मदर्स डे: कुशल प्रशासक इंदु कंवल की प्रेरणादायक कहानी, बोलीं- बच्चों को नसीहत न दें, करके दिखाएं
मार्च महीने में परिवार के सदस्य जिला उपायुक्त से मिलने आए थे। ड्यूटी की प्राथमिकता के चलते सात माह से वह घर नहीं जा सकी हैं।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
जम्मू संभाग में उधमपुर जिले की प्रशासनिक मुखिया कोरोना काल में खुद माइक लेकर लोगों से अपील करती नजर आती हैं। जिला उपायुक्त की कमान संभाले इंदु कंवल चिब व्यवस्था सुधार के निर्देश जारी करती हैं तो उसे जमीन पर अमल कराने खुद पहुंच जाती हैं। कोरोना काल में सख्त ड्यूटी वाली रुटीन के बीच वे अमेरिका में पढ़ रहीं अपनी बेटी के साथ ग्रुप कॉल से संपर्क में रहती हैं।
मदर्स डे की पूर्व संध्या उधमपुर की डीसी इंदु कंवल चिब ने कहा, बच्चों के लिए अभिभावक प्रेरणा होते हैं। बतौर मां वे कोशिश करती हैं कि अपनी ड्यूटी, परिवार की जिम्मेदारी और बड़ों के आदर को अपने आचरण में प्राथमिकता दें। ऐसा करने से बेटी को भी जीवन में बेहतर करने की मजबूत प्रेरणा मिलती है।
जिला उपायुक्त की बेटी अमेरिका में पढ़ाई कर रही है। पति सेना में ब्रिगेडियर पद पर हैं। तीनों अलग-अलग जगह पर हैं, लेकिन रोजाना ग्रुप कॉल कर वर्चुअल तौर पर एक साथ खाना खाते हैं। खाने में क्या बना है से लेकर तमाम बातें होती हैं। इंदु कंवल चिब सांबा के संब्याल परिवार की बेटी हैं, जिनकी शादी चंडीगढ़ में रह रहे चिब परिवार में हुई।
इंदु कंवल चिब ने बताया कि सैन्य परिवार में पल-बढ़ कर जीवन में अनुशासन सीखा है। प्रयास रहता है कि नई पीढ़ी में भी यह अनुशासन परंपरा बनकर आगे बढ़े। बेटी को यही सिखाया है कि जीवन में कथनी और करनी में अंतर नहीं होना चाहिए। जीवन मिसाल बनना चाहिए। यह संस्कार उन्हें परिवार के बड़ों से मिले, जिन्हें अब वह बेटी को देने का प्रयास कर रही हैं। रोजाना होने वाली ग्रुप कॉल में बेटी को न सिर्फ मां-बाप का प्यार मिलता है बल्कि पेशेवर जीवन के अनुभवों के पाठ भी सीखने को मिलते हैं।
बच्चों को नसीहत न दें, करके दिखाएं
इंदु कंवल चिब कहती हैं कि मदर्स डे पर वह अभिभावकों से कहना चाहती हैं कि बच्चों को केवल नसीहत देकर सिखाने की कोशिश न करें। पहले माता-पिता को वह सारी बातें अपने आचरण में लानी चाहिए। बच्चे सुनकर नहीं देखकर सीखते हैं। मां होने के नाते वह यह कभी नहीं भूलती। इसीलिए व्यक्तिगत हो या पेशेवर जीवन, अपने आचरण को संस्कार का आधार मानकर चलती हैं। सरकार ने यदि कोई जिम्मेदारी दी है तो उसे ईमानदारी से निभाना पहली प्राथमिकता है। यही ईमानदारी बतौर मां भी पूरी तरह से निभाने का प्रयास करती हैं। हम कैसा जीवन जी रहे हैं बच्चों के लिए वही सबसे महत्वपूर्ण होता है।