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मोदी का दिल जीतने के लिए मुफ्ती ने किया ये काम

Fri, 24 Apr 2015 12:02 PM IST
Updated Fri, 24 Apr 2015 12:02 PM IST
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mufti increases bjp cabinet numbers to impress modi

पारी की शुरुआत में ही चौके-छक्के जड़ने की कोशिश में जुटे मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद अब सुरक्षात्मक स्ट्रोक खेलने लगे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मनुहार के लिए अब भाजपा के दो राज्य मंत्रियों को कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया जा रहा है।

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पीडीपी-भाजपा की गठबंधन सरकार के दो माह कार्यकाल में मुफ्ती को अहसास हो चला है कि एकतरफा फैसले लादना आसान नहीं होगा। उन्हें इस बात का इलहाम भी है कि केंद्र सरकार के उदार सहयोग के बिना उनकी गाड़ी एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकती।
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लिहाजा पहले मुफ्ती और वित्त मंत्री हसीब द्राबू पीएम मोदी से मिले और एक दिन पहले पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने मोदी से मुलाकात कर गठबंधन सरकार पर लंबी बातचीत की। इस मुलाकात ने ही कैबिनेट विस्तार की पृष्ठभूमि तैयार की।
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पाकिस्तान के समर्थन में नारेबाजी के बाद अलगाववादी मसर्रत की गिरफ्तारी और उस पर पीएसए लगाने की कार्रवाई को भी मोदी के मनुहार का ही हिस्सा माना जा रहा है।

शपथ ग्रहण के बाद ही हो गया था बवाल

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अब भाजपा को संतुष्ट करने के लिए कैबिनेट रैंक के मंत्रियों में दो पद और दिए जा रहे हैं। भाजपा कोटे के मंत्री सज्जाद लोन को कैबिनेट मंत्री का दर्जा तो मिला है, लेकिन पशुपालन और विज्ञान-तकनीक जैसे कम महत्वपूर्ण समझे जाने वाले विभाग दिए गए हैं। विरोध में सज्जाद ने एक महीने तक पदभार ग्रहण नहीं किया था।

अब कैबिनेट विस्तार के तुरंत बाद उन्हें कुछ अहम विभाग दिए जा सकते हैं। शपथ ग्रहण के तुरंत बाद शांतिपूर्ण भारी मतदान का श्रेय अलगाववादियों, आतंकियों और पाकिस्तान को देना भले ही मुफ्ती का सुनियोजित कदम रहा हो, लेकिन उस बयान ने भाजपा को चौकन्ना कर दिया।

बाद में अलगाववादी मसर्रत आलम की रिहाई से भाजपा के तेवर सख्त हुए और वह निर्णयों में भी साझीदारी पर अड़ती नजर आई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तल्ख तेवर के बाद पीडीपी अब नरम दिख रही है। दरअसल दिल्ली चुनाव में करारी हार के बाद भाजपा की अकड़ कम हुई।

भाजपा को हुआ था नुकसान

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नतीजतन जम्मू कश्मीर में सरकार गठन के वक्त सौदेबाजी की ताकत घट गई। सीटों की संख्या बराबर होने के बावजूद भाजपा को सरकार में छोटे भाई की भूमिका स्वीकारनी पड़ी। राज्यसभा और विधान परिषद के चुनाव में भी पीडीपी बड़े भाई की ही भूमिका में नजर आई।

पीडीपी के तीन प्रत्याशी राज्यसभा पहुंचे, जबकि भाजपा के हिस्से में शमशेर सिंह मन्हास के रूप में एक ही सीट आई। भाजपा का दूसरा प्रत्याशी चुनाव हार गया और कांग्रेस के गुलाम नबी आजाद ने बाजी मार ली। इसी तरह विधान परिषद के चुनाव में भाजपा को एक सीट कम दी गई।

पीडीपी के छह और भाजपा के पांच प्रत्याशी खड़े हुए। चुनाव गणित में भाजपा पिछड़ी और उसके सिर्फ तीन प्रत्याशी जीते, जबकि पीडीपी के सभी छह प्रत्याशी विजयी रहे थे। बाद में भाजपा ने बराबरी पर जोर देना शुरू किया तो विधान परिषद में मनोनीत सदस्यों में उसे चार स्थान हासिल हो सके।

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