ली जाए।
इसके लिए मुखबिर तैयार किए जाएं। अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर के पास जो लोग खेती करते हैं, वे इस मामले में प्रभावशाली स्रोत साबित हो सकते हैं। अगर वहां इंटेलिजेंस नेटवर्क स्थापित हो जाता है तो सुरंग का समय रहते पता चलने के आसार हैं। इसके बाद लोकल नेटवर्क के जरिए कई सुरंगों का पता भी लगाया गया है।