मुफ्ती दो माह पहले महबूबा को सौंपना चाहते थे विरासत
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जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद को मौत करीब होने का अहसास हो गया था। वह अक्सर बातचीत में अपने पास कम वक्त होने का जिक्र करने लगे थे। दो महीना पहले ही अपनी बेटी महबूबा मुफ्ती को सियासी विरासत सौंपने की ख्वाहिश रखते थे।
उन्होंने सार्वजनिक रूप से महबूबा को नेतृत्व संभालने में सक्षम बताना शुरू कर दिया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पिछली मुलाकात में भी उन्होंने अपनी इच्छा जाहिर कर दी थी।
जम्मू-कश्मीर के लिए विशेष पैकेज के एलान के तुरंत बाद महबूबा की ताजपोशी तय हो चुकी थी लेकिन तब उस योजना को धरातल पर नहीं उतारा जा सका। श्रीनगर में अमर उजाला संवाददाता से अक्तूबर में हुई मुलाकात के दौरान मुफ्ती ने कहा था कि जब तक हूं, श्रीनगर को जम्मू से जोड़ने का प्रयास करता रहूंगा।
उनकी छवि कट्टरवादी के रूप में पेश होती रही
तब एक निर्दलीय विधायक द्वारा एमएलए निवास में बीफ पार्टी और बाद में विधानसभा में भाजपा विधायकों द्वारा उस एमएलए की पिटाई की घटना से मुफ्ती आहत थे। घटना के बाद तनाव को कम करने के लिए मुफ्ती ने जम्मू-कश्मीर भाजपा से फायर ब्रांड नेताओं से अलग-अलग मुलाकात कर स्थिति को सामान्य बनाया था।
कई बार उनकी छवि कट्टरवादी के रूप में पेश होती रही लेकिन निजी जिंदगी में वह गंगा-यमुनी तहजीब के पक्षधर थे। उनके मित्रों में कश्मीरी पंडितों की अच्छी खासी संख्या थी। उन्होंने निजी स्टाफ में भी पंडितों को महत्वपूर्ण ओहदे पर बिठाया और जम्मू के आईएएस बीआर शर्मा को मुख्य सचिव पद से नवाजा।
वाजपेयी की नीतियों के मुरीद रहे
मुफ्ती पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को ग्रेट स्टेट्समैन कहते थे। मुफ्ती ने हमेशा कहा कि सिर्फ वाजपेयी की नीतियों से ही कश्मीर समस्या का समाधान संभव है। वाजपेयी ने कश्मीर में विश्वास का माहौल बनाया।
कश्मीर की अवाम को दिया सियासी विकल्प
मुफ्ती ने जम्मू-कश्मीर की अवाम को पीडीपी के रूप में सियासी विकल्प दिया। उससे पहले घाटी में नेशनल कांफ्रेंस ही इकलौती जनाधार वाली पार्टी थी। पीडीपी के उदय से घाटी में संतुलन की सियासत का नया युग शुरू हुआ।